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श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में एक ही स्कूल के 42 छात्र, वे खेलते नहीं सिर्फ पढ़ते हैं

श्रिया मोहन | Updated on: 7 July 2016, 7:53 IST

17 वर्षीय श्रीहरि को शौक था कि वह 12वीं बोर्ड की परीक्षा अच्छे नंबरों से पास कर सकें. उसकी एकमात्र इच्छा थी कि उसे नई दिल्ली के प्रतिष्ठित श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (एसआरसीसी) में एडमिशन मिले. भविष्य की उसकी योजना चार्टर्ड एकाउंटेंट बनने की है. अप्रैल में जब 12वीं का रिजल्ट आया तो एडमिशन का उसका सपना साकार हो गया. उसे 1200 में से 1188 अंक हासिल हुए हैं. यह 99 प्रतिशत था.

श्रीहरि का कहना है कि उसके सबसे ज्यादा पंसदीदा विषय हैं- एकाउंट्स, इकोनॉमिक्स और कॉमर्स. उसे इन विषयों में 98.87 फीसदी अंक मिले हैं. श्रीहरि ही अकेला छात्र नहीं है. उसके साथ ही भारतीय विद्या भवन की इरोड इकाई के 42 अन्य छात्रों को भी एसआरसीसी में प्रवेश मिला है.

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यहां हाई कट ऑफ गई है. मीडिया ने एक ही स्कूल से इतनी बड़ी संख्या में छात्रों को देश के सबसे प्रतिष्ठित कॉलेज में दाखिले पर हैरानी जताई है. परिणाम घोषित होने के साथ ही मीडिया इस पर सवाल खड़े कर रहा है.

भारतीय विद्या भवन, इरोड की प्रिंसिपल एनएस कार्तिकेयनी का कहना है कि ये छात्रों और शिक्षकों की कड़ी मेहनत का नतीजा है. प्रिंसिपल के मुताबिक पिछले साल भी उनके स्कूल से 36 छात्र एसआरसीसी में दाखिला लेने में सफल हुए थे. स्कूल में कॉमर्स के 172 छात्र थे. इन छात्रों को 1200 में से औसतन 1193 अंक मिले हैं.

प्रिंसिपल कार्तिकेयनी कहती हैं कि हम अपने छात्रों को कॉमर्स विषय लेने के लिए प्रेरित करते हैं. मेडिकल में सीमित सीटें हैं. आईटी में भी बहुत मारामारी है. लेकिन, कॉमर्स में पर्याप्त विकल्प हैं. आप यह विषय लेकर सीए बन सकते हैं, कंपनी सचिव बन सकते हैं, एन्टरप्रेन्योर, नौकरशाह के साथ सभी कुछ. यदि आप शत-प्रतिशत नम्बर लाएंगे तो टॉप कॉलेज जैसे सीआरसीसी या बेंगलुरु के क्राइस्ट कॉलेज में एडमिशन मिल सकता है. इन संस्थानों में विशुद्ध रूप से मेरिट के आधार पर प्रवेश मिलता है.

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कार्तिकेयनी यह भी बताती हैं कि हम बच्चों की तैयारी कक्षा 11 के पहले दिन से ही कराना शुरू कर देते हैं. हम यह इंतजार नहीं करते कि बारहवीं की कक्षाएं शुरू हों और तब बोर्ड परीक्षा की तैयारी कराई जाए. सभी अध्यापक एम कॉम और बी एड डिग्रीधारक हैं. उन्हें कॉमर्स की कक्षाएं पढ़ाने का कम से कम 15 साल का अनुभव है. पूरे साल भर हर छात्र का हफ्ते में दो बार टेस्ट लिया जाता है. ताकि उसकी प्रगति के बार में पता चलता रहे. कार्तिकेयनी कहती हैं कि बाकी के दिनों में होम वर्क पर्याप्त है. इसके अलावा स्कूल में तनावमुक्त वातावरण है. तनाव से मुक्ति के लिए आर्ट आफ लिविंग, खेल और अतिरिक्त गतिविधियों पर ध्यान दिया जाता है.

दिशा-निर्देशों का बिना सोचे-समझे पालन

जब कैच ने श्रीहरि से बात की और एसआरसीसी में एडमिशन के लिए उसे बधाई दी तो उसका जवाब उत्साह से ओतप्रोत था. इस रिपोर्टर का सवाल पूरा भी न हुआ था कि उसने कहा कि एसआरसीसी देश के सर्वोत्तम कॉमर्स के कॉलेजों में से एक है. मुझे गर्व है कि मैं उसका एक छात्र हूं.

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इरोड के रहने वाले श्रीहरि का पहला स्कूल राज्य के शिक्षा बोर्ड से संबंद्ध भारतीय विद्या भवन था. यहां से उसने कक्षा पांच पास किया. इसके बाद उसने कक्षा छह से 10 तक की पढ़ाई सीबीएसई से संबद्ध सीएस एकेडमी से की. 10वीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वह फिर भारतीय विद्या भवन में आ गया ताकि कक्षा 12 की राज्य बोर्ड की परीक्षा में उत्तीर्ण होना सुनिश्चित हो जाए.

क्या यह आम रणनीति है?

इस सवाल पर श्रीहरि ने विनम्रता से जवाब दिया कि आम रणनीति यही होती है कि हम अपने शिक्षकों के दिशा-निर्देशों का आंख मूंदकर पालन करते हैं. परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए इससे अच्छा कुछ और नहीं है.

कार्तिकेयनी यह भी बताती हैं कि उनके स्कूल की सफलता की एक और वजह यह भी है कि हम तैयारी बहुत अच्छे से कराते हैं. छात्रों को साल भर सीबीएसई स्तर के परीक्षा की कठिन तैयारी कराई जाती है ताकि वे परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन कर सकें. इस तरह वे राज्य की बोर्ड परीक्षा देते हैं जो अपेक्षाकृत आसान होती है.

क्या श्रीहरि या उसके टॉपर मित्रों ने कोचिंग सेन्टर या ट्यूशन ली? इस पर जवाब था नहीं, किसी ने भी कभी नहीं. हमारा स्कूल इतना सक्षम है.

एसआरसीसी के भीतर गूंज

सालों से एसआरसीसी धीमी गति से बदलाव का गवाह रहा है. कक्षाओं की प्रोफाइल और विविधता भी बदली है. पिछले दशक में तमिलनाडु के छात्रों की संख्या में बढ़ोत्तरी देखी जा रही है. इस साल जिन 160 छात्रों को बी कॉम आनर्स में एडमिशन मिला, उनमें से 110 तमिलनाडु के हैं. चार छात्रों में से एक भारतीय विद्या भवन, इरोड का है.

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एसआरसीसी में भारतीय विद्या भवन, इरोड के छात्रों की संख्या में हर साल इजाफा हो रहा है. पिछले साल 36 छात्रों को एसआरसीसी में प्रवेश मिला था. उसके पहले के साल में 28 छात्रों को.

लेकिन एसआरसीसी के प्रोफेसर तुरंत ही स्पष्ट कर देते हैं कि ज्यादा अंक छात्रों की ब्राइटनेस या योग्यता का संकेत नहीं है. एसआरसीसी में इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर संजय गोहिदार कहते हैं कि हम यह आकलन कर लेते हैं कि अंक बच्चे की योग्यता का मापक है. यह गलत है. तीन साल पहले तक कई कॉलेज अलग से इन्ट्रेंस एग्जाम लेते थे.

वह कहते हैं कि अनुभवों से पता चला है कि सीबीएसई में अंग्रेजी की परीक्षा में छात्रों ने जो अंक पाए थे, वह उनकी पढ़ने, लिखने और अंग्रेजी साहित्य की समझ की काबिलियत से बिल्कुल अलग था. प्रो. गोहिदार 95 फीसदी या 99 फीसदी में अंतर बताते हुए कहते हैं कि इसे केवल मूल्यांकन का तरीका कहा जा सकता है.

एक चिन्तानक पहलू यह भी है कि पूरे देश के स्थानीय बोर्डों में ग्रेड देने का प्रचलन बढ़ रहा है. गोहिदार कहते हैं कि तमिलनाडु बोर्ड के टॉपर हों या अन्य किसी राज्य के, एसआरसीसी जैसे प्रतिष्ठित कॉलेज में कभी भी एडमिशन नहीं पा सकते. हाई कट आफ केवल सीबीएसई छात्रों की जाती है लेकिन यह पैमाना भी इल्जाम लगाने लायक है?

गोहिदार कहते हैं कि तमिलनाडु बोर्ड अब अंक देने में उदार हो रहा है. लेकिन वास्तविक दोषी तो सीबीएसई और आईसीएसई हैं जिन्होंने 20 साल पहले बेतहाशा अंक देने की शुरुआत कर दी थी.

एसआरसीसी में ही अर्थशास्त्र के प्रोफेसर राकेश रंजन कहते हैं कि तमिलनाडु के ये छात्र हिन्दी में 100 में से 100 अंक लाए हैं. लेकिन यदि आप कोई सवाल पूछेंगे तो वे एक का भी उत्तर संतोषजनक तरीके से नही दे पाएंगे. रंजन कहते हैं कि समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान, साहित्य में उन्हें 100 में से 100 अंक मिल जाते हैं. यह सब कैसे हो जाता है? ज्यादा अंक देने की शुरुआत तो सीबीएसई और आईसीएसई ने शुरू की थी. राज्यों ने भी यही पद्धति अपना ली है.

गोहिदार और रंजन कहते हैं कि ज्यादा अंकों से एक समस्या और खड़ी हो गई है कि सही उत्तर कैसे लिखा जाए. छात्रों को सिखाया जाता है कि उन्हें कितना और किन बिन्दुओं पर लिखना है ताकि अच्छे अंक आ सकें. पहले ऐसा नहीं था. रंजन कहते हैं कि कुछ लोगों का मानना है कि स्कूल व्यवस्था का लाभ उठा रहे हैं. किसी को भी यह जानकारी लेनी चाहिए कि उसने जो उत्तर लिखा है, उसे किसने ठीक किया है और उसे करेक्शन को अपने पेपर से मिलान करना चाहिए. अन्यथा यह तो नासमझी है.

उधर, कार्तिकेयनी कहती हैं कि अगर आपके पास एक-समान सिलेबस और बोर्ड है तो ऐसी कोई समस्या नहीं आने वाली.

गोहिदार का मानना है कि शिक्षा राज्य का विषय है और रीजनल वेरिएशन महत्वपूर्ण है. हमें जल्द ही ऐसा कोई अन्य रास्ता निकालना चाहिए जिससे योग्यता को सही तरीके से मापा जा सके और दिशा-निर्देशों व नीतियों को तैयार किया जा सके.

First published: 7 July 2016, 7:53 IST
 
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