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शाह होंगे अगले तीन साल तक भाजपा के शाहंशाह

पाणिनि आनंद | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST
QUICK PILL
  • अमित\r\nशाह को भाजपा के अगले अध्यक्ष पद पर बनाए रखने का\r\nनिर्णय भारतीय जनता पार्टी\r\nके नेताओं और राष्ट्रीय\r\nस्वयंसेवक संघ के पदाधिकारियों\r\nने लगभग तय कर लिया है.
  • पार्टी और सरकार में इस बात पर सहमति बन गई है कि शाह का कार्यकाल\r\nखत्म होने के बाद भी पार्टी\r\nको उनकी आवश्यकता है. शाह का वर्तमान कार्यकाल\r\n23 जनवरी\r\nको पूरा हो रहा है.

भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद पर अमित शाह के बने रहने का रास्ता साफ हो गया है. यह आधिकारिक रूप से तय हो चुका है. उच्च स्तरीय सूत्रों ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि शीर्ष नेतृत्व ने अमित शाह को अध्यक्ष बनाए रखने पर फैसला कर लिया है. अब सिर्फ घोषणा होनी बाकी है.

अमित शाह को इस पद पर बनाए रखने का निर्णय भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारियों ने लिया है. उन्होंने महसूस किया कि शाह का कार्यकाल खत्म होने के बाद भी पार्टी में अभी 'शाह-हुकूमत' ही जारी रखने की आवश्यकता है. बताते चलें कि शाह का वर्तमान कार्यकाल 23 जनवरी को पूरा हो रहा है.

शाह ने उस समय पार्टी की कमान अपने हाथ में ली थी, जब राजनाथ सिंह गृहमंत्री के रूप में मोदी के मंत्रिमंडल में शामिल हो गए थे. तकनीकी तौर पर देखा जाए तो अमित शाह अब पहली बार पार्टी के अध्यक्ष के रूप में चुने जाएंगे, क्योंकि अब तक तो वे राजनाथ सिंह का बचा हुआ कार्यकाल ही पूरा कर रहे थे.

लेकिन असली कहानी कुछ और है. भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कैच को बताया, “हकीकत यह है कि अमित शाह का स्थान लेने की स्थिति में अभी कोई है ही नहीं. पार्टी में अभी कोई ऐसा नहीं है जो उन्हें चुनौती दे सके और उनकी जगह ले सके.”

शाह ने उस समय पार्टी की कमान अपने हाथ में ली थी, जब राजनाथ सिंह गृहमंत्री के रूप में मोदी के मंत्रिमंडल में शामिल हो गए थे

उन्होंने आगे जोड़ा, “अमित शाह को भाजपा के अध्यक्ष पद से हटाया जाएगा या नहीं, यह तो सिर्फ मीडिया द्वारा गढ़ा गया सवाल था, पार्टी मेें ऐसी कोई चर्चा तक नहीं हुई. दूसरा कोई नेता तो इस पद के लिए इच्छुक ही नहीं था. हमारा पूरा ध्यान कई राज्यों में होने वाले चुनावों पर है, ना कि इस बात पर कि उनकी जगह कौन ले सकता है.”

शाह आज भी शाहंशाह क्यों हैं?

2014 के लोकसभा चुनावों में जीत का शानदार परचम लहराने के बाद भारतीय जनता पार्टी को अगले ही साल 2015 में दिल्ली और बिहार में बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा. यहां तक कि पार्टी के वरिष्ठ नेता, मार्गदर्शक मंडल ने तो हार की जिम्मेदारी तय करने और खुद कमान संभालने तक की बात चला दी थी.

लेकिन इस सबके बावजूद अमित शाह अपने पद पर बने रहे. यह रहस्योद्घाटन भले चौंकाने वाला है कि पार्टी में कोई भी शाह की जगह लेने का इच्छुक नहीं था, लेकिन इसके पीछे ये पांच और मजबूत कारण भी हैं:

1) शाह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दाहिना हाथ हैं. मोदी को शाह से बेहतर कोई नहीं समझता और दोनों के बीच सामंजस्य भी गजब का है. ऐसे में स्वाभाविक है कि प्रधानमंत्री शाह को हटाकर किसी और को लाने पर सहमत ही नहीं होते.

2) शाह को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर पूरा कार्यकाल नहीं मिला है, वर्तमान में तो वह राजनाथ का बचा हुआ कार्यकाल पूरा कर रहे थे. शाह के समर्थकों का मानना है कि शाह जो कुछ करने में सक्षम हैं, वह करने के लिए उन्हें पूरा समय नहीं मिल पाया है.

3) पार्टी में जो भी नेता या नेत्री अमित शाह के खिलाफ राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के लिए खड़ा होता, प्रधानमंत्री मोदी की नजर में उसका दर्जा विद्रोही जैसा हो जाता. भाजपा के वर्तमान "मोदीफाइड” अवतार में दूसरे पावर सेंटर के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता, ऐसे में भला कौन ऐसा जोखिम उठाने को तैयार होता?

4) दिल्ली और बिहार की हार भूत की तरह भारतीय जनता पार्टी का पीछा कर रही है और इसी वर्ष (2016 में) चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. इन पांचों स्थानों पर भाजपा मजबूत स्थिति में नहीं है. असम को छोड़ दिया जाए तो पश्चिमी बंगाल, तमिलनाडु, केरल या पुडुच्चेरी में से कहीं भी भाजपा की जीत की संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती. ऐसी स्थिति में यदि सब कुछ उम्मीद के अनुरूप होता है और भाजपा चुनाव नहीं जीत पाती तो कोई भी (पार्टी अध्यक्ष बनकर) हार की यह तोहमत अपने सिर लेने का इच्छुक नहीं होगा.

5) इन पांचों राज्यों के बाद उत्तर प्रदेश और पंजाब में अगले वर्ष 2017 में चुनाव होने हैं, जो पार्टी के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं. इन दोनों ही राज्याें में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में असंतोष बढ़ता जा रहा है. ऐसे में शाह को हटाकर उस पद पर बैठना किसी के लिए भी शुभ नहीं होता. ऐसी परिस्थितियों में राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभालना बहुत जोखिम का काम है और स्पष्ट नजर आ रहा है कि पार्टी में कोई भी यह खतरा मोल लेने को तैयार नहीं है.

कोई और बदलाव होगा?

शाह को उनकी मैनेजमेंट क्षमता और पार्टी काडर के साथ जुड़ाव के लिए जाना जाता है. वे राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद संगठन में कई महत्वपूर्ण पदों पर अपने करीबी लोगों की नियुक्ति कर चुके हैं. साफ है कि वे अध्यक्ष बने रहेंगे तो संगठन में पदाधिकारियों में बदलाव जरूर होंगे, भले कम हों. अनुमान लगाया जा रहा है कि शाह के करीबी श्रीकांत शर्मा जैसे कुछ लोगों का कद बढ़ाया जा सकता है.

कुछ ऐसी चर्चाएं भी चल रही हैं कि संगठन सचिव राम लाल को बदला जा सकता है, लेकिन पार्टी से जुड़े लोग इन चर्चाअों को सिरे से खारिज कर रहे हैं.

राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद संगठन में कई महत्वपूर्ण पदों पर शाह अपने करीबी लोगों की नियुक्ति कर चुके हैं

पार्टी के एक सूत्र ने खुलासा किया कि "कुछ मिलाकर यह 'टीम शाह' है. नीतिगत कारणों से कुछ को नई जिम्मेदारी दी जा सकती है तो कुछ को बदला भी जा सकता है, लेकिन टीम के 80 प्रतिशत लोग वही रहेंगे."

अमित शाह के साथ-साथ भाजपा शासित राज्यों में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी अपने पद पर बने रहेंगे. उन्होंने आगे कहा, "राज्यों में पार्टी को चेहरे बदलने की कोई जल्दबाजी नहीं है. अधिकांश राज्यों में ताजी-ताजी सरकार हैं और वहां के पार्टी प्रदेश अध्यक्षों की अमित शाह के अलावा अपने-अपने राज्य के मुख्यमंत्रियों से भी अच्छी घनिष्ठता है."

सिर्फ उत्तर प्रदेश ऐसा राज्य है, जिस पर यह निर्णय नहीं हो पाया है कि पार्टी का नेतृत्व कौन करेगा. उत्तर प्रदेश में वर्ष 2017 में लोकसभा चुनाव होंगे. उत्तर प्रदेश के बड़े आकार, बहुतायत विधानसभा सीटों और देशभर को प्रभावित करने वाला राज्य होने के कारण पार्टी को यहां की कमान सौंपने में कोई हड़बड़ी नहीं है.

पार्टी यहां ऐसा चेहरा चुनना चाहती है जो सही तरीके से प्रदेश की कमान संभाल सके और इसका फैसला अध्यक्ष के रूप में नया कार्यकाल शुरू करने के बाद अमित शाह ही लेंगे.

First published: 23 January 2016, 12:38 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बीबीसी हिन्दी, आउटलुक, राज्य सभा टीवी, सहारा समय इत्यादि संस्थानों में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके हैं.

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