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'नीतीश कुमार ने बिहार की आधी आबादी को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया'

Shubhrastha | Updated on: 10 February 2017, 1:49 IST
(पीटीआई)
QUICK PILL
शुभ्रस्था ने लोकसभा चुनाव (2014) में बीजेपी के लिए और बिहार विधानसभा चुनाव में जद(यू) के लिए काम किया. असम विधानसभा चुनाव के दौरान और उसके बाद से वो बीजेपी के लिए काम कर रही हैं. उन्होंने बिहार में हुए कथित बलात्कार पर नीतीश कुमार को खुला खत लिखा जिसका जवाब बिहार पुलिस ने अपने फेसबुक पर दिया, जिसके जवाब में शुभ्रस्था ने एक और खुला खत लिखा. पेश है उनके दूसरे खत का संपादित रूप.

24 जून को मैंने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को एक खुला खत लिखा जिसमें मैंने राज्य में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों से उपजी पीड़ा को अभिव्यक्ति दी थी. मैं बिहार से हूं और पिछले विधानसभा चुनाव में मैंने नीतीश कुमार के लिए कम्युनिकेशन कंसल्टेंट के तौर पर काम किया था. मैं महिलाओं के मुद्दे पर नीतीश कुमार की चुप्पी से काफी आहत हूं.

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तीन दिन बाद बिहार पुलिस ने फेसबुक पर मेरे खत का जवाब दिया. दुखद है कि पहले ही जवाब में उन्होंने बलात्कार पीड़ित महिलाओं के नाम सार्वजनिक कर दिए, जिसे स्थानीय मीडिया ने भी लपक लिया. उसके बाद नुकसान की भरपाई के लिए आनन-फानन बिहार पुलिस ने पोस्ट डिलीट करते हुए एक संपादित पोस्ट प्रकाशित की.

बिहार पुलिस के जवाब का बिंदुवार उत्तर देने से पहले मैं बिहार सरकार को मेरे पत्र का संज्ञान लेने के लिए धन्यवाद करना चाहूंगी. कथ्य और रूप दोनों ही स्तर पर जिस असंवदेनशील तरीके से बिहार पुलिस ने जवाब दिया उसके बाद मैं ये भी कहना चाहूंगी कि मेरे राज्य बिहार में जंगलराज वापस आ चुका है. 

1. असंवेदनशील

सार्वजनिक घोषणा करके उन्होंने एक जघन्य अपराध को एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बना दिया है. पीड़ितों को दिए गए आर्थिक मदद का जिक्र करके उन्होंने दिखा दिया है कि उन्हें भावनात्मक, शारीरिक और मानसिक तौर पर झकझोर देने वाले इस विषय के प्रति कोई सरोकार नहीं है. 

मेरा पत्र एक राजनीतिक औजार होने के बावजूद सहज भावनात्मक अभिव्यक्ति था, जो जद(यू) की सैकड़ों महिला कार्यकर्ताओं की बिना पर लिखा गया था. मेरे पत्र में बिहारी महिलाओं के सामूहिक आक्रोश को आवाज दी गई थी. 

महिलाओं की सुरक्षा के लिए ठोस कार्रवाई करने की बजाय उन्होंने सरकारी बाबूगिरी का रास्ता चुना. क्या बिहार सरकार को ये भ्रम है कि बलात्कार पीड़ितों को पैसा दे देना या बलात्कार का मामला दर्ज कर लेना काफी है? क्या यही है बिहार मॉडल?

2. गलत आंकड़े

पुलिस ने अपने जवाब में एनसीआरबी के 2015 के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा है कि बिहार तुलनात्मक रूप से महिलाओं के लिए 'सुरक्षित' है.

महिलाओं की जमीनी और सुरक्षा के अभाव और साल 2015 में नीतीश कुमार के सत्ता में आन के बाद से बलात्कार और यौन उत्पीड़न की घटनाओं में हुई बढ़ोतरी को देखते हुए ये दावा विरोधाभासी लगता है.

मैंने अपने पत्र में केवल जून 2016 में हुई चिंताजनक घटनाओं का जिक्र किया था. ऐसे में 2015 के आंकड़ों की क्या प्रासंगिकता है?

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राज्य की आम महिलाओं या मेरे दोस्तों या परिवारवालों को भूल जाइए, जब जद(यू) की महिला कार्यकर्ताओं ने मुझसे कहा, "आप आवाज उठाइए, हम सामने से बोल भी नहीं सकते, तब मैंने बेबस और आक्रोशित महसूस किया."

मैंने उनकी तरह ही खुद को छला हुआ महसूस किया. मैंने उनकी तरह ही खुद को अपमानित महसूस किया. क्या नीतीश जी बता सकते हैं कि उनके अपने कार्यकर्ताओं के इस भय, आक्रोश और असहायता की व्याख्या किन आंकड़ों से की जा सकती है?

3. ध्यान हटाने की कोशिश

बिहार सरकार ने न केवल एक साल पुराने गलत आंकडों के आधार पर अपनी छाती थपथपाई बल्कि सस्ती राजनीतिक पैंतरबाजी दिखाते हुए दूसरे राज्यों के एनसीआरबी के आंकड़े भी दिए. 

क्या बिहार की महिलाएं इसलिए सुरक्षित महसूस करें कि दूसरे राज्यों में महिलाओं के अनुभव ज्यादा बुरे हैं? इस तरह की तुलना से केवल और केवल नीतीश कुमार सरकार का बौद्धिक दिवालियापन सामने आता है?

4. असल मुद्दे की अनदेेखी

लैंगिक मुद्दों के प्रति संवेदनशील कोई सरकार और नेता कभी भी अपने कार्रवाई न करने के बचाव में 'रिपोर्टेड और नॉन-रिपोर्टेड मामलों' का हवाला देने की हिम्मत नहीं करेगी जिस तरह नीतीश कुमार की सरकार ने किया है. सरकार ने इस मामले के 'रिपोर्टेड' न होने के कारण इसकी जानकारी न होने की बात कहकर अपना बचाव किया.

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क्या ये ज्ञात तथ्य नहीं है कि यौन शोषण के सारे मामले तुरंत रिपोर्ट नहीं होते? क्या वो ये कहना चाहते हैं कि राज्य में ऐसी कोई घटना या अपराध नहीं है जिसकी रिपोर्ट नहीं हुई हो? हमारे देश में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के रिपोर्ट न होने के पीछे सामाजिक-राजनीतिक टैबू हैं. क्या नीतीश कुमार इस तरह की हकीकत से परे व्याख्या की जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए कि अपराध की रिपोर्ट न होने के मतलब है कि राज्य में अपराध हो ही नहीं रहे?

बात समस्या पर होनी चाहिए, पीड़िता पर नहीं

क्या बिहार सरकार ये सोचती है कि जिस महिला के साथ 'सामूहिक बलात्कार' हुआ हो उसकी मानसिक स्थिति ऐसी होगी कि वो 'जघन्य बलात्कार' के बार अपनी बेटी के अपहरण की 'रिपोर्ट' दर्ज करा सके?

क्या सरकार ने ऐसे हृदयविदारक मामले का स्वतःसंज्ञान लिया? अगर हां, तो क्या वो मामले में हुई प्रगति की जानकारी दे सकती है? अगर नहीं, तो क्या सरकार बता सकती है कि ऐसा क्यों नहीं हुआ?

बलात्कार के एक अन्य मामले में आधिकारिक जवाब में मेडिकल रिपोर्ट का हवाला दिया गया कि पीड़िता के जननांग क्षतिग्रस्त नहीं थे.

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नीतीश जी को मैं याद दिलाना चाहूंगी कि ये सरकारी चिकित्सा महकमे का 'दृष्टिकोण' है. एक महिला होने के नाते मैं ये कहना चाहूंगी कि केवल पीड़िता ही ये बता सकती है कि उसके जननांग क्षतिग्रस्त हुए हैं या नहीं. अगर वो नहीं कर सकती तो उसके परिवार की किसी महिला सदस्य को इसे स्वीकार या खारिज करना चाहिए.

हम सब जानते हैं कि आधिकारिक मेडिकल प्रतिक्रिया में काफी हेराफेरी की जाती है. पटना के किसी मेडिकल अधिकारी से थोड़ी देर बातचीत करके ये जाना जा सकता है कि डॉक्टरी राय और रिपोर्ट को किस तरह राजनीतिक रूप से प्रभावित किया जाता है. 

ये कहकर कि मीडिया ने इस मामले में 'मनगढ़ंत' खबरें चलाई, सरकार ने नेता-जनता के बीच संवाद सेतु पर एक और कुठाराघात किया है. बिहार की महिला पत्रकार होने के नाते मैं इस घटना की रिपोर्ट करने वाले पत्रकारों को धन्यवाद कहना चाहूंगी.

महिला वोट बैंक

नीतीश कुमार को लिखा मेरा पत्र केवल एक व्यक्ति के तौर पर नहीं बल्कि बिहार की महिला के तौर पर लिखा गया है. 

मैं अपने पहले पत्र से कोट करना चाहूंगी, "मेरे समेत बिहार की महिलाओं को लगता है कि नीतीश कुमार ने बिहार की 50% आबादी को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया. आज राज्य में जो हालात हैं उन्हें देखते हुए हम ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं. सरकार की निष्क्रियता और राजद के साथ इसके गठजोड़ से हमारा डर सही साबित हो रहा है."

बिहार के नागरिक के तौर पर मैं नीतीश कुमार से अपील करना चाहूंगी कि राज्य सरकार और उसका प्रशासनिक अमला इस मुद्दे का राजनीतिकरण बंद करे, ताकि राज्य की महिलाएं अपने सबसे प्रिय नेता से भावनात्मक तौर पर और ज्यादा कटा हुआ न महसूस करें.

(ये लेखक के निजी विचार हैं. इनसे संस्थान की सहमति आवश्यक नहीं है)

First published: 29 June 2016, 8:11 IST
 
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