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सिद्धारमैया कैबिनेट में बदलाव से कर्नाटक कांग्रेस का संकट गहराया

रामकृष्ण उपध्या | Updated on: 22 June 2016, 7:06 IST

कर्नाटक मंत्रिमंडल में रविवार को हुए बड़े फेरबदल के साथ राज्य में राजनीतिक संकट बढ़ गया है. मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपनी चलाते हुए मंत्रिमंडल में बदलाव किया. इसके लिए प्रदेश कांग्रेस कमेटी से सहमति की जरूरत महसूस नहीं की. इससे पार्टी में आंतरिक संकट और प्रदेश में विरोध बढ़ गया है.

राज्य में व्यापक स्तर पर उत्पन्न असंतोष और हिंसा से तो यही लगता है कि सिद्धारमैया का यह फैसला कर्नाटक की जनता को रास नहीं आया है.

राज्य में विधानसभा चुनाव के लिए दो साल से भी कम समय बचा है. कांग्रेस आलाकमान ने सिद्धारमैया को 2018 में होने वाले विधानसभा के अगले चुनाव के लिए सरकार की छवि सुधारने के लिए खुली छूट प्रदान कर दी है. लेकिन सिद्धारमैया के इस फैसले से नया संकट उत्पन्न हो गया है.

उन्होंने मंत्रिमंडल में से 14 मंत्रियों की छुट्टी कर दी है और 13 नए चेहरों को सम्मिलित किया है, जिन्हें राज्यपाल विजुभाई वाला ने राजभवन में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में पद की शपथ दिलाई है.

कर्नाटक ही एक मात्र बड़ा राज्य शेष रह गया है, जहां कांग्रेस पार्टी की सरकार है

हटाए गए मंत्रियों में विनय कुमार सोराके, सतीश जारकिहोली, बाबूराव चिंचानसूर, शिवराज संगप्पा तांगदागी, एसआर पाटिल, मनोहर तहसीलदार, के अभयचंद्र जैन, दिनेश गुंडू राव, किमाने रत्नाकर और पीटी परमेश्वर नाइक भी हैं. इसके अतिरिक्त दिनेश गुंडू राव को प्रदेश कांग्रेस के नए अध्यक्ष का प्रभार सौंपा गया है.

जिन मंत्रियों को कैबिनेट से हटाया गया है, उनमें कमरूल इस्लाम, शामनूर शिवशंकरप्पा, वी श्रीनिवास प्रसाद और एमएच अंबरेश जैसे वरिष्ठ मंत्रियों के समर्थक और इसी तरह पुनगर्ठन में जगह पाने से वंचित रह गए मालाकैया गटदर और एम कृष्णप्पा का असंतोष आक्रोष बन कर फूट निकला है.

एमएच अंबरेश ने तो विरोध स्वरूप विधानसभा की सदस्यता से त्यागपत्र तक दे दिया है. छह बार विधायक रह चुके गटदर के अनुयायियों ने बसों में आग लगा कर और सड़क पर टायर जला कर नाराजगी जताई है. इस्लाम के समर्थकों के सैकड़ो समर्थक गुलबर्ग चौक में धरने पर बैठ गए हैं. आवगमन अवरूद्ध हो गया है. लोकप्रिय अभिनेता से नेता बने अंबरीश के समर्थकों ने मांड्या में बेंगलुरू-मैसूर राजमार्ग जाम कर दिया है.

विवादास्पद बिचौलिए ले आउट कृष्णप्पा के नाम से मशहूर कृष्णप्पा जो कि बेंगलुरू के एक विधायक है, के समर्थकों ने मेट्रो ट्रेन को लगभग आधे घंटे के लिए ठप कर दिया. यहां तक कि लोकसभा सांसद और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पसंदीदा मल्लिकार्जुन खड़गे जो कि कांग्रेस पार्टी के लोकसभा में नेता हैं भी कुछ असंतुष्टों के निशाने पर हैं.

कांग्रेस में अंतर्विरोध

सिद्धारमैया ने इस फेरबदल के लिए जो सूची तैयार की है उसके लिए कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष जी परमेश्वर और वरिष्ठ नेता ऑस्कर फर्नांडीस को विश्वास में नहीं लिया. इसलिए सोनिया गांधी ने मुख्यमंत्री को निर्देशित किया कि वे इस सूची को लेकर खड़गे और कर्नाटक के पार्टी प्रभारी महासचिव दिग्विजय सिंह से विचार-विमर्श कर लें. बताया जाता है कि प्रस्तावित सूची में सम्मिलित किए जाने वाले नए मंत्रियों और निकाले जाने वाले मंत्रियों को लेकर खड़गे की आपत्तियां थीं परंतु सिद्धारमैया ने उनके साथ कड़ी सौदेबाजी की.

बताया जाता है कि सिद्धारमैया गुलबर्ग से इस्लाम और चिंचानसूर के काम से संतुष्ट नहीं थे लेकिन खड़गे का जोर था कि विधानसभा के आने वाले चुनावों के नजरिए से इन दोनों की अहमियत है. यहां तक कि शुक्रवार को यह वार्ता गतिरोध की स्थिति में पहुंच गई थी.

डेमेज कंट्रोल

अगले दिन सभी नेता सोनिया गांधी के आवास पर आकर जमा हुए. खड़गे का कमजोर पहलू यह था कि वे अपने बेटे प्रियंक खड़गे को मंत्री बनाए जाने के इच्छुक थे, जो पहली बार विधायक बने हैं. सिद्धारमैया ने इसके लिए शर्त रखी कि इस्लाम और चिंचानसूर को मंत्रीपद से हटाया जाए.

कैबिनेट फेरबदल की कवायद से पहले, कांग्रेस हलकों में चर्चा थी कि आगामी चुनाव के मद्देनजर सिद्धारमैया की जगह खड़गे को मुख्यमंत्री बनाना सबसे बेहतर रहेगा. खड़गे अत्यंत प्रभावशाली दलित नेता हैं. वे लोकप्रिय हैं और नौ बार विधानसभा के लिए निर्वाचित होते रहे हैं. कम से कम तीन बार ऐसे अवसर आए जब वे मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए.

लेकिन यह प्रस्ताव पार्टी आलाकमान द्वारा नकार दिया गया क्योंकि लोकसभा में खड़गे अपनी जिम्मेदारी बखूबी अदा कर रहे हैं, और वहां उनका स्थान लेने के लिए न तो सोनिया गांधी तैयार हैं न ही राहुल गांधी.

जब अंतिम सूची तैयार की गई तो सिद्धारमैया मंत्रिमंडल में अपने सभी समर्थकों को बनाए रखने में कामयाब रहे, इनमें एच अंजनैया, महादेवप्पा, महादेव प्रसाद, केजे जॉर्ज और उमाश्री जैसे भी हैं जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार आदि के आरोप हैं. इतना ही नहीं मुख्यमंत्री ने खड़गे के पुत्र को मंत्री बनाने के एवज में उनके समर्थकों में से इस्लाम और चिंचानसूर को मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया.

बढ़ता संकट

शपथ ग्रहण समारोह के बाद, चिंचनसूर और इस्लाम दोनों ही खड़गे के विरोध में उतर आए और खुल कर कहा कि उन्होंने पुत्र मोह में उनका बलिदान कर दिया है. उन्होंने यह चुनौती भी दी है कि अब उनकी मदद के बिना अगला चुनाव जीत कर दिखाए. चिंचनसूर जिस 'कोली' समुदाय से ताल्लुक रखते हैं वे और मुसलमान मिलकर गुलबर्ग में मतदाताओं का बहुत बड़ा हिस्सा है, जिन्होंने लोकसभा चुनाव में खड़गे के पक्ष में एकजुट होकर मतदान किया था.

मनमानी का आरोप

दो वरिष्ठ विधायक रमेश कुमार और विधानसभा अध्यक्ष कागोडु थिमप्पा, जो लगातार मुख्यमंत्री की लॉबी के रूप में जाने जाते रहे हैं, कैबिनेट में लिए गए हैं. इनके अलावा प्रमोद माधवराज, एसएस मल्लिकार्जुन और ईश्वर खड़गे जैसे युवा तुर्क भी नए चेहरों में सम्मिलित हैं. जबकि शामनूर शिवशंकरप्पा को आयु अधिक हो जाने के आधार पर कैबिनेट से विदा कर दिया गया है.

युवा मंत्रियों में से दिनेश गुंडू राव बेहतर प्रदर्शन करने वाले मंत्रियों में गिने जाते हैं. लेकिन उनकी जगह ब्राह्मण प्रतिनिधित्व के लिए रमेश कुमार को लिया गया है. संतोष लाड जिन्होंने खनन घोटाले में कथित संलिप्तता के आरोप के बाद मंत्री पद से इस्तीफा दिया था मंत्रिमंडल में दोबारा सम्मिलित कर लिए गए हैं. हालांकि उनके खिलाफ अन्य दर्जनों मामले न्यायालय में विचाराधीन हैं.

पूर्व सांसद श्रीनिवास प्रसाद पांच बार सांसद रह चुके हैं. वे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में केंद्रीय मंत्री थे. उनका कार्य हालांकि अच्छा माना जाता रहा है, छवि भी स्वच्छ रही है, कैबिनेट से उन्हेें हटा दिया गया है. कैबिनेट से बाहर किए जाने के बाद प्रसाद ने सिद्धारमैया के इस फैसले को बुद्धिहीनता बताया है और इस अन्याय से लड़ने की कसम खाई है.

दीर्घकालिक समस्याएं

प्रसाद को मंत्रिमंडल से बाहर करना कांग्रेस के लिए घातक सिद्ध हो सकता है क्योंकि आम धारणा है कि कांग्रेस में दलितों के साथ उचित व्यवहार नहीं किया जाता. दलित नेताओं का कहना है कि परमेश्वर को उप मुख्यमंत्री बनाए जाने की उनकी मांग पार्टी पहले ही नजरअंदाज करती आई है. उनके मुताबिक सिद्धारमैया कांग्रेस के लिए एक बाहरी व्यक्ति हैं.

कर्नाटक ही एक मात्र बड़ा राज्य शेष रह गया है, जहां कांग्रेस पार्टी की सरकार है. जाहिर है वह वहां कोई नया प्रयोग करने की बजाय हाल के चुनावों में कई असफलताओं के बाद, कांग्रेस नेतृत्व ने मजबूती के साथ सिद्धारमैया का साथ देने का फैसला लिया है. बतौर प्रशासक सिद्धारमैया की जो भी कमियां रही हों, वे संसाधनों का जुगाड़ करने में अत्यंत उपयुक्त मुख्यमंत्री सिद्ध हुए हैं और पार्टी के लिए संसाधन जुटाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान है.

First published: 22 June 2016, 7:06 IST
 
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