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खड़से के इस्तीफे पर शिवसेना ने पुराने जख्म को याद कर मनाया जश्न

अश्विन अघोर | Updated on: 7 June 2016, 23:07 IST

महाराष्ट्र के पूर्व राजस्व मंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता एकनाथ खड़से के इस्तीफे के बाद पार्टी राजनीतिक आंधी थम जाने की उम्मीद लगा रही थी. लेकिन कहानी इस उम्मीद से बिल्कुल उल्टी है. विपक्षी पार्टियां बोलने में थोड़ा एहतियात बरत रही हैं लेकिन एनडीए का हिस्सा और बीजेपी की पुरानी साथी शिवसेना में जश्न का माहौल है.

शिवसेना का कहना है कि खड़से के साथ ये सब इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने पार्टी से टकराने की कोशिश की थी. खड़से के पीए की गिरफ़्तारी के बाद से ही शिवसेना नेता उनके इस्तीफ़े की मांग को लेकर काफी आक्रामक थे. खड़से के पीए पर मुंबई के नजदीक ज़मीन आवंटन के लिए एक एनजीओ से रिश्वत लेने का आरोप है.

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शिवसेना के पास खड़से के पतन पर खुशी मनाने की वजह भी है. 2014 विधानसभा चुनाव के पहले, कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे को खड़से ने फोन करके बीजेपी-शिवसेना गठबंधन तोड़ने का बीजेपी फैसला बताया था. इसकी उम्मीद शिवसेना को कतई नहीं थी. उनको विश्वास था कि बीजेपी झुक जाएगी और साथ छोड़ने की हिम्मत नहीं करेगी. तब से ही शिवसेना खड़से से हिसाब बराबर करने का इंतज़ार कर रही थी.

शिवसेना का कहना है कि खड़से के साथ ये सब इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने पार्टी से टकराने की कोशिश की थी

खड़से पर एक के बाद एक लगे आरोपों ने शिवसेना को मनचाहा मौका दे दिया. हर आरोप के साथ खड़से के ख़िलाफ़ शिवसेना की आवाज़ बुलंद और आक्रामक होती गयी है. जब खड़से पर महाराष्ट्र इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन से अवैध तरीक़े से ज़मीन खरीदने का आरोप लगा तो पार्टी ने अपनी पूरी ताकत से हमला बोला.

उद्योग मंत्रालय शिवसेना के पास है इसलिए पार्टी के लिए खड़से के केस को बिगाड़ना और उनके बेगुनाही के दावों को खत्म करना लाज़मी था. इसीलिए 4 जून को खड़से के इस्तीफ़ा के बाद सबसे ज़्यादा खुशी शिवसेना नेताओं में थी.

ये सिर्फ़ बीजेपी-शिवसेना गठबंधन टूटने का हिसाब बराबर करने का मामला नहीं है बल्कि जलगांव से शिवसेना के वरिष्ठ नेता सुरेश जैन का मामला भी इसमें शामिल है जो खड़से की वजह से पिछले 4 साल से जेल में हैं. जैन जलगांव में हुए हाउसिंग घोटाले में आरोपी हैं.

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खड़से के इस्तीफ़े के बाद जलगांव में शिवसेना कार्यकर्ताओं ने पूरे शहर में आतिशबाजी की. इस जश्न के साथ ही सोमवार को मुखपत्र सामना के एडिटोरियल में भी खड़से पर निशाना साधा. संपादकीय में लिखा गया कि एक बार फिर ये साबित हो गया कि जो भी शिवसेना से टकराता है वो बर्बाद हो जाता है.

सम्पादकीय का कहना है कि, "शुरू से ही खड़से गठबंधन तोड़ने की बात कहने के साहस पर गर्व करते आये हैं. उन्होंने हमेशा इस पर खुशी जताई, और इस बात का अहंकार भी रहा है कि उनमें ऐसा करने की हिम्मत है. इतिहास ने एक बार फ़िर ये साबित कर दिया है कि, जिसने भी शिवसेना के रास्ते में आने की कोशिश की है उसका या तो पतन हो गया है, या उसे सलाखों के पीछे जाना पड़ा है. नफरत से हासिल की गई ताकत सेना के लिए सिर्फ बुलबुला है और ये बुलबुले अब फूटना शुरु हो गए हैं."

संपादकीय में कहा गया है कि खड़से का इस्तीफा होना ही था, बस वक्त का इंतजार था कि मुख्यमंत्री फड़नवीस कब चेन खींचते हैं. मुख्यमंत्री फड़नवीस खड़से से काफी जूनियर नेता हैं इसलिए खड़से मुगालते में थे कि वो ऐसा फैसला नहीं करेंगे.

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री फड़नवीस की संपादकीय में जमकर तारीफ की गई है.

उन्होंने ये नहीं सोचा था कि यही जूनियर उनके पांवों तले से ज़मीन खींच लेगा. जब बीजेपी के बड़े नेताओं ने खड़से को हटाने का फैसला किया तो एक भी व्यक्ति ने उनका साथ नहीं दिया.

संपादकीय में खड़से पर सबसे तीखा हमला ये कहकर किया गया कि जैन ने भी बेगुनाही का दावा किया है फिर वो जेल में खड़से कैबिनेट में क्यों रहें?

खड़से पर कटाक्ष करते हुए सामना के सम्पादकीय में लिखा गया है कि, 'विपक्ष में रहते हुए खड़से ने कई नेताओं पर निराधार और झूठे आरोप लगाते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग की थी तो अब बारी उनकी है.

मुख्यमंत्री फड़नवीस की तारीफ़

इस मामले में कड़ी कार्रवाई और खड़से के पीए की ऑफिस से गिरफ़्तारी के लिए मुख्यमंत्री फड़नवीस की संपादकीय में जमकर तारीफ की गई है. संपादकीय के मुताबिक "ये मुख्यमंत्री की कार्यक्षमता को दिखलाता है. खड़से जो हमेशा अपने विरोधियों को छकाने के लिए जाने जाते हैं, इस बार वो ये समझने में चूक गए कि उनका पीए पूरी तरह से निगरानी में था.

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खड़से पर जब भी आरोप लगाए गए तो उन्होंने विपक्ष को सबूत लाने की चुनौती दी. उन्होंने यहां तक कहा कि अगर उनके ख़िलाफ़ सबूत मिल गए तो वो राजनीति छोड़ देंगे. सम्पादकीय में कहा गया है कि जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं, उन सबका यही कहना होता है. चाहे वो अशोक चव्हाण हों, छगन भुजबल हों, रॉबर्ट वाड्रा हों या सुरेश जैन.

संपादकीय का कहना है कि अब खड़से उन पर लगे आरोपों के मीडिया ट्रायल पर हाय तौबा मचा रहे हैं . उनको ये नहीं भूलना चाहिए कि उन्होंने भी पूर्व में ठीक ऐसा ही किया है. और अब वो अपना बोया हुआ ही काट रहे हैं.

First published: 7 June 2016, 23:07 IST
 
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