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शहीद दिवस 2019: भगत सिंह ने फांसी के पहले लिखी थी अपने आखिरी खत मेें ये बातें, जानिए क्या थे वो शब्द

कैच ब्यूरो | Updated on: 23 March 2019, 10:11 IST
Bhagat Singh 87th death anniversary

देश के युवाओं का आदर्श आज भी क्रांति की अलख जगाने वाला भगत सिंह ही है लेकिन भगत सिंह के मन में धर्म के बारे में क्या राय थी यह कम लोगों को ही पता है. भगत सिंह ने साल 1931 में जेल से इस मुद्दे पर एक पत्र लिखा था जो 27 सितंबर 1931 को लाहौर के एक अखबार 'द पीपल' में प्रकाशित हुआ था. 

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भगत सिंह ने अपने लेख में लिखा था,"साथियों स्वाभाविक है जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए. मैं इसे छिपाना नहीं चाहता हूं, लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूं कि कैंद होकर या पाबंद होकर न रहूं. मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है.क्रांतिकारी दलों के आदर्शों ने मुझे बहुत ऊंचा उठा दिया है, इतना ऊंचा कि जीवित रहने की स्थिति में मैं इससे ऊंचा नहीं हो सकता था. मेरे हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ने की सूरत में देश की माताएं अपने बच्चों के भगत सिंह की उम्मीद करेंगी. इससे आजादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना नामुमकिन हो जाएगा. आजकल मुझे खुद पर बहुत गर्व है. अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतजार है. कामना है कि यह और नजदीक हो जाए."

 
Bhagat Singh
इस लेख में भगतसिंह ने ईश्वर कि उपस्थिति पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किये हैं और इस संसार के निर्माण, मनुष्य के जन्म, मनुष्य के मन में ईश्वर की कल्पना के साथ साथ संसार में मनुष्य की दीनता, उसके शोषण, दुनिया में व्याप्त अराजकता और और वर्गभेद की स्थितियों का भी विश्लेषण किया था.
 

दरअसल, स्वतन्त्रता सेनानी बाबा रणधीर सिंह 1930-31 के बीच लाहौर के सेन्ट्रल जेल में कैद थे. वे एक धार्मिक व्यक्ति थे जिन्हें यह जान कर बहुत कष्ट हुआ कि भगतसिंह का ईश्वर पर विश्वास नहीं है. इसके बाद वे किसी तरह भगत सिंह की कालकोठरी में पहुँचने में सफल हुए. उन्होंने भगत सिंह को ईश्वर के अस्तित्व पर यकीन दिलाने की भरसक कोशिश की. लेकिन उन्हें असफलता हाथ लगी. असफल होने पर बाबा ने नाराज होकर कहा, “प्रसिद्धि से तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है और तुम अहंकारी बन गए हो जो कि एक काले पर्दे के तरह तुम्हारे और ईश्वर के बीच खड़ी है."

First published: 23 March 2019, 10:11 IST
 
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