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अब कांग्रेस में ठौर तलाश रहे सिद्धू को अजहरुद्दीन से उम्मीदें

आकाश बिष्ट | Updated on: 15 October 2016, 4:35 IST
QUICK PILL
  • पंजाब विधान सभा चुनाव में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की खातिर क्रिकेटर से राजनेता बने नवजोत सिंह सिद्धू कांग्रेस के पाले में आने का विचार कर रहे हैं. 
  • इस काम के लिए वह अपने पूर्व टीम मेट और कैप्टन मोहम्मद अजहरुद्दीन, जिनसे उनका 1996 में सार्वजनिक रूप से झगड़ा हो गया था, की मदद ले रहे हैं. 
  • मुमकिन है कि अज़हर की बदौलत कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और सिद्धू के बीच जल्दी मुलाकात भी हो जाए. 

कांग्रेस में आने के लिए लालायित सिद्धू चाहते हैं कि उनकी हाल ही में लांच की गई राजनीतिक संस्था 'आवाज-ए-पंजाब' का कांग्रेस के साथ गठबंधन हो, जबकि कांग्रेस इस बात के लिए अटल है कि सिद्धू को अपनी संस्था का कांग्रेस में विलय कर देना चाहिए.

वहीं पंजाब राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष कैप्टन अमरिन्दर सिंह, सिद्धू के साथ किसी भी तरह के तालमेल के पक्ष में नहीं हैं. यही वजह है कि उन्होंने समझौते को अमलीजामा पहनाने के लिए पूर्व सांसद अजहरुद्दीन तक पहुंच बनाई और उनसे मदद मांगी.

भारतीय क्रिकेट टीम का टूर जब 1996 में इंग्लैण्ड गया था, तब दोनों के रास्ते जुदा-जुदा हो गए थे. सिद्धू को कथित रूप से किसी ने कह दिया था कि अजहर ने उन्हें गाली दी है. फिर क्या था, सिद्धू बीच रास्ते से ही लौट आए. लेकिन हाल में जब

सिद्धू अपनी बीमारी के चलते नई दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती थे तो अजहर उन्हें देखने गए थे और दोनों के मतभेद दफन हो गए.

मगर सिद्धू पंजाब के मुख्यमंत्री रहे अमरिन्दर सिंह के खिलाफ कड़ी टिप्पणियां कर चुके हैं और पंजाब प्रभारी आशा कुमारी ने ऐसे किसी मोलतोल से इनकार किया है. साथ ही यह भी कहा है कि अगर उनका पार्टी के आदर्शों में विश्वास है तो पार्टी 

में शामिल होने के लिए उनका स्वागत है. आशा कुमारी ने कैच न्यूज से कहा कि न केवल सिद्धू, बल्कि कोई भी जिसका भी संविधान और पार्टी के सिद्धान्तों में विश्वास है, उसका हमारे यहां आने पर स्वागत है.

उन्होंने गठबंधन की किसी भी सम्भावना से इनकार कर दिया और कहा कि 'आवाज-ए-पंजाब' कोई राजनीतिक दल नहीं है, ऐसे में गठबंधन का कोई सवाल ही नहीं उठता. आशा कुमारी ने कहा कि यदि वह कैप्टन अमरिन्दर सिंह के नेतृत्व में काम करने को तैयार हैं और उनकी कोई शर्त नहीं है, हम उनका स्वागत करेंगे.

अमरिन्दर ने भी बुधवार को कहा कि कांग्रेस सिद्धू के डीएनए में है और उनका पार्टी में जोरदार स्वागत है लेकिन उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि सिद्धू के साथ गठबंधन की कोई सम्भावना नहीं है.

तीर अमरेन्दर के

दिलचस्प यह है कि सिद्धू के विरोध से ऊब चुकी कांग्रेस ने 'आवाज-ए-पंजाब' के अन्य वरिष्ठ नेताओं समेत हाकी टीम के पूर्व कैप्टन परगट सिंह, बैंसला बंधुओं आदि से सम्पर्क साधा है. सूत्रों के अनुसार अमरिन्दर और परगट सिंह ने नई दिल्ली में बंद कमरे में बैठक की है और इसे अमलीजामा पहनाने की कोशिश की जा रही है. खबर है कि कांग्रेस के स्टार रणनीतिकार प्रशान्त किशोर पूरे घटनाक्रम पर निकटता से नजर रखे हुए हैं.

इससे पहले सिद्धू को  ' कन्फ्यूज्ड ' बताते हुए अमरिन्दर ने पूर्व में दावा किया था कि भाजपा के पूर्व सांसद के साथ बातचीत करने का कोई मुद्दा ही नहीं है. और अगर हाईकमान उनके विचार मांगता है तो वह दोहराएंगे कि पूर्व क्रिकेटर भरोसा किए जाने योग्य नहीं हैं. 

अमरिन्दर के चिंतित होने के अपने कारण हैं. उनका मानना है कि अगर पार्टी चुनाव में बहुमत हासिल कर लेती है तो सिद्धू अपने राजनीतिक लाभ के लिए उनसे दो-दो हाथ कर सकते हैं.

इसके पहले, भाजपा से इस्तीफा देने के बाद सिद्धू आम आदमी पार्टी की तरफ मुड़े थे. उनकी दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी संयोजक अरविन्द केजरीवाल के साथ कई दौर की बैठकें हुईं थीं लेकिन नतीजा नहीं निकला.

आवाज़-ए-पंजाब का आग़ाज़ और विलय?

तब उन्होंने आवाज-ए-पंजाब को लांच किया और संकेत दिया कि वे आम आदमी पार्टी के पंजाब के पूर्व संयोजक सुच्चा सिंह छोटेपुर के साथ नया राजनीतिक संगठन का गठन करने जा रहे हैं. आश्चर्यजनक तो यह है कि आखिरी क्षण में उन्होंने अपने पैर खींच लिए और छोटेपुर को अपनी खुद की पार्टी बनाने को मजबूर कर दिया.

एक बार फिर उन्होंने आप का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया था लेकिन उन्हें कुछ नहीं हासिल हुआ. इसके बाद उन्होंने कांग्रेस के साथ पींगे बढ़ाने शुरू की और यह खबर सुर्खी बन गई. अब उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा है. कांग्रेस भी अटल है कि कोई भी समझौता उसकी शर्तों पर होगा, सिद्धू की शर्तों पर नहीं.

पंजाब कांग्रेस के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता कहते हैं कि अगर सिद्धू राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहना चाहते हैं तो उनके पास एकमात्र विकल्प विलय का ही बचा है. अगर हमें विधान सभा चुनावों में बहुमत हासिल हो जाता है तो सिद्धू और मजबूत हो जाएंगे. कार्यकर्ता का यह भी कहना है कि उनको विचार करना है कि उनकी महत्वाकांक्षा कितनी है.

सिद्धू सिर्फ कैंपेनर

उन्होंने यह भी कहा कि खुद को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के बाद भी सिद्धू का कोई वास्तविक आधार नहीं है. वह कुछ चुटकले सुना सकते हैं, कुछ शायरी पढ़ सकते हैं और यह काम वह कर भी रहे हैं. उनका इस्तेमाल एक कैम्पेनर के रूप में किया जा सकता है, साझेदार के रूप में नहीं.

सिद्धू की स्किल्स को देखते हुए कांग्रेस उनका उपयोग पंजाब, उप्र, गोवा, उत्तराखंड आदि में होने जा रहे विधान सभा चुनावों में कर सकती है. सिद्धू के साथ डील करते समय कांग्रेस इस स्थिति में भी नहीं रहना चाहेगी कि भविष्य में पूर्व क्रिकेटर पार्टी को ब्लैकमेल कर सकें और पार्टी ने अपने इरादों को साफ तौर पर प्रकट भी कर दिया है.

एक सच यह भी है कि सिद्धू को पंजाब की राजनीतिक पिच पर खेलने के लिए कांग्रेस की जितनी जरूरत आज है, उतनी पहले कभी नहीं रही. 

First published: 15 October 2016, 4:35 IST
 
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