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प्रधानमंत्री खुद हैं डिग्री पर फजीहत के सबसे बड़े ज़िम्मेदार

पाणिनि आनंद | Updated on: 12 May 2016, 8:00 IST
QUICK PILL
  • यह कितना दुखद है कि देश के प्रधानमंत्री अब इसलिए ख़बरों में हैं कि उनकी डिग्री असली है या नकली. सार्वजनिक जीवन के सर्वोच्च पद पर बैठे आदमी की पारदर्शिता एक तिलिस्मी कहानी जैसी मालूम दे रही है.
  • प्रधानमंत्री का मौन ही उनको और अधिक संदिग्ध साबित करता जा रहा है. सूखा, भूख से मौतें, दलित और महिलाओं पर अत्याचार जैसे मामलों पर चुप साधे मोदी अपने मामले पर भी कुछ बोलने का साहस नहीं जुटा पा रहे.

इससे पहले की बहस को किसी दिशा में लेकर जाया जाए, एक बात स्पष्ट करना बहुत ज़रूरी है कि देश के प्रधानमंत्री ने पीएचडी की है या वो आठवीं दर्जा पास किए हुए हैं, इससे बहुत फ़र्क नहीं पड़ता है. जो पढ़े लिखे हैं, वो देश के लिए अच्छा ही करेंगे, ऐसा इतिहास नहीं बताता. और जो अनपढ़ हैं या कम पढ़े लिखे हैं, वो मानवीय मूल्यों, संवैधानिक मर्यादाओं को और जनहित को नहीं जानते, ऐसा भी कतई नहीं है.

जिन लोगों ने मोदी को वोट किया उनमें यह किसी ने नहीं सोचा था कि मोदी ने कितना पढ़ा है और इसलिए उन्हें वोट करना है. ऐसा ही वोट न देनेवालों के बारे में भी कहा जा सकता है कि जिन लोगों ने मोदी के प्रति अपना विश्वास नहीं जताया, वे यह नहीं सोच रहे थे कि मोदी ने तो यह नहीं पढ़ा या यहां तक नहीं पढ़ा और इसलिए हम उन्हें वोट नहीं करेंगे.

यह चयन शुद्ध रूप से बाकी कई दूसरे पहलुओं पर आधारित है. यह ज़्यादा महत्वपूर्ण है कि देश का प्रधानमंत्री क्या सोचता है और क्या करता है. इसी से उसकी विवेकशीलता और बौद्धिकता का आकलन किया जाना चाहिए.

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बल्कि पिछले दिनों भाजपा शासित राज्यों की सरकारों ने जिस तरह से पंचायत चुनावों आदि के लिए साक्षरता और एक स्तर तक की पढ़ाई का मानक स्थापित किया है, उसे कतई संविधानसंगत और उचित नहीं ठहराया जा सकता है. 

इस तरह के नियमों से एक बहुमत आबादी को, जिसमें अधिकतर पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक और महिलाएं आती हैं, को चुनाव लड़ने और लोगों का प्रतिनिधित्व करने के उनके अधिकार से वंचित ही किया गया है.

तो प्रधानमंत्री मोदी डिग्रीधारी हैं या आठवीं पास हैं, इसके बजाय मुझे उनके अबतक के कृतित्व और आज के फैसलों को लेकर ज़्यादा चिंता होती है. यह कितना दुखद है कि देश के प्रधानमंत्री अब इसलिए ख़बरों में हैं कि उनकी डिग्री असली है या नकली. सार्वजनिक जीवन के सर्वोच्च पद पर बैठे आदमी की पारदर्शिता एक तिलिस्मी कहानी जैसी मालूम दे रही है. 

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स्वाभाविक स्थिति में होना तो यह चाहिए था कि कोई जैसे ही शैक्षणिक योग्यता को लेकर कोई भी पहला सवाल करता, प्रधानमंत्री तत्काल अपने तमाम दस्तावेज सार्वजनिक करते हुए एक परिपक्व राजनीतिज्ञ की तरह कहते, “मैं अमुक अमुक विद्यालयों, विश्वविद्यालयों से पढ़ा हूं. ये रहे इसके दस्तावेज. इसकी जांच करने के लिए आप स्वतंत्र हैं. हां, इतना ज़रूर है कि इन पाठशालाओं ने मुझे पढ़ाया है, लेकिन आप लोगों ने मुझे सबसे ज़्यादा सिखाया है. मेरा सबसे बड़ा गुरुकुल मेरा देश है”. 

उन्होंने शपथ पत्रों में अलग अलग तथ्यों से भ्रम नहीं पैदा किया और न ही किसी क़ानून का उल्लंघन किया

अफ़सोस, यह परिपक्वता और पारदर्शिता, दोनों ही नदारद हैं. इससे पहले देश के किसी प्रधानमंत्री के बारे में इस प्रकार से कीच होते न देखी, न सुनी. जो कम पढ़े और जो ज़्यादा पढ़े लिखे थे, उनके बारे में जानकर भी लोग उनके काम को लेकर ज़्यादा चिंतित-उत्साहित रहे. 

उनकी ओर से भी कुछ छुपाया दबाया नहीं गया. न ही महीनों लंबा मौन शंकाओं की आग में घी डालता रहा. उन्होंने शपथ पत्रों में अलग अलग तथ्यों से भ्रम नहीं पैदा किया और न ही किसी क़ानून का उल्लंघन किया. फिर एक त्वरित और पारदर्शी व्यवस्था का नारा दोहराते रहनेवाले मोदी ऐसा क्यों कर रहे हैं, यह समझ से परे है.

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आखिर क्या रोक रहा है देश के प्रधानमंत्री को जो वो इस मामले पर खुद सामने आकर सबकुछ स्पष्ट नहीं कर रहे. लोगों ने पूछा तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा. आप लोगों के प्रति जवाबदेह हैं. तथ्य रखकर आप बौने नहीं होंगे, आपका कद और ऊंचा हो जाएगा. आपके विरोधियों की बोलती बंद हो जाएगी.

प्रधानमंत्री के बचाव में भारतीय जनता पार्टी और उसके अध्यक्ष अमित शाह यह कहते नज़र आ रहे हैं कि आम आदमी पार्टी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री की शैक्षणिक योग्यता के प्रमाणपत्रों को फ़र्ज़ी बताकर उनका अपमान किया है. वो शायद यह नहीं समझ पा रहे हैं कि मोदी का इस मसले में अपमान (यदि हुआ है तो) करने के लिए सबसे बड़े दोषी मोदी खुद हैं.

अनसुलझे सवाल


  • क्या प्रधानमंत्री से वाकई भूल हो गई है?
  • क्या उनके द्वारा शपथपत्रों में दी गई जानकारी असंगत है और भूलवश या जानते हुए ग़लती हो गई है?
  • क्या उनको ग़लत शपथपत्र की स्थिति में जेल जाने का और संसद सदस्यता रद्द होने का ख़तरा दिखाई दे रहा है?
  • क्या प्रधानमंत्री वाकई यह समझते हैं कि इससे उनकी छवि पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई असर नहीं पड़ रहा है और लोग उनपर चुटकुले कहें, इससे उनको कोई फ़र्क नहीं पड़ता?
  • ऐसी कौन सी दुविधा है जो प्रधानमंत्री को मनमोहन सिंह की तरह मौन रहने पर विवश कर रही है? 
  • मन की बात करने वाला व्यक्ति सच की बात करने से क्यों कतरा रहा है?

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उनको चाहिए कि इस मामले पर पूरी स्थिति स्पष्ट करते हुए सबकुछ सार्वजनिक कर दें. लोग अगर दो कागज़ मांग रहे हैं तो आप चार सामने रख दीजिए. यह आपके आत्मविश्वास को भी दिखाएगा और सच्चाई को भी. 

और इसके लिए अरुण जेटली या अमित शाह का कंधा पकड़ने के बजाय खुद सामने आना ही श्रेयस्कर है. अमित शाह आपकी पार्टी के अध्यक्ष हैं लेकिन यहां बात मोदी की अपनी शैक्षणिक योग्यता की है और इसलिए खुद सामने आने से क्यों संकोच?

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विडंबना यह है कि जहाँ एक ओर भाजपा ने इसे पद की प्रतिष्ठा का सवाल बनाकर पेश करना शुरू कर दिया है, बाकी राजनीतिक दल इसपर कोई ठोस हल निकालने के बजाय राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगे हैं. आम आदमी पार्टी का संकट यह है कि उनके आंगन में खुद ऐसे कितने ही विधायक हैं जिनकी शैक्षणिक योग्यता के दस्तावेजों को लेकर सवाल उठते रहे हैं. 

दिल्ली सरकार के निवर्तमान क़ानूनमंत्री जितेंदर सिंह तोमर को तो ख़ैर जेल जाना पड़ा और पद व पार्टी से इस्तीफा भी देना पड़ा. यह आम आदमी पार्टी का अकेला नाम नहीं हैं. आआपा न तो अपना आंगन पहले बुहारने के प्रति गंभीर है और न ही मोदी के खिलाफ कोई ठोस क़दम उठाने के प्रति प्रयासरत.

मोदी अगर दोषी हैं तो उनके और तोमर के बीच भेद क्यों. और जब भेद नहीं तो फिर क्यों इसे क़ानूनी चुनौती न दी जाए

आम आदमी पार्टी की ओर से दावा किया जा रहा है कि उनके पास इस बात के पर्याप्त साक्ष्य हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री नकली हैं. लेकिन पार्टी के नेता उन साक्ष्यों के आधार पर न तो मोदी की डिग्री को क़ानूनी चुनौती दे रहे हैं और न ही चुनाव आयोग से इसकी शिकायत कर रहे हैं. 

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जिस फर्जीवाड़े में आम आदमी पार्टी को खुद किरकिरी झेलनी पड़ी है, उसी मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय के परिसर में राजनीतिक प्रदर्शन करने के बजाय आआपा को क़ानून का रास्ता अपनाना चाहिए.

मोदी अगर दोषी हैं तो उनके और तोमर के बीच भेद क्यों. और जब भेद नहीं तो फिर क्यों इसे क़ानूनी चुनौती न दी जाए. क़ानूनी प्रक्रिया दोनों के लिए सच को सामने लाने का सबसे तार्किक रास्ता हो सकती है. आपा के लिए भी और प्रधानमंत्री के लिए भी. 

बाकी दल इसपर राजनीतिक पहल कर चुके हैं लेकिन क़ानूनी पहल अबतक नहीं दिख रही. अफसोस यह है कि प्रधानमंत्री राजनीतिक रूप से भी अपने प्रति भ्रम को हल करने के बजाय उसे और गहरा करते जा रहे हैं.

'जनता के भरोसे और अपनी प्रतिष्ठा के लिये प्रधानमंत्री को डिग्री की सच्चाई बतानी चाहिए'

प्रधानमंत्री का मौन ही उनको और अधिक संदिग्ध साबित करता जा रहा है. सूखा, भूख से मौतें, दलित और महिलाओं पर अत्याचार जैसे मामलों पर चुप साधे मोदी अपने मामले तक पर कुछ बोलने का साहस नहीं जुटा पा रहे. देश का प्रधानमंत्री इतना कमज़ोर कभी नहीं था. अपनी शैक्षणिक योग्यता को लेकर उठे विवाद के प्रति इस मौन के टूटने तक मोदी खुद सबसे बड़े दोषी हैं.

(विचार लेखक के निजी हैं. इनसे संस्थान की सहमति आवश्यक नहीं है)

First published: 12 May 2016, 8:00 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

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