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छत्तीसगढ़: आदिवासियों और पत्रकार से ज्यादा निरंतर हमले हो रहे हैं ईसाइयों पर

शिरीष खरे | Updated on: 10 March 2016, 0:18 IST

"रविवार सुबह साढ़े 11 बजे जिस समय हम प्रार्थना कर रहे थे, करीब दो दर्जन लोगों ने चर्च में घुसकर तोड़-फोड़ कर दी. हर रविवार यहां हमारे (ईसाई) समाज के लोग प्रार्थना करने आते हैं, उस दिन भी करीब 60 लोग चर्च में जमा थे. तभी भगवा कपड़ों में आए लोगों ने धावा बोल दिया. हमलावर 'जय श्री राम' के नारे लगा रहे थे. चर्च में घुसते ही उन्होंने धर्म बदलवाने का आरोप लगाते हुए वहां रखे वाद्य यंत्र, कुर्सी टेबल और पंखों को तोड़ दिया. जब चर्च में मौजूद हमने उनका विरोध किया तो उन्होंने हमारे साथ मारपीट की. पुलिस को सूचना दी तो वे यहां तीन मोटरसाइकिल छोड़कर भाग निकले." ये कहना है चर्च के पास्टर कामले का.

घटना का विवरण देते हुए पास्टर कामले ने आरोप लगाया कि हमलावरों ने महिलाओं के साथ बच्चों को भी नहीं छोड़ा.

गौरतलब है कि रविवार छह मार्च को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के कचना स्थित ईसाई समुदाय के धार्मिक स्थल पर कथित हिंदूवादी संगठन के हमले की घटना में पुलिस ने फादर अंकुश पारीमेकर की शिकायत पर अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया था. पुलिस ने अब तक 10 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है और करीब नौ आरोपियों की तलाश कर रही है.

पुलिस ने अब तक 10 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है और करीब नौ आरोपियों की तलाश कर रही है

गिरफ्तार आरोपियों में पांच नाबालिग हैं. आरोपियों की पहचान उनकी मोटरसाइकिल से हुई, जो वे छोड़कर भागे थे. मुख्य आरोपी प्रणेशानंद के अलावा दीपक साहू फरार है. गिरफ्तार युवकों ने बताया कि उन्हें इन दोनों ने जमा किया था और फिर हमले के लिए चर्च ले गए थे.

युवकों ने रविवार को जिस चर्च पर हमला किया है वह विधानसभा थाना क्षेत्र के अंतर्गत आता है. मिली जानकारी के मुताबिक जिस स्थान पर चर्च बना है वह विवाद की जमीन है. आईजी जीपी सिंह ने बताया कि जमीन पर अतिक्रमण की बात कही जा रही है. इस बिन्दु को ध्यान में रखते हुए घटना की जांच और कानूनी कार्रवाई की जाएगी.

सिंह का कहना है दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई के लिए हमने अलग से टीम का गठन किया है. इसे लेकर एक-दो बार पहले भी विवाद हो चुका है. भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता संजय श्रीवास्तव ने चर्च की मारपीट को जमीन का विवाद बताया है. उन्होंने आरोपियों का बचाव करते हुए कहा कि सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर चर्च का निर्माण किया गया है जिसकी शिकायत गांव वाले कई दिनों से कर रहे थे.

इस पर ईसाई समाज का कहना है कि जमीन पर विवाद नहीं है और न ही ग्रामीणों से इसे लेकर कोई आपत्ति की है. बाहर के कुछ लोगों ने राजनीतिक इशारे पर उत्पात मचाया. क्रिश्चियन फोरम ने धर्म के नाम पर गुंडागर्दी करने का आरोप लगाया है. फोरम का कहना है कि यदि यह सरकारी जमीन थी तो प्रशासन को पहले नोटिस देना था और कानूनी कार्रवाही करनी थी.

मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने चर्च में हुई तोडफ़ोड़ और मारपीट की घटना को गंभीरता से लिया है. उन्होंने इस वारदात की निन्दा करते हुए अल्पसंख्यक समुदाय से कहा कि उन्हें डरने की जरुरत नहीं है. उन्होंने पुलिस के आला अधिकारियों को मामले में लापरवाही न करते हुए सभी आरोपियों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने के निर्देश दिए हैं. सोमवार को इस घटना के विरोध में मसीही समाज के लोगों ने रैली निकाली और विरोध प्रदर्शन किया.

असामाजिक तत्व प्रदेश में लगातार चर्चों और ईसाई समाज के लोगों को निशाना बना रहे हैं

छत्तीसगढ़ क्रिश्चियन फोरम के अध्यक्ष अरुण पन्ना लाल ने बातचीत में बताया, 'असामाजिक तत्व प्रदेश में लगातार चर्चों और ईसाई समाज के लोगों को निशाना बना रहे हैं. यह लोग इस तरह की घटनाओं के जरिए सामाजिक सौहार्द बिगाडऩे की कोशिश कर रहे हैं.' लाल ने जानकारी दी कि बीते एक महीने में प्रदेश के अभनपुर, पिथौरा और कोरबा के चर्चों पर इी तरह के हमले हुए हैं.

संघ समर्थित संगठनों की भूमिका

छत्तीसगढ़ में ईसाई संगठनों की सक्रियता और गाहेबगाहे उन पर हमलों की घटनाएं नई नहीं हैं. लेकिन जिस तरह से पिछले कुछ महीनों में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति बढ़ी है. इसके चलते ईसाई समुदाय के लोगों में डर है. इसके पीछे ईसाई समुदाय राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ और उसके संगठनों को जिम्मेदार मानता है.

जून, 2015 में राजधानी रायपुर में ही एक नन के साथ कथित अनाचार का मामला सामने आया था. तब भी काफी विवाद हुआ था. इस प्रकरण में पुलिस आज तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है.

इन विरोध रैलियों के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी ईसाई संस्थाओं और उनके समर्थन में उतरने वाले संगठनों के प्रति आक्रामक हो उठा है. संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी इंद्रेश कुमार ने 15 नवंबर, 2015 को रायपुर में आयोजित कार्यक्रम में सवाल उठाया था कि ईसाई संस्थाओं या फिर ईसाईयों पर माओवादी हमले क्यों नहीं होते?

हमलों के पीछे ईसाई समुदाय राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ और उसके संगठनों को जिम्मेदार मानता है

इंद्रेश कुमार माओवादियों और ईसाइयों के बीच संबंध स्थापित करना चहते थे. उन्होंने कहा था कि क्यों माओवादी किसी पादरी को निशाना नहीं बनाते हैं. दरअसल छत्तीसगढ़ में ईसाई समुदाय के खिलाफ हो रही घटनाओं की लंबी सूची है जिसे लेकर हिंदूवादी संगठन और ईसाई संस्थाएं आमने-समाने होते रहे हैं.

चर्च पर हमलों की श्रृंखला

13 मार्च, 2013 को बस्तर जिले के लोहड़ीगुड़ा ब्लॉक के ग्राम गाड़ियों में कथिम हिंदूवादी संगठन द्वारा बुलडोजर से चर्च तोड़े जाने की घटना सुर्खियों में रही थी. इस चर्च को तोड़े जाने के पीछे भी अवैध निर्माण को वजह बताया गया था. इसी साल दो अप्रैल को कोंडागांव जिले के छोटे सलना गांव में भी एक प्रार्थनाघर को आग लगाकर फूंक देने की घटना हुई थी.

तब भी घटना के लिए विहिप से जुड़े लक्ष्मण मरकाम और रूपसिंह बघेल पर आरोप लगे थे, लेकिन संगठन के प्रांतीय महामंत्री वीरेंद्र श्रीवास्तव ने उन लोगों को विहिप का सदस्य या पदाधिकारी मानने से इनकार कर दिया था.

इसी तरह, बस्तर में चर्च तोड़े जाने की एक घटना कोड़ेनार इलाके के ग्राम मड़वा में 20 नवंबर, 2007 को हो चुकी है. तब भी कहा गया था कि इसमें विहिप से जुड़े लोग शामिल हैं. मगर पुलिस-प्रशासन इस मामले का भी खुलासा नहीं कर पाया.

बस्तर में ईसाई समुदाय के कब्रिस्तान को क्षतिग्रस्त करने की दो बड़ी घटनाएं हो चुकी हैं

बस्तर में ईसाई समुदाय के कब्रिस्तान को क्षतिग्रस्त करने की दो बड़ी घटनाएं हो चुकी हैं. जगदलपुर से 12 किलोमीटर दूर एक ग्राम जाटम में 22 जून, 2012 को जब कब्रिस्तान को क्षतिग्रस्त करने की घटना हुई थी तब भी विहिप और बजरंग दल का हाथ होने की बात सामने आई थी. इसके बाद 9 जनवरी, 2013 को जगदलपुर में ही कब्रिस्तान की चारदीवारी को क्षतिग्रस्त किया गया.

सितंबर, 2012 को बालोद जिले के भानपुरी गांव में बजरंग दल से जुड़े कार्यकर्ताओं की अगुवाई में सैकड़ों युवकों ने सरजूराम, जनकबाई, उभयराम और डेहराराम पर धर्मांतरण करने का आरोप लगाकर मारपीट की थी. पीड़ित पक्षों की मदद करने वाले एक ईसाई धर्मावलंबी साजू चाको के मुताबिक धर्मान्तरण के बहाने चार परिवारों को महज इसलिए प्रताड़ित किया गया था कि गांव के अन्य लोग उनके प्रभाव में आकर ईसाई धर्म का प्रचार न करने लगें.

यदि कोई धार्मिक भावनाओं और विश्वास को आहत करके अपना हित साधता है तो उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 295 () का इस्तेमाल किया जाता है. मगर प्रदेश में धर्म स्वातांत्र्य अधिनियम का दुरुपयोग हो रहा है. धर्मांतरण के मामले में छत्तीसगढ़ पुलिस धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम का भी उपयोग करती है. इस नियम की धारा 3 4 में यह स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि जब कोई व्यक्ति बल या प्रलोभन के जरिए व्यक्ति को एक धर्म से दूसरे धर्म को अंगीकार करने के लिए बाध्य करेगा तब धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम लागू होगा. इसकी सजा एक साल जेल या पांच हजार रुपये के जुर्माने के तौर पर होगी, लेकिन जब यह अपराध किसी स्त्री, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति के संबंध में होगी तो सजा की अवधि दो साल और जुर्माना दस हजार रुपये होगा.

मगर छत्तीसगढ़ में इस अधिनियम के दुरुपयोग के कई उदाहरण देखने को मिलते हैं. वर्ष 2009 में पुलिस ने बिलासपुर जिले के गौरेला इलाके के एक ईसाई धर्मावलंबी बाबी मसीह पर धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम के तहत कार्रवाई की थी, लेकिन छह जून, 2010 को न्यायालय ने बाबी को दोषमुक्त कर दिया. वर्ष 2007 में भाटापारा इलाके में रहने वाले विजय कुमार मसीह के खिलाफ विवेक कुमार नायक, श्रीराम दीप, पवन व विजय सोनी ने धर्मांतरण के लिए उकसाने का आरोप लगाते हुए रिपोर्ट दर्ज करवाई थी. यह प्रकरण भी अदालत में टिक नहीं सका.

ईसाई संस्थाओं और ईसाइयों पर हो रहे लगातार हमलों से इन आरोपों को बल मिल रहा है कि उन्हें बार-बार निशाना बनाया जाना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है.

First published: 10 March 2016, 0:18 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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