Home » इंडिया » Separatist decided not to co-operate with all-party delegation
 

सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल को घास नहीं डालने का अलगाववादियों का फैसला

कैच ब्यूरो | Updated on: 7 September 2016, 8:11 IST

एक बार फिर केंद्र ने घाटी में सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजने का निर्णय लिया है, जिससे लगता है, दिल्ली और कश्मीर के आपसी रवैये में अब तक कोई खास परिवर्तन नहीं आया है. लगता है कुछ नया घटने वाला है. जाहिर है, 2010 में थमी अशांति 2016 में फिर सुलग गई है. और इसके साथ ही, श्रीनगर और दिल्ली के 'अभिनेता' पहले से तय अपनी-अपनी भूमिका में लौट आए हैं.

कश्मीर में फिर से सड़कों पर विरोध हो रहा है और पत्थर फेंके जा रहे हैं. इस बार 2010 से ज्यादा भयंकर और ज्यादा स्थानिक. और दिल्ली से वही पहले वाली प्रतिक्रिया मिलने से यह विरोध पहले से ज्यादा उग्र और ज्यादा कट्टर है. सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजने का प्रयास पहले भी असफल रहा है और अब फिर से उसके आने के विचार का कश्मीर में किसी ने स्वागत नहीं किया है.

'केंद्र हुर्रियत से बात नहीं करना चाहता. हुर्रियत केंद्र से बात नहीं करना चाहता. प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख राजनाथ सिंह भी हुर्रियत से नहीं मिलेंगे. केवल वे सदस्य मिलेंगे, जो मिलना चाहते हैं,' यह कहना है बारामुला के एक सड़क विक्रेता 35 वर्षीय बिलाल अहमद का, जिसे अब तक के सारे घटनाक्रमों की जानकारी है. वे आगे कहते हैं, 'इस पूरी कवायद का क्या औचित्य है? इससे क्या हासिल होगा?'

इस तरह की स्थितियों से निराशा बढ़ रही है. रावलपाड़ा श्रीनगर के सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक अब्दुर्रहमान कहते हैं, 'हैरान हूं कि कहां जाकर इसका अंत होगा.' वे आगे कहते हैं, 'हम जानते हैं हमारे रोग का कोई इलाज नहीं है, पर इसके लिए दर्द निवारक दवाएं भी नहीं हैं.'

हुर्रियत के सदस्य सईद अली शाह गिलानी ने पहले से तय कर लिया है कि उन्हें सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के कश्मीर आने पर कैसी प्रतिक्रिया करनी है. वे कहते हैं, 'भारतीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल इस प्रस्ताव को पारित करने के बाद कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, कश्मीर आ रहा है. इसलिए इस प्रतिनिधिमंडल के पास जम्मू और कश्मीर के विवाद को सुलझाने का ना तो जनादेश है और ना ही नीयत.' उन्होंने अपने वक्तव्य में आगे कहा, 'सभी स्टेकहोल्डर्स को हमारी सलाह है कि वे इस प्रतिनिधिमंडल से मिलने की निर्रथक कवायद नहीं करें.'

इस कथन में निहित संदेश को विरोधी अलगाववादी गुट से लेकर नागरिक समाज के दल ने स्वीकारा है

इस कथन में निहित संदेश को विरोधी अलगाववादी गुट से लेकर नागरिक समाज के दल ने स्वीकारा है. अब लगभग सभी प्रमुख संगठनों ने तय किया है कि वे आने वाले प्रतिनिधिमंडल से नहीं मिलेंगे.

गुरुवार को एक दर्जन से ज्यादा व्यावसायिक संगठनों के प्रमुखों ने श्रीनगर में बैठक रखी और प्रतिनिधिमंडल से नहीं मिलना तय किया. इन संगठनों में कश्मीर चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री, फेडरेशन चैंबर ऑफ इंडस्ट्री कश्मीर, कश्मीर इकोनोमिक अलायंस, कश्मीर ट्रेडर्स एंड मेन्यूफेक्चरर्स फेडरेशन, कश्मीर होटल एंड रेस्टोरेंट ओनर्स फेडरेशन, टूरिज्म अलायंस, कश्मीर हाउसबोट ओनर्स एसोसिएशन, व्यापार मंडल, ऑल कश्मीर ट्रांसपोर्ट वेलफेयर एसोसिएशन, जेएंडके कॉन्टे्रक्टर्स, कोओर्डिनेशन कमेटी, ऑल इंडस्ट्रियल एस्टेट एसोसिएशन, ट्रेवल एजेंट्स सोसाइटी ऑफ कश्मीर, अरबन ट्रेवल एजेंट्स एसोसिएशन और कुछ अन्य शामिल हैं.

कश्मीर इकोनोमिक अलायंस के अध्यक्ष मोहम्मद यसीन खान ने कहा, 'आने वाले प्रतिनिधिमंडल से मिलना मूर्खता होगी और यह महज एक फोटो सेशन रहेगा. यह कश्मीरियों के जले पर नमक ही छिड़केगा, जो सड़कों पर विरोध कर रहे हैं और कश्मीर के समाधान के लिए गोलियों खा रहे हैं.'

कश्मीर चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के प्रमुख मुस्ताक अहमद वानी का भी यही कहना था, 'सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल पिछले दो दशकों में तीन बार कश्मीर आ चुका है. पहले नब्बे के दशक में और फिर 2008 और 2010 में. उनकी वजह से क्या बदल गया? कुछ नहीं. ये दौरे मात्र पर्यटन के लिए हैं. प्रतिनिधिमंडल से मिलने से हमारा महज अपमान होगा, समाधान नहीं.'

वानी की आशंकाओं को सबने गांठ बांध लिया है. गिलानी के आगाह करने के बाद सभी ने सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत को सार्थक नहीं माना है और इसमें सामाजिक बहिष्कार का खतरा है. पहले अशांति के दौरान, जब कश्मीर इकोनोमिक के प्रमुख यसीन खान नागरिक समाज दल की ओर से मुख्यमंत्री महबूब मुफ्ती से मिले थे, उन्होंने अपने साथी व्यापारियों को 'बेच दो' का शोर करने को कहा था और जब वे एसएमएचएस अस्पताल में हताहतों से मिलने गए, तो उन्हें भीड़ ने बुरी तरह पीटा.

अशांति के समय गृहमंत्री दो बार कश्मीर आए और पैलेट बंदूकों को प्रतिबंधित करने का वादा किया, पर वे निभाना भूल गए

देशद्रोही होने का ठप्पा लगने के डर से अल्पसंख्यक समुदाय के संगठनों तक ने प्रतिनिधिमंडल का बहिष्कार करने का निर्णय लिया है. ऐसी ही एक पार्टी है- ऑल पार्टी सिख कोओर्डिनेशन कमेटी. कमेटी के अध्यक्ष जगमोहन सिंह रैना ने कहा, 'अशांति के समय गृहमंत्री दो बार कश्मीर आए और पैलेट बंदूकों को प्रतिबंधित करने का वादा किया, पर वे इस वादे को निभाना भूल गए. सुरक्षा बल पैलेट बंदूकों का पहले से ज्यादा अंधाधुंध और ज्यादा बार इस्तेमाल कर रहे हैं.'

दूसरी ओर रिपोर्ट है कि जेल में कैद हुर्रियत अध्यक्ष मीरवेज उमर फारूख और जेकेएलएफ सुप्रीमो यसीन मलिक ने गिलानी को उनकी तरफ से निर्णय लेने की पूरी छूट दी है. उन्होंने कहा, 'आप अपनी ओर से विरोध कैलेंडर जारी कर सकते हैं और हम आपका पूरा समर्थन करते हैं.' खबर है कि दोनों नेताओं ने गिलानी से इस संबंध में बातचीत की है.

इससे गिलानी वर्तमान विरोध के न केवल एकमात्र कर्ता-धर्ता बन गए हैं, बल्कि उन्होंने कश्मीर में कुछ सार्थक मकसद से आ रहे प्रतिनिधिमंडल से मिलने की संभावना को सख्ती से खत्म कर दिया है. जब तक वे प्रोटोकॉल से बाहर निकलकर मीरवाइज और मलिक जैसे अलगाववादियों से जेल में और गिलानी से उनके घर पर नहीं मिलते, प्रतिनिधिमंडल केवल उन साधारण और महत्वहीन संगठनों से मिल पाएंगे, जो बमुुश्किल ही स्थितियों में बदलाव ला सकेंगे.

राजनीतिक घटनाक्रमों के विश्लेषक डॉ. गल वानी कहते हैं, 'कश्मीर में केंद्र सभी स्टेकहोल्डर्स से बात करना चाहता है. असली स्टेकहोल्डर्स वे हैं, जो स्थितियों को प्रभावित कर सकते हैं और कुछ हटकर कर सकते हैं. और कश्मीर में हाल में यह प्रभाव केवल अलगाववादी गुटों का है.' वे आगे कहते हैं, 'यदि आप कश्मीर में सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल लेकर आते हैं और केवल शिकारावालों से मिलते हैं, तो बेहतर है नहीं आएं.'

First published: 7 September 2016, 8:11 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी