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सिद्धू की सियासी दुविधा: चुनाव से हटना कितना सही, कितना गलत

राजीव खन्ना | Updated on: 23 September 2016, 7:16 IST
QUICK PILL
  • आवाज-ए-पंजाब को राजनीतिक पार्टी नहीं बनाए जाने की घोषणा के बाद पंजाब की राजनीति में सरगर्मी बढ़ गई है. साथ ही पंजाब की राजनीति में सिद्धू की भूमिका को लेकर भी संशय बढ़ गए हैं. 
  • अभी तक यह समझा जा रहा था कि पंजाब में सिद्धू के आने के साथ लड़ाई चौतरफा होगी. लेकिन अब फिर से यह लड़ाई तितरफा हो चुकी है. पंजाब में इस बार लड़ाई शिरोमणि अकाली दल, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच है.

आवाज-ए-पंजाब को राजनीतिक पार्टी नहीं बनाए जाने की घोषणा के बाद पंजाब की राजनीति में सरगर्मी बढ़ गई है. साथ ही पंजाब की राजनीति में सिद्धू की भूमिका को लेकर भी संशय बढ़ गए हैं. 

अभी तक यह समझा जा रहा था कि पंजाब में सिद्धू के आने के साथ लड़ाई चौतरफा होगी. पंजाब में इस बार लड़ाई शिरोमणि अकाली दल, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच है.

जाहिर तौर पर सिद्धू के फैसले ने जवाब देने की बजाए सवाल ही पैदा कर दिए हैं. राजनीतिक विश्लेषक अभी भी सिद्धू के फैसले के निहितार्थों को समझने की कोशिश कर रहे हैं. 

हालांकि सिद्धू के फैसले को लोग क्रिकेट की भाषा में रिवर्स स्वीप करार दे रहे हैं. लोगों का यह भी कहना है कि सिद्धू जो कभी राज्य में मुख्यमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार हुआ करते थे वह अब महज एक नेता बनकर रह गए हैं.

विश्लेषकों का कहना है कि पिछले कुछ दिनों के दौरान राज्य में चौथे मोर्चे की संभावना दिखाई दे रही थी. इसमें सिद्धू की आवाज ए पंजाब, पूर्व आम आदमी पार्टी के संयोजक सुचा सिंह छोतेपुर की प्रस्तावित पार्टी और स्वराज अभियान शामिल थी. लेकिन अब यह संभावना खत्म हो गई है.

सिद्धू अभी भी आम आदमी पार्टी को लेकर चुप हैं और वह लगातार कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल पर हमला कर रहे हैं.

सिद्धू अभी भी आम आदमी पार्टी को लेकर चुप हैं और वह लगातार कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल पर हमला कर रहे हैं. आवाज-ए-पंजाब को पार्टी में तब्दील नहीं किए जाने के फैसले ने एक बार फिर से सिद्धू के आम आदमी पार्टी में जाने की संभावना को जीवित कर दिया है.

आम आदमी पार्टी के नेता हिम्मत सिंह शेरगिल को इस मसले पर जवाब देना मुश्किल होता जा रहा है. उन्होंने सिद्धू के फैसले की तारीफ की लेकिन कहा कि अगर वह पार्टी बनाते तो यह आम आदमी पार्टी के लिए खतरनाक होता.

शेरगिल ने कहा, 'आज पंजाब के लोग अकाली और कांग्रेस को बिलकुल भी देखना नहीं चाहते. लेकिन अगर सिद्धू पार्टी बनाते तो इससे अकाली और कांग्रेस को फायदा होता. इसलिए उनका फैसला स्वागत योग्य है.'

पार्टी के लिए यह शर्मनाक इसलिए है क्योंकि उन्होंने अभी हाल ही में दिल्ली के  मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के खिलाफ करीब पंद्रह दिनों पहले ही टिप्पणी की थी. 

सिद्धू को पूर्व कांग्रेसी नेता जगमीत सिंह बरार का जबरदस्त समर्थन मिला था जो फिलहाल पहलान पंजाब लोक हित अभियान के संयोजक हैं. बरार ने हाल ही में आम आदमी पार्टी को बिना किसी शर्त अपना समर्थन दिया था.

बरार ने कहा, 'मैं अपने भाई नवजोत सिद्धू, परगट सिंह और बलविंदर सिंह और सिमरजीत सिंह के फैसले का स्वागत करता हूं. हम सभी को अकाली और कांग्रेस के 5-5 साल के शासन करने के समझौते से पंजाब को बचाने के लिए भाई की तरह मिलकर काम करना होगा जो पंजाब को 20 सालों से लूटते आ रहे हैं.'

नहीं बनेगा चौथा मोर्चा

आवाज ए हिंद की घोषणा के बाद सिद्धू, परगट सिंह और बेन भाइयों को एक टिकाऊ विकल्प के तौर पर देखा जा रहा था. विश्लेषकों का कहना है इन सभी में निर्दलीय चुनाव लड़कर जीतने की क्षमता थी. अगर यह सभी अपनी ही तरह के 10 अन्य नेताओं को पार्टी से जोड़ पाते तो यह समूह पंजाब में किंगमेकर की भूमिका निभा सकता था.

लेकिन अब जो हुआ वह अपने आप में सवाल है. क्या सिद्धू चुनाव लड़ेंगे? अगर हां तो किसके टिकट पर? क्या परगट सिंह चुनाव लड़ेंगे? अगर हां तो किसकी तरफ से. क्या बेन भाई इस बार निर्दलीय चुनाव लड़कर अपना प्रदर्शन दोहरा पाएंगे?

इस बीच विश्लेषकों का कहना है कि सिद्धू राजनीतिक चुनौती का सामना करने में विफल रहे हैं. पंजाब कांग्रेस के प्रेसिडेंट कैप्टन अमरिंदर सिंह लगातार नए मोर्चे की गैर व्यावहारिकता पर बोलते रहे हैं. उन्होंने हाल ही में कहा था, 'मैंने यही कोशिश अकाली से निकलने के बाद की थी और दो सालों तक कुछ नहीं हो पाया. तो फिर वह चुनाव से पांच महीनों पहले ऐसा कैसे कर सकते हैं?'

शिरोमणि अकाली दल सिद्धू के फैसले पर हमलावर है. पार्टी का कहना है कि सिद्धू का फैसला चुनाव से पहले की स्वीकारोक्ति है. अकाली दल के सचिव दलजीत सिंह चीमा ने कहा कि कुछ दिनों के भीतर ही सिद्धू को जमीनी हकीकतों का पता चल गया.

चीमा ने कहा स्थितियों की वजह से सिद्धू ने आवाज ए पंजाब को छोड़कर कहीं और राजनीतिक प्रश्रय लेने के लिए मजबूर कर दिया. 

उन्होंने कहा कि यह सभी घटनाक्रम पंजाब में अकाली दल की बढ़ती लोकप्रियता को बताता है. उन्होंने कहा पंजाब में बीजेपी और अकाली गठबंधन के लिए यह बेहतर स्थिति है.

First published: 23 September 2016, 7:16 IST
 
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