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सियाचिन की सर्द सरहद पर हाथ-पैर की उंगलियां गंवाकर जिंदा लौटे एक सैनिक का साक्षात्कार

एना वर्गीस | Updated on: 10 February 2017, 1:52 IST
QUICK PILL
सियाचिन ग्लेशियर में हाल ही में आए हिमस्खलन ने सेना के 10 जवानों की \r\nजान ले ली. जब बात प्रकृति पर आ जाती है तो आपका सारा ज्ञान धरा का धरा रह \r\nजाता है.30 वर्षीय पूर्व सैन्यकर्मी सचिन बाली भी अपने सैन्य जीवन में सियाचिन पर तैनात रहे थे. सेना\r\n में तकरीबन ढाई साल बिताने वाले सचिन ने उस दौरान हिमस्खलम के बाद एक बचाव\r\n अभियान का नेतृत्व किया था. जिसके परिणामस्वरूप उन्हें अपने हाथ और पैर की\r\n कुछ उंगलियों को कटवाना पड़ा. मजबूरन उन्हें सेना छोड़ने के बाद अपने लिए \r\nएक नया जीवन तलाशना पड़ा.कैच से बातचीत के दौरान बाली की सकारात्मकता और कभी भी हार न मानने का रवैया साफ दिखाई दिया.हम\r\n इस बारे में और जानना चाहते थे कि 5800 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद कठोर \r\nपरिस्थितियों और लगातार अनिश्चितता के माहौल में रहना कैसा होता है. ऐसा \r\nक्या है जो लोगों को सेना में शामिल होने के लिए प्रभावित करता है और कैसे \r\nउनके अनुभवों ने एक व्यक्ति के रूप में उन्हें प्रभावित किया.

क्या आप हमेशा से सेना में ही शामिल होना चाहते थे?

कॉलेज के अंतिम वर्ष में जब मुझे इसका फैसला लेना था कि मैं क्या करूं, मेरे सामने एक यही विकल्प था जिससे मैं खुद को जोड़ सकता था. मेरे आचरण के मुताबिक मैं किसी और काम के बारे में सोच भी नहीं सकता था. माता-पिता मुझे एमबीए करवाना चाहते थे लेकिन मैंने मना कर दिया.

मैं पांच साल सेना को देकर देखना चाहता था कि यह कैसा अनुभव है. शारीरिक रूप से मौजूद होकर देश के लिए योगदान देना केवल बयानबाजी जैसा ही लगता है.

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अपने माता-पिता के बारे में बताएं?

मैंने अपने मां-बाप को कभी नहीं बताया कि मैं सेना के लिए आवेदन कर रहा हूं. बाद में जब सेना की ओर से साक्षात्कार के लिए बुलावा आया तब मैंने उन्हें बताया. 

क्या उन्होंने आपको रोकने की कोशिश की?

नहीं, वे मेरे फैसले से हैरान थे. लेकिन उन्होंंने मुझे पूरा समर्थन किया.

तब आपकी उम्र क्या थी?

मैं उस वक्त 21 वर्ष का था. 22 साल की उम्र में मुझे कमीशन मिला.

और आपकी पहली पोस्टिंग?

जिस इनफैंट्री में मुझे रखा गया उसे एक साल के लिए संयुक्त राष्ट्र के एक मिशन के लिए चुना गया था. इसलिए मैं इथियोपिया और इरिट्रिया गया. मैं इससे खुश नहीं था क्योंकि मैंने सेना में जाने का फैसला इसलिए नहीं लिया था. मुझे किसी और की लड़ाई लड़ने की जगह अपने देश में होना चाहिए था और अपने देश के लिए लड़ना चाहिए था.

इससे क्या फर्क पड़ता है? क्योंकि तब भी आप मानवता की रक्षा के लिए लड़ रहे होते है.

यह सच है लेकिन उस वक्त मेरी इकलौती प्रेरणा मेरा देश था. उस तरह तो मैं एक स्वार्थी था और उस दौरान भारत में काफी कुछ घटित हो रहा था. यह कारगिल के बिल्कुल बाद की बात है इसलिए मैं यहां होने के लिए उत्सुक था.

एक यह भी हकीकत है कि संयुक्त राष्ट्र की इन पोस्टिंग को आसान माना जाता है. और मैं इस बात का कंलक अपने माथे पर नहीं लगवाना चाहता था कि मैं अपनी पहली पोस्टिंग पर ऐसी जगह गया.

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तो यह किस तरह का तजुर्बा था?

यह शानदार था. हम वहां युद्ध के छह माह बाद पहुंचे थे लेकिन युद्ध के प्रभाव वहां हर तरफ थे. आस पास लाशें पड़ी थीं, जिंदा विस्फोटक, ध्वस्त टैंक आदि दिखाई पड़ रहे थे. हमारा काम उस क्षेत्र को साफ करना और घरों से विस्थापित लोगों को वापस लाना था. इस संदर्भ में तो यह काफी बेहतर काम था कि आप टुकड़ों में बिखर चुकी जिंदगी बंटोरने में लोगों के की मदद कर रहे थे. और व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए दुनिया के अन्य देशों, संस्कृतियों को घूमने, देखने, जानने की घुमंतू इच्छा तो थी ही. 

और भारत वापसी पर आपको सियाचिन जाने के लिए चुना गया? आपको तब कैसा लगा?

हां नवंबर 2002 से शुरू मेरा कार्यकाल अप्रत्याशित रूप से मार्च 2003 में खत्म कर दिया गया. मुझे सियाचिन जैसे स्थान पर रहने लायक बनने और वहां एक टीम का नेतृत्व करने के लिए एक एडवांस्ड ट्रेनिंग पर भेजा गया और वहां की सबसे अग्रिम चौकियों में एक में रखा गया. सियाचिन में नियुक्ति के लिए कई कारण देखे जाते हैं जिनमें शारीरिक और मानसिक रूप से सबसे बेहतर स्थिति वाला व्यक्ति होना चाहिए. यह एक सम्मान की बात होती है कि जो आप चाहते हैं उसके लिए आपको चुना जाता है.

हमें उस घटना के बारे में बताइए जिसकी कीमत आपको अपने हाथ-पैर की उंगलियों के अलावा सेना के करियर को छोड़कर चुकानी पड़ी.

मार्च ऐसा महीना होता है जब बर्फ पिघलना शुरू हो जाती है और ग्लेशियरों पर हिमस्खलन और चट्टानें खिसकने का जोखिम होता है. यह विशेष घटना 2 मार्च 2003 को घटी. मेरे कार्यक्षेत्र के अंतर्गत 10 चौकियां थीं और रोजाना मुझे सभी की ओके रिपोर्ट लेनी होती थी.

उस वक्त पूरे सप्ताह बर्फ गिर रही थी और बर्फ के तूफान आ रहे थे. तापमान -45 और -50 तक था. जब मैं नियमित कार्रवाई के तौर पर हर पोस्ट को जांच रहा था तभी मंगेश से आने वाली लाइन डेड हो गई.

मैं उसी वक्त जान गया कि कुछ गड़बड़ हैै. मैंने सोचा कि शायद हिमस्खलन हुआ हो. मैंने कई बार पोस्ट पर पहुंचने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो सका. तब मैंने बटालियन के मुख्यालय से संपर्क कर अपनी आशंका जाहिर की. अगली सुबह उन्होंने उड़ान भरके जानने की कोशिश की कि आखिर हुआ क्या. 

जैसी हमें आशंका थी वही हुआ. हिमस्खलन आया था. हमारे छह आदमी गायब थे. जबकि छह अन्य काफी कम कपड़ों के साथ खुले स्थान पर थे. यहां तक की कुछ के पास जूते भी नहीं थे. 

हेलीकॉप्टर के जरिए उनके पास कपड़े और जूते फेंके गए लेकिन वे नर्म बर्फ में घुसते चले गए. और ऐसी ऊंचाई पर जहां हवा काफी कम हो, हेलीकॉप्टर ज्यादा देर तक एक स्थान पर नहीं टिक सकता. हमें पता था कि अगर उनकी जान बचानी है तो रात से पहले हमें उन्हें बाहर लाना होगा.

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और तब आपने उनके लिए बचाव अभियान चलाने का फैसला किया?

हां, हमने एक साथ मिलकर टीम बनाई और एक बचाव अभियान शुरू कर दिया. यह एक जटिल कार्य होता है. आप दो समूहों में चलते हैं. पहला रास्ता खोलने वाला दल होता है. जिसमें मैं और तीन अन्य सैनिक थे. हमारी पोस्ट और मंगेश की पोस्ट के बीच हाफ लिंक तक हम पहुंचे. जबकि दूसरा दल हमसे 100 मीटर पीछे चल रहा था ताकि अगर हिमस्खलन की स्थिति आए तो कम से कम दूसरा दल बाद में बचाव कर सके और दोनों पर एक साथ जोखिम न रहे.

कमर की ऊंचाई तक जमी नर्म बर्फ के बीच चलना बहुत कठिन होता है. आप तीन कदम बढ़ाते है और थक जाते हैं वो भी तब जब यहां शारीरिक रूप से सबसे बेहतर स्थिति वाले लोग होते हैं. आपका शरीर ऑक्सीजन की जरूरत के कुल हिस्से के केवल 30 फीसदी ही में ही काम कर रहा होता है. हम इस तरह चलते हैं कि कोई भी न थके. अगर आप थोड़ा सा भी ज्यादा पसीना छोड़ते हैं तो चलना बंद करते ही आपका पसीना बर्फ बन जाता है. इसलिए आपको वैज्ञानिकरूप से इसके मुताबिक काम करने की जरूरत होती है.

आधी दूरी से आपकी अग्रिम पोस्ट कितनी आगे थी?

500 मीटर से अधिक नहीं. सामान्य दिनों में हमें वहां तक पहुंचने में 20 मिनट लगते थे. लेकिन उस दिन हमको ढाई घंटे लग गए. आपको इस दौरान रास्ते पर लगे चिन्हों पर नजर बनाए रखनी पड़ती है क्योंकि इनके दाएं-बाएं गहरी खाईयां होती हैं और यह बर्फ के चलते दिखाई नहीं देतीं. कभी-कभी तो रास्ते के निशान भी दिन में नहीं दिखाई देते. हम किसी तरह से आधे रास्ते तक पहुंचे और हमनें 15 मिनट का रेस्ट लिया. फिर हम मंगेश की ओर आगे बढ़े. आमतौर पर हम यह दूरी एक घंटे में पूरी कर लेते लेकिन उस दिन हमें बहुत खतरनाक स्थिति में दस घंटे बिताने पड़ें क्योंकि उस दिन कुछ दिखाई ही नहीं पड़ रहा था.

क्या आप वहां की कड़ाके की सर्द को बयां कर सकते हैं?

मंगेश तक जाने के आधे रास्ते तक पहुंचते-पहुंचने हमारे हाथ पैर जम गए थे. जबकि हमारे पास सबसे बेहतरीन उपकरण थे. ठंड से हमारे जबड़े बार-बार अकड़ रहे थे. इस तापमान पर किसी को भी दो घंटे से ज्यादा खुले में रहने की इजाजत नहीं दी जाती है. हर दो घंटे बाद आपको वापस आकर अपने हाथ-पैर नमक-गर्म पानी के टब में डालने पड़ते हैं ताकि यह सही से काम करते रहें.

लेकिन उस वक्त हमारा इकलौता लक्ष्य अपने लोगों को बचाना था. अफसोस यह कि अचानक हम लोगों के ऊपर मुलायम बर्फ की एक चट्टान आ गिरी थी और हम आगे नहीं जा पा रहे थे. हम लगातार उनको खोजने की कोशिश करते रहे लेकिन अंत में हमने हार मान ली. तब एक सामूहिक निर्णय लेकर हमने वापसी का फैसला लिया. हमने मुख्यालय को भी इस बात की सूचना दी. खुशकिस्मती यह रही कि मंगेश पर फंसे अन्य साथियों को बाद में बचा लिया गया.

इसका मतलब पूरे दो दिन तक आपकी टीम खुले में रही, इसका आप लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा?

हमारे कुछ साथी सुधबुध खोकर बड़बड़ाने लगे थे. मुझे खुद भी बदहवासी जैसी स्थिति महसूस हो रही थी. ऐसे स्थान का दुष्प्रभाव हमारे ऊपर पड़ने लगा था जहां जबर्दस्त सन्नाटा था. मेरे सिर में घंटियां बजने लगी थीं. उस वक्त मुझे प्रशिक्षण के दौरान दी गई सीख याद आई. यह एक ईशारा था कि कुछ बहुत बुरा होने वाला है और हमें वापस चलना चाहिए. तब मेरी सबसे बड़ी चिंता यह थी कि अगर हमारा कोई साथी घायल हो गया तो हम उसे उठाकर नहीं ले जा सकते थे और मजबूरन उसे वहीं छोड़ना पड़ता.

जब हम लोग आधे रास्ते पर पहुंचे तो वहां पर उन लोगों ने हमें कुछ पीने को दिया जिससे मेरा गला जल गया क्योंकि हमारा संवेदी तंत्र काम नहीं कर रहा था. उसके बाद मैं न तो खा सकता था और न पी सकता था. अगले दिन हेलीकॉप्टर आया जिसनें बड़ी मुश्किल से मुझे और मेरे साथियों को बचाया. अस्पताल में लोग मुझे पहचान नहीं पा रहे थे क्योंकि ठंड की वजह से मेरा मुंह सूज गया था. जो नुकसान होना था वो हो चुका था और हम उसे रोक नहीं सकते थे. कड़ाके की ठंड के कारण मेरे हाथ-पैर की कुछ उंगलियां गल गई थीं जिन्हें अंततः काटना पड़ा.

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आप स्थिति से कैसे उबर पाए?

ठीक है, और कर भी क्या सकते हैं.

लेकिन इससे आपकी जिंदगी में कहीं न कहीं तो बदलाव आया ही होगा?

बिल्कुल. लेकिन आपको जिंदगी में आगे बढ़ना पड़ता है. आप एक ही जगह ठहर नहीं सकते. 

अकाल मौतों को देखते हुए क्या सियाचिन में सेना को रखना उचित है?

हमारे पास और कोई विकल्प ही नहीं है. क्या हम वो हिस्सा पाकिस्तान को दे दें. इतिहास इस बात का गवाह है कि हम उनके ऊपर भरोसा नहीं कर सकते. 

आप और आपके अन्य साथियों को कौन सी बात है जो इतने दुर्गम इलाके में काम करने के लिए प्रेरित करती है?

ग्लेशियर में जाने वाले ज्यादातर लोग अपनी स्वेच्छा से जाते हैं. यह मूर्खतापूर्ण लग सकता है. लेकिन यह एक सैनिक के लिए गर्व का विषय है कि वह दुनिया के सबसे दुर्गम और चुनौतीपूर्ण इलाके में देश की सेवा कर रहा है. हमारी सेना ने हमें इस तरह से ही प्रशिक्षित कर रखा है. लोग इसे हंसते-खेलते स्वीकार करते हैं. किसी को कोई झिझक नहीं होती. 

सेना ने आपको इसके बाद दफ्तरी कामकाज का प्रस्ताव दिया था, लेकिन आपने इससे इनकार कर दिया?

जी हां, क्योंकि मोर्चे पर मेरे साथ यह घटना हुई थी और सेना ने मेरा ख्याल रखने का वादा किया था. लेकिन मैं खुद को एक जगह बैठकर दफ्तर में काम करने वाला नहीं समझता. लिहाजा मैंने कुछ और करने का फैसला लिया.

सेना से इस्तीफा देने का फैसला लेना कितना कठिन था?

यह मेरे लिए एक सामान्य घटना थी. जीवन में आगे बढ़ते रहने के मेरे स्वभाव के कारण यह आसान था. 

आपको नहीं लगता यह आपके लिए एक बड़ा नुकसान था?

कभी नहीं. जब मैंने अपने घावों को देखा तब मुझे थोड़े समय के लिए लगा. तब मैंने खुद को समझाया. मैंने फैसला किया कि मुझे वही करना है जिससे मुझे खुशी मिले. 

 

क्या यह फैसला आप इसलिए ले पाए क्योंकि सेना के प्रशिक्षण के दौरान आपको जोखिम उठाना सिखाया जाता है?

हां एक हद तक यह सही भी है. लेकिन परिवार का सपोर्ट और पालन पोषण की भी बड़ी भूमिका थी. मूलरूप से मैं खुश रहने वाला व्यक्ति हूं. मुझे इस बात का अहसास भी था कि जो काम मैं कर रहा हूं उसमें ऐसे खतरे मौजूद रहते हैं. सेना में जाने के बाद से ही मुझे इस बात का हमेशा एहसास रहता था कि कभी भी आपके साथ कुछ भी अनपेक्षित हो सकता है. साथ ही मैंने यह भी फैसला कर रखा था कि अगर कभी ऐसा होता है तो मुझे इसकी शिकायत नहीं रहेगी.

एक सैनिक से आम आदमी के जीवन में लौटना कितना अलग अनुभव है?

सेना की नौकरी 24 घंटों की होती है. सियाचिन को अगर देखें तो वहां आपको दुश्मन पर लगातार निगरानी रखनी होती है. उस इलाके की दुर्गमता और मौसम भी आपकी लगातार निगरानी करने की मांग करता है. पूरे दिन का कामकाज, संत्री, प्रशिक्षण, ब्रेक और सोना जैसे चार काम होते हैं. ड्यूटी ऑवर के बाद हमें ग्लेशियर में सर्वाइवल के तरीके, हथियार चलाने की ट्रेनिंग और किचन आदि के काम करने पड़ते हैं. 

अब की जिंदगी बिल्कुल अलग है. अब मेरे पास बहुत समय रहता है. मैं हफ्ते में पांच दिन काम करता हूं और उसके बाद भी काफी वक्त बचा रहता है.

जब आप वहां पर ड्यूटी कर रहे थे तो कभी आपने सोचा कि घर पर आपका कैसे इंतजार होता है?

तब मेरी शादी नहीं हुई थी. अगर मेरे साथ तब कुछ गलत हो भी जाता तो मेरे सिर पर कोई बोझ नहीं था. निश्चित तौर से मां-बाप की जिम्मेदारियां तो थी और आप उससे पीछा नहीं छुड़ा सकते. 

इस तरह की तैनाती जहां हमेशा इस बात का खतरा रहता है आप कभी भी दोबारा अपनों से नहीं मिल सकते, यह किसी सैनिक के ऊपर कितना बड़ा मानसिक दबाव होता है?

तब यह बात दिमाग में भी नहीं आती है. यह बात आपको तब परेशान करती है जब आपके साथ कुछ बुरा हो जाता है. सामान्य दिनों में इस तरह के विचार आपके दिमाग में नहीं आते. 

सियाचिन जैसे इलाके में पसरे सन्नाटे-एकांत से आपलोग कैसे तालमेल बिठाते हैं?

टाइम टेबल के हिसाब से सबकुछ तय होता है और लोगों की जिम्मेदारियां बदलती रहती हैं. संत्री का काम, खाना बनाना, साफ सफाई, पढ़ाई, बचाव कार्य, हथियारों का रख रखाव आदि. कहीं-कहीं पर डिश एंटीना और किताबें होती हैं जहां मनोरंजन हो जाता है. यानी आप एक रूटीन में बंधे रहते हैं और सोचने का वक्त ही नहीं मिलता. इतने दुर्गम हालात में आप घर-समाज जैसी चिंताओं को नहीं उठा सकते. अगर कोई अचानक से चुप हो जाए या फिर असामान्य व्यवहार करने लगे तो उसे विशेष देखरेख की जरूरत होती है. 

क्या सेना में जाने के पीछे मौत से लड़ने जैसी कोई बात भी व्यक्तित्व में होती है? क्योंकि हर कोई तो नहीं जाता.

ऐसा नहीं है. कोई भी यह सोचकर सेना में नहीं जाता कि उसके साथ बुरा होगा. बल्कि वह यह सोचकर जाता है कि वह इससे बेहतर कोई काम नहीं कर सकता. 

तो आपके मुताबिक यह भी बाकी नौकरियों की तरह एक नौकरी भर है?

बिल्कुल. यह एक जिम्मेदारी है. आप दूसरा विकल्प लेकर सेना में कभी मत जाइए.

First published: 15 February 2016, 8:47 IST
 
एना वर्गीस @catchhindi

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