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हाईकोर्ट में अधिकारों की जंग: नजीब जीते, केजरीवाल हारे

कैच ब्यूरो | Updated on: 4 August 2016, 13:30 IST
(पीटीआई)

केंद्र और राज्य के अधिकारों के मामले में दिल्ली की केजरीवाल सरकार को हाईकोर्ट से झटका लगा है. दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में कहा कि उपराज्यपाल दिल्ली कैबिनेट की सलाह के मुताबिक काम करने को बाध्य नहीं है.

हाईकोर्ट ने अधिकारों के जंग से जुड़ी कुल नौ याचिकाओं पर फैसला सुनाया है. हाईकोर्ट ने फैसले में कहा है कि उपराज्यपाल यानी एलजी ही दिल्ली के प्रशासक हैं. 

एलजी ही दिल्ली के प्रशासक

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा, "दिल्ली पर अनुच्छेद 239 लागू होता है. इसके मुताबिक दिल्ली अब भी केंद्रशासित प्रदेश है."

हाईकोर्ट के मुताबिक, एलजी ही दिल्ली के प्रशासक हैं और दिल्ली सरकार उनकी मर्जी के बिना कानून नहीं बना सकती. अनुच्छेद 239 दिल्ली को केंद्र शासित प्रदेश का स्पेशल स्टेटस देता है. 

केंद्र के नोटिफिकेशन सही

हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा, "एलजी दिल्ली सरकार की सलाह मानने को बाध्य नहीं हैं. केंद्र के नोटिफिकेशन सही हैं. दिल्ली सरकार के कमेटी बनाने संबंधी फैसले अवैध हैं."

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साथ ही अदालत ने कहा कि एंटी करप्शन ब्यूरो यानी एसीबी, केंद्रीय कर्मचारियों पर कार्रवाई नहीं कर सकता. दिल्ली सरकार के दोनों मामलों में कमेटी बनाने के फैसले अवैध हैं.

दिल्ली केंद्रशासित प्रदेश

कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी साफ किया कि दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश बना रहेगा. कोर्ट ने कहा, "एलजी अपना स्वतंत्र रुख ले सकते हैं. दिल्ली सरकार को कोई भी नोटिफिकेशन जारी करने से पहले एलजी की मंजूरी लेनी होगी."

हाईकोर्ट ने कहा कि उपराज्यपाल अपने फैसले ले सकते हैं. दरअसल दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद केंद्र और राज्य सरकार के बीच लंबे अरसे से कई मुद्दों पर अधिकारों को लेकर टकराव होता रहा है.

24 मई को दिल्ली हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले मेें केजरीवाल सरकार को राहत देने से इनकार करते हुए हाईकोर्ट के फैसले का इंतजार करने को कहा था.

अधिकारों के विवाद पर 9 याचिकाएं

दरअसल देश के संविधान के आर्टिकल 239-एए के तहत भारत के केंद्र शासित प्रदेश में पुलिस, कानून व्यवस्था और जमीन से जुड़े मामलों में शक्तियां केंद्र के हाथ में हैं. दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में इसे बरकरार रखा है.

दरअसल दिल्ली हाईकोर्ट में कुल 9 याचिकाएं दाखिल की गई थीं. एक नजर अधिकारों के विवाद से जुड़े इस मामले की पांच प्रमुख याचिकाओं पर:

1. दिल्ली सरकार के सीएनजी फिटनेस घोटाले को लेकर जस्टिस एसएन अग्रवाल कमेटी का गठन.

2. डीडीसीए में अनियमितता की जांच के लिए दिल्ली सरकार के गोपाल सुब्रमण्यम कमेटी का गठन.

3. एंटी करप्टशन ब्यूरो के अधिकार क्षेत्र को लेकर केंद्र सरकार के उस नोटिफिकेशन को चुनौती जिसमें कहा गया है कि एसीबी को केंद्रीय कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है.

4. एसीबी में केंद्र सरकार की ओर से मुकेश मीणा की प्रमुख के तौर पर नियुक्ति और अफसरों की नियुक्ति से जुड़ी याचिका.

5. दिल्ली सरकार के सर्किल रेट के नोटिफिकेशन से जुड़ी याचिका, जिसमें कहा गया है कि ये अधिकार एलजी का है.

दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले को केजरीवाल सरकार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. आम आदमी पार्टी के प्रवक्‍ता आशुतोष ने कहा, "हाईकोर्ट के इस फैसले का हम स्‍वागत करते हैं. इसे हम सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे."

क्या था पूरा मामला?

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार की याचिका पर सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए कहा था कि हाईकोर्ट के अधिकारों को बरकरार रखा जाना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "दिल्ली हाईकोर्ट ने पहले ही इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया है. पहले अदालत को फैसला सुनाने दीजिए, उसके बाद याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकता है."

जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार के वकील से पूछा, "आप योग्यता के बजाए केवल अधिकार क्षेत्र के आधार पर हाईकोर्ट पर क्यों सवाल उठा रहे हैं?"

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दिल्ली सरकार का कहना था कि राज्यों और केंद्र की शक्तियों से जुड़े मुद्दे को देखना संविधान के तहत केवल सुप्रीम कोर्ट के ही अधिकार क्षेत्र में है.

दिल्ली सरकार की तरफ से वकील इंदिरा जय सिंह का कहना था कि दिल्ली सरकार और केंद्र के बीच विवाद संविधान के अनुच्छेद 239-ए के तहत राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सरकार (जीएनसीटीडी) की शक्तियों के इर्द-गिर्द केंद्रित है.

आम आदमी पार्टी, केंद्र सरकार पर आरोप लगाती रही है कि वह काम करने में असमर्थ है, क्योंकि इसके ज्यादातर फैसलों को उप राज्यपाल नजीब जंग के कहने पर रद्द कर दिया जाता है या बदल दिया जाता है. इसके लिए उप राज्यपाल की ओर से दलील दी जाती है कि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है.

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दिल्ली सरकार ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट से हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने की मांग की थी. फरवरी, 2015 में दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद लगातार संवैधानिक शक्तियों के मसले पर दिल्ली सरकार का टकराव उप राज्यपाल और गृह मंत्रालय से होता रहा है.

केजरीवाल सरकार और उप राज्यपाल नजीब जंग के बीच एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) और अधिकारियों की नियुक्ति के मसले पर हुई तकरार की मध्यस्थता दिल्ली हाईकोर्ट को करनी पड़ी थी.

उस समय दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ कर दिया था कि अधिकारियों की नियुक्ति आदि के मामले में मुख्यमंत्री को पूरे अधिकार प्राप्त हैं, लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अधिसूचना जारी कर कहा था कि उपराज्यपाल जो कर रहे हैं, वह उचित है. दिल्ली सरकार को उनके निर्देशों का पालन करना चाहिए.

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सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारों के इस विवाद में दिल्ली सरकार को निर्देश देते हुए कहा था कि हाईकोर्ट एक संवैधानिक संस्था है, लिहाजा यह मामला हाईकोर्ट में ही सुना जाए.

First published: 4 August 2016, 13:30 IST
 
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