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नोटबंदीः पूर्वोत्तर के आतंकी गुटों में लगी नोट बदलवाने की होड़

सादिक़ नक़वी | Updated on: 20 November 2016, 8:34 IST
QUICK PILL
  • नोटबंदी की घोषणा होने के बाद से असम में सक्रिय उग्रवादी संगठनों में अपनी पुरानी करेंसी को बचाने की होड़ लग गई है. 
  • अभी तक किसी गुट की धरपकड़ नहीं हुई है लेकिन एजेंसियों के मुताबिक उग्रवादी संगठन करेंसी बदलवाने के लिए स्थानीय आदिवासियों की मदद ले रहे हैं.

काले धन की समस्या से निपटने और अर्थव्यवस्था को दुरूस्त करने के लिए अचानक बड़े नोटों को बंद करने का जो फैसला लिया गया, वह आम जनता के लिए तो परेशानी का सबब बना ही, इससे पूर्वोत्तर राज्यों में आतंकी गुटों के बीच भी खलबली मच गई है.

पूर्वोत्तर के आतंकी गुट पुराने नोट बदलवाने के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं. सुरक्षा महकमों से जुड़े सूत्रों ने बताया कि कुछ छोटे गुटों ने भारतीय मुद्रा के पुराने नोटों के साथ म्यांमार जैसे पड़ोसी देशों में डेरा जमा लिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवम्बर को नोटबंदी का जो फैसला सुनाया, उससे एक झटके में ढेरों नोट बेकार हो गए.

बैंकों पर पैनी नज़र

रिपोर्टों के मुताबिक पूर्वोत्तर में आतंक की अर्थव्यवस्था 350-400 करोड़ रुपए से ज्यादा है. असम के कोकराझार और चिरांग जिलों के अधिकारियों ने बताया यहां बोडोलैंड में एनडीएफबी गुट काफी सक्रिय हैं, इसलिए वे बैंकों में हो रहे लेन-देन पर पैनी नजर रखे हुए हैं. हालांकि अब तक ऐसा कोई मामला दर्ज नहीं हुआ है.

सूत्रों ने बताया कि एनडीएफबी उन लोगों से नोट बदलवाने में लगा है जिनके पास बैंक अकाउंट है. बैंकों में लगी कतार में ऐसे कई लोग देखे जा सकते हैं. खुफिया विभाग के सूत्रों ने कहा, 'हम बैंकों में होने वाले संदिग्ध लेन-देन पर कड़ी नजर रख रहे हैं. यह गुट ऑपरेशन ऑल आउट के निशाने पर रह चुका है.'

दिसम्बर 2014 एनडीएफबी द्वारा आदिवासियों के लिए किए गए नरसंहार के बाद उसके खिलाफ भारतीय सेना, अर्द्धसैनिक बलों और असम पुलिस ने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया था. इस दौरान करीब 90 आतंकियों और दलालों को गिरफ्तार किया गया था, जिसने बोडोलैंड की आजादी के लिए लड़ने वाले इस गुट की कमर तोड़ कर रख दी थी. यह गुट मुस्लिम और आदिवासियों जैसे कमजोर तबकों को निशाना बनाता रहा है.

उल्फा के पास आठ करोड़

एक उच्च स्तरीय सूत्र ने बताया एनडीएफबी से निपटने में सुरक्षा बलों और एजेंसियों को बड़े पैमाने पर सफलता हासिल हुई है. इसे उल्फा (वार्ता विरोधी) और एनएससीएन (के-खपलांग) की तरह फंडिंग भी नहीं मिल रही, जो सुरक्षा एजेंसियों से बचने के  लिए म्यांमार में डेरा डाल कर बैठे हैं. सूत्रों के अनुसार नगा रोधी आतंकी संगठन एनएससीएन (के) और उल्फा के पास नोटों के ढेर लगे हैं. म्यांमार के काजां में सीमा के साथ लगे एनएससीएन (के) के पास कितना पैसा होगा, यह अनुमान नहीं लगाया जा सका है जबकि उल्फा के पास 8 करोड़ रूपए की नकदी जमा है.

सूत्रों के अनुसार, सरकार के इस कदम से सबमें एक तरह का खौफ बैठा हुआ है और सुरक्षा एजेंसियों को आशंका है कि इन आतंकी गुटों ने हो सकता है कुछ पैसा सीमा पार भेज दिया हो और अब उसकी तस्करी कर उसे नए नोटों से बदलने की कोशिशें की जाएंगी, जो खासतौर पर इतनी निगरानी के बीच बहुत मुश्किल है.

आदिवासियों से मदद

एनएससीएन (के) प्रतिबंधित गुट है और वार्ता के पक्षधर नागा संगठन एनएससीएन (आईएम) के बीच फिलहाल सीजफायर के हालात हैं. सूत्रों के अनुसार इन गुटों के लिए पुराने नोटों को नए नोटों से बदलना अपेक्षाकृत आसान होगा, क्योंकि आदिवासी उनके समर्थक हैं, जिन्हें आयकर से छूट प्रप्त है. इस सबके बावजूद संदिग्ध लेन-देन की तो जांच होगी ही ताकि मनी लॉन्ड्रिंग और अन्य आपराधिक गतिविधि को उजागर किया जा सके.

नकदी की कमी से जूझ रहे उल्फा के वार्ता विरोधी संगठन ने 15 नवम्बर को तिनसुकिया के चाय बागानों के मजदूरों के लिए नकदी ले कर जा रही एक वैन पर गोलियों की बौछार कर डाली. मजेदार बात यह है कि सुरक्षा अधिकारियों ने कहा, 'नोटबंदी से दूसरे अवैध धंधों के रास्ते खुल गए हैं लेकिन लूट खसोट पर पाबंदी लग गई है क्योंकि लोग उन्हें पुराने ही नोट दे रहे हैं, जिसकी उनके लिए कोई कीमत ही नहीं है.'

First published: 20 November 2016, 8:34 IST
 
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