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सिमी एनकाउंटर: कमोबेश पूरी मीडिया ने विचाराधीन कैदियों को आतंकवादी बना दिया

जॉयजीत दास | Updated on: 11 February 2017, 5:46 IST
QUICK PILL
  • भोपाल सेंट्रल जेल से कथिततौर पर फ़रार सिमी सदस्यों का सोमवार को ईंटखेड़ी इलाक़े में एनकाउंटर कर दिया था. 
  • मारे गए सभी सिमी सदस्य आरोपी थे ना कि आतंकवादी. बावजूद इसके, प्रिंट मीडिया ने इस महत्वपूर्ण तथ्य की अनदेखी की. 

मध्यप्रदेश में सोमवार को जब आठ विचाराधीन क़ैदी मारे गए तो भारतीय मीडिया हरकत में आ गया. उसे आना भी चाहिए था. मगर मीडिया के एक धड़े ने पत्रकारीय नीति को दरकिनार करते हुए इस मामले में तथ्यात्मक रूप से गलत रिपोर्टिंग की. 

सुबह-सुबह कवरेज कुछ इस तरह शुरू हुई कि सिमी के आठ सदस्य एक सुरक्षाकर्मी की हत्या कर भोपाल सेंट्रल जेल से फ़रार हो गए हैं. इसके फौरन बाद ख़बर आई कि एक पुलिस टीम ने जेल से कुछ किलोमीटर दूर जंगली एरिया में घेरकर उनका 'एनकाउंटर' कर दिया है. 

शाम तक इस 'एनकाउंटर' से जुड़े तीन वीडियो क्लिप भी आ गए. फिर मीडिया में सवाल भी उठने लगा कि यह सचमुच का एनकाउंटर था या सबकुछ मनगढ़ंत तरीक़े से परोसा जा रहा है. सोशल मीडिया पर भी बहस छिड़ गई कि यह एनकाउंटर है या नहीं?

'प्राइम टाइम न्यूज़' के वक़्त तक मीडिया के पास दिखाने के लिए भरपूर मसाला इकट्ठा हो चुका था. उसके पास एनकाउंटर के पक्ष या विपक्ष में तमाम राजनीतिक दलों के बयान भी आ चुके थे. 

यह कहने की ज़रूरत नहीं कि मीडिया इस ख़बर पर रोमांचित था जैसे कि उसे सचमुच होना चाहिए था. मगर रोमांच और उत्तेजना से भरपूर इस एनकाउंटर की कवरेज में मीडिया भूल गया कि मारे गए आठ लोग क्या थे? 

इस बीच मीडिया का एक धड़ा अपने पेशे की गंभीरता को समझते समझते हुए सरकारी बयानों पर भरोसा करने के लिए तैयार नहीं दिख रहा था. 

जिन आठ लोगों को मारा गया था, सभी अंडरट्रायल थे. उनमें से कोई भी सज़ायाफ़्ता नहीं था. उनपर आरोप गंभीर थे. हत्या, लूट, देशद्रोह, जेल से फ़रारी और इन सबसे बढ़कर वे प्रतिबंधित संगठन इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया से कथिततौर पर संबंध रखते थे. मगर ये तमाम आरोप मिलकर भी यह साबित नहीं करते कि वे अपराधी थे. सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्हें किसी अपराध में सज़ा नहीं सुनाई गई थी. बावजूद इसके, मीडिया के एक बड़े धड़े ने उन्हें 'आतंकवादी' घोषित कर दिया था. 

इसमें कोई शक़ नहीं कि पत्रकारों पर काम का दबाव होता है. ऐसे में गलतियां स्वभाविक हैं. शुरुआती रिपोर्ट में अगर कुछ गड़बड़ियां होती हैं तो माफ़ भी कर दिया जाता है क्योंकि शुरुआत की आपाधापी में पुख़्ता जानकारी नहीं मिल पाती. मगर मीडिया को जब अपनी गलती का पता चल भी जाता है, तब भी वह इसे ठीक नहीं करता. यूं ही छोड़ देता है. अब यह एक तरह का ट्रेंड बन चुका है. यही वजह रही कि भोपाल एनकाउंटर पर बहुत सारे अख़बारों ने मारे गए उन विचाराधीन बंदियों को आतंकी लिखा. 

हिंदी का एक अख़बार दैनिक जागरण है. अख़बार गर्व से दावा करता है कि वह दुनिया का सबसे पढ़ा जाने वाला हिंदी दैनिक है. पहले पन्ने पर एनकाउंटर को लीड ख़बर बनाते हुए इसने लिखा है, 'भोपाल जेल से भागे 8 आतंकी ढेर.' अख़बार ने इस ख़बर को ऊपर के आधे पन्ने में सात कॉलम में जगह दी है. डबल कॉलम की एक ख़बर में इन बंदियों से जुड़ी जानकारी लिखी है. इसकी हेडिंग में भी अख़बार लिखता है, 'केंद्रीय जेल से भागे सिमी के आतंकियों का पुलिस ने किया एनकाउंटर.' इसके ठीक बगल में एक और डबल कॉलम की स्टोरी है. इसकी हेडिंग में भी इन बंदियों को आतंकी लिखा गया है. 

दूसरा बड़ा अख़बार दैनिक भास्कर है जो अपने बारे में दावा करता है, 'आप पढ़ रहे हैं देश का सबसे विश्वसनीय और नंबर 1 अख़बार.' इसके पहले पन्ने की हेडलाइन है, 'सेंट्रल जेल में प्रहरी की हत्या कर भागे 8 सिमी आतंकियों का 8 घंटे में एनकाउंटर.' अख़बार यह भी दावा करता है कि 'देश में पहली बार ऐसा ऑपरेशन जिसमें आठ घंटे के अंदर फरार सभी आतंकियों को मार गिराया गया.'

ओह, इस अख़बार के बारे में एक बात बताना रह गई. इसके मास्टहेड पर दाहिनी तरफ़ एक सुविचार भी लिखा हुआ है, 'हमें कर्म ज़्यादा, सोचना-विचारना कम और जीवन को अपने सामने से गुज़रते देखना बंद करना चाहिए, चेम्सफोर्ट.' क्या यह हंसने लायक और भद्दा नहीं है?

अमर उजाला अख़बार जो पूरे उत्तर भारत में बिकता है, इसने लिखा है, 'भोपाल जेल से गार्ड का गला रेत कर भागे 8 सिमी आतंकी मुठभेड़ में ढेर.' 

पंजाब केसरी का शीर्षक है, 'जेल से भागे सिमी के 8 आतंकी ढेर' 

ठीक इसी से मिलता-जुलता शीर्षक हिन्दुस्तान अख़बार का है, 'जेल से फ़रार सिमी के आठ आतंकी मारे गए' 

हिंदी के अख़बारों में सिर्फ नवभारत टाइम्स है जिसने इन्हें आतंकी की बजाय सिमी का सदस्य बताया है. 

मगर यह समस्या सिर्फ़ हिंदी के अख़बारों के साथ नहीं थी. 

सबसे बड़े बंगाली अख़बार आनंद बाज़ार पत्रिका ने आठ कॉलम की हेडलाइन में सिमी के सदस्यों को 'जोंगी' लिखा है. बांग्ला भाषा में आमतौर पर इस शब्द का इस्तेमाल मिलिटेंट के लिए किया जाता है.   

आनंद बाज़ार पत्रिका से आगे निकलने की होड़ में लगा राज्य का दूसरा अख़बार वर्तमान भी इन्हें 'जोंगी' लिखता है. 

टाइम्स समूह के बांग्ला अख़बार एई शमॉय ने भी इन्हें 'जोंगी' बताया है. 

असम में सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले अख़बार 'असमिया प्रतिदिन' ने इन्हें 'संत्रासवादी' लिखा है. यह शब्द भी राज्य में आतंकी या उग्रवादी के लिए इस्तेमाल किया जाता है. 

ओडिशा के प्रमुख अख़बार संवाद का शीर्षक है, 'आठ सिमी आतंकवादी की मौत' 

राज्य का बाकी अख़बार 'समाज', 'प्रजातंत्र', 'प्रमेय' और 'ओडिशा भास्कर' ने भी इन्हें आतंकी लिखा है. 

ज़्यादातर अख़बारों में एक और समानता देखने को मिली है. इन्होंने अपने शीर्षक में 'ढेर' शब्द का इस्तेमाल किया है. अमूमन यह शब्द सामने वाले को अपमानित करने या नीचा दिखाने के लिए किया जाता है. 

एक बार के लिए मान लिया जाए कि अत्यधिक दबाव में काम करने वाले न्यूज़ चैनलों से यह गलतियां हो जाती हैं. मगर बार-बार एक ही मज़हब से जुड़ी ख़बरों में गलतियां? एक और सवाल परेशान करता है. क्या हमारे आसपास ज़्यादातर पत्रकार अब सिर्फ सरकारी बयान को ही अंतिम सच मानने लगे हैं?

First published: 2 November 2016, 8:29 IST
 
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