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शामली, उत्तर प्रदेश: दलितों के दो दुश्मन- गरीबी और उपेक्षा

सादिक़ नक़वी | Updated on: 16 August 2016, 8:16 IST
QUICK PILL
भारत के 70 वें स्वतंत्रता दिवस पर कैच न्यूज का सवाल? देश के दूरदराज के इलाकों के लोग कितने आजाद हैं, किन मायनों में आजाद हैं और उनके लिए भविष्य की आजादी का सपना क्या है? उन्हें किस तरह की आजादी और सुविधाएं चाहिए?इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने हम राष्ट्रीय राजधानी से 70 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश के शामली जिले में पहुंचे. यह है वहां की असल तस्वीर.

खुद को ‘डाॅक्टर’ बताने वाले रामपाल कहते हैं, ‘हमारे लिए वाकई स्थितियां बदल गई हैं.’ वह उत्तर प्रदेश के शामली जिला मुख्यालय स्थित अस्पताल के आॅपरेशन थियेटर में एक तकनीशियन का काम करते थे. अब वहां से अपने गांव गोहोर्नी लौट कर रामपाल ने अपना क्लिनिक खोल लिया है.

अपने अतीत के बारे में बताते हुए वह कहते हैं, ‘अब मैं 800 से 1000 रुपए प्रतिदिन कमा लेता हूं. मेरे पिताजी इतने सक्षम नहीं थे कि हम अपनी पढाई जारी रख पाते इसलिए दसवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद मुझे काम ढूंढ़ना पड़ा. जब हम बड़े हो रहे थे तब दलितों के खिलाफ भेदभाव साफ जाहिर था. दूसरी जाति के लोग हमें अपने घर के कार्यक्रमों में नहीं बुलाते थे. यहां तक कि वे हमारे साथ खाना भी नहीं खाते थे. अब सब कुछ बदल गया है, हर वर्ग का व्यक्ति मेरे पास दवाई लेने आता है.’

कभी क्लिनिक रहे इस नाई की दुकान की दीवारें डा. भीमराव अम्बेडकर और संत रविदास की तस्वीरों से सजी हैं. हाल ही उसने अपना क्लिनिक नई दुकान में शिफ्ट कर लिया है और यह दुकान अपने एक रिश्तेदार को दे दी, जो नाई का काम करता है.

गोहोर्नी हिन्दी भाषी उत्तर प्रदेश के बीच बसा शामली जिले का पक्की सड़क वाला एक एक बड़ा सा गांव है. परन्तु  सब दलितों की हालत रामपाल जैसी नहीं है. गांव की आबादी का एक चौथाई हिस्सा दलित है और आजादी के 69 वर्षों बाद भी उनकी हालत में कोई सुधार नहीं आया है.

जागरूकता की कमी

आज के भारत में दलितों की परेशानी का मुख्य कारण सिर्फ गौ रक्षक नहीं हैं. उनकी असली परेशानी अत्यधिक गरीबी और सरकारी योजनाओं के प्रति जागरूकता का अभाव है. दलित महिलाएं इस बात से दुखी हैं कि अब भी उन्हें महज 200 रूपए की दिहाड़ी के लिए ईंट भट्टों में तपना पड़ता है. अन्य लोग सरकार द्वारा उन्हें लीज पर दी गई कृषि भूमि के पट्टे की लीज समाप्त होने पर खेतों में काम करते हैं.

चूंकि पूरा का पूरा परिवार ही मजदूरी करने को मजबूर है, इसलिए अक्सर बच्चों को स्कूल में भर्ती नहीं करवाया जाता, जबकि वहां मिड डे मील के अलावा नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है. इनमें से ज्यादातर लोग इस बात से अनजान हैं कि मनरेगा याजना में कैसे नाम लिखवाएं या मुफ्त एलपीजी गैस कनेक्शन के लिए कैसे आवेदन करें, भले ही वे चूल्हों पर खाना पकाते रहें.

बिमला देवी कहती हैं, ‘ग्राम प्रधान हमारी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लेते और हम जिला मजिस्ट्रेट के पास नहीं जाते. वे नहीं मानती कि जिला मजिस्ट्रेट को शिकायत करना कोई उचित कदम है. इस कमोबेश समृद्ध और उपजाऊ इलाके के कुछ घरों में बेतहाशा गरीबी पसरी है.

रामपाल जैसे आर्थिक रूप से सक्षम लोग अधिक जागरुक हैं. वह कहते हैं, ‘बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर जो हमारे हक के लिए लड़े उनके अलावा मायावती जैसे नेता जिन्होेंने हमें आरक्षण दिलाया, उनकी वजह से इतना तो सुनिश्चित हो गया कि आज दलित अपने अधिकारों की रक्षा के लिए एक पुलिस अधिकारी या जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष खड़ा है.

First published: 16 August 2016, 8:16 IST
 
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