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क्या मौत ही इलाज है शिमला के बंदरों का?

राजीव खन्ना | Updated on: 2 April 2016, 13:14 IST
QUICK PILL
  • हिमाचल प्रदेश सरकार ने शिमला में बंदरों को हिंसक जानवर घोषित करवा लिया है. अब इलाके के बंदरों को कानूनी तौर पर मारा जा सकता है.
  • बंदरों से शिमला समेत राज्य के कई इलाके बुरी तरह प्रभावित हैं. राज्य सरकार दूसरे इलाकों में भी ऐसी ही इजाजत मांग रही है. हालांकि अभी इस दिशा में कई बाधाएं हैं.

हिमाचल प्रदेश सरकार ने शिमला में बंदरों के उत्पात से तंग आकर उन्हें हिंसक जीव घोषित करवा दिया है. राज्य सरकार ने पिछले साल सितंबर में केंद्र सरकार से इसकी मंजूरी मांगी थी. हिंसक जानवर घोषित किए जाने के बाद शिमला नगर निगम में बंदरों को कानूनी तौर पर मारा जा सकता है.

हिमाचल प्रदेश सरकार लगातार राज्य के 12 ज़िलों की 10 तहसीलों में बंदरों को हिंसक जानवर घोषित करने की मांग करती रही है. राज्य सरकार ने कुछ हफ्ते पहले केंद्र के पास इस बाबत अर्जी भेजी थी. राज्य में बंदरों का आतंक इतना बढ़ चुका है कि विधानसभा में भी ये मुद्दा उठ चुका है.

केंद्र सरकार ने पिछले साल बंदरों को हिंसक घोषित करने की अर्जी ठुकरा दी थी. केंद्र ने राज्य सरकार से किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले बंदरों की गणना कराने के लिए कहा था.

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पिछले साल जुलाई में हुई गणना में शिमला नगरपालिका में 2452 बंदर पाए गए. इसके अलावा जाखू, समर हिल, ग्लेन, कैथू, खालिनी, फागली, टुूटी कांडी और बरारी को बंदरों से सर्वाधिक प्रभावित इलाके के रूप में चिह्नित किए गए.

पिछले तीन सालों में शिमला इलाके में 296 लोगों को बंदर काट चुके हैं

पिछले तीन सालों में शिमला इलाके में 296 लोगों को बंदर काट चुके हैं. राज्य सरकार अब तक 19.74 लाख रुपये पीड़ितों को दे चुकी है. पूरे राज्य में पिछले साल सितंबर तक 674 लोगों को बंदर काट चुके थे और राज्य सरकार पीड़ितों को 28 लाख रुपये दे चुकी थी.

बंदरों की समस्या से राज्य में आने वाले सैलानियों को भी काफी दिक्कत होती है. नगरपालिका ने जगह-जगह बंदरों को खाने-पीने का सामान न देने के बोर्ड लगा रखे हैं. फिर भी बंदरों द्वारा यात्रियों का सामान वगैरह छीना-छपटी की घटनाएं होती रहती हैं.

साल 2004 में मंदिर परिसरों को छोड़कर दूसरी किसी सार्वजनिक जगह पर बंदरों को कुछ खिलाने पर पाबंदी लगा दी गयी थी. लेकिन राज्य के दूसरे इलाकों में ये कानून नहीं है.

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राज्य के ग्रामीण इलाकों से भी बंदरों द्वारा काटने और फसलों को नुकसान पहुंचाने की शिकायत आती रहती है. खबरों के अनुसार राज्य सरकार ने केंद्र को लिखा है कि बंदरों की वजह से 184.28 करोड़ रुपये की फसल तबाह हो चुकी है.

बंदर पानी की टंकी वगैरह को भी गंदा कर देते हैं जिससे संक्रमण से होने वाली बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. बंदर लोगों की कपड़े, खिलौने, टेलीफोन जैसी चीजें भी उठा लेते हैं. बिजली के तार, केबल टीवी के तार, डिश एंटीना इत्यादि को भी बंदर नुकसान पहुंचा देते हैं. बंदर कई बार सड़कों पर लगे बल्ब और गाड़ियों के शीशे भी तोड़ देते हैं.

बंदरों के आतंक से परेशान होकर राज्य के वन विभाग ने बंदरों की नसबंदी का कार्यक्रम भी शुरू किया. हजारों बंदरों की नसबंदी के बावजूद लेकिन इससे कोई प्रभावी राहत नहीं मिला.

राज्य सरकार के अनुसार 2006-07 से ही नसबंदी कार्यक्रम चला रही है और अब तक 51 फीसदी से अधिक बंदरों की नसबंदी की जा चुकी है. फिर भी बंदरों के नियंत्रण के लिए उनकी जान लेना जरूरी हो गया है.

राज्य सरकार ने केंद्र से कहा है कि बंदर 184.28 करोड़ रुपये की फसल तबाह कर चुके हैं

साल 2015 तक हिमाचल में कुल 207614 बंदर थे. वन विभाग के लिए ये बंदर मुसीबत बन चुके हैं. इसलिए राज्य सरकार ने शिमला के बाद बंदरों से प्रभावित दूसरे इलाकों, खासकर पर्यटन स्थलों में भी ऐसी ही अनुमति मांगी है.

हालांकि वन विभाग के सूत्रों के अनुसार बंदरों को वैज्ञानिक ढंग से मारने की राह में अभी वक्त है.

एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, "पहली बाधा कानूनी है. बंदरों को मारने की इजाजत देने का आदेश देने से पहले इस पर कानूनी राय लेनी पड़ेगी. बंदरों के मारने के मसले पर हिमाचर प्रदेश के हाईकोर्ट ने स्थगन आदेश दिया है. दूसरी तरफ कानून कहता है कि जान का खतरा पैदा होने पर कोई जंगल से बाहर के किसी हिंसक जानवर को मार सकता है. इससे पहले भी मुख्य वनाधिकारी बंदरों को मारने का आदेश दे चुके हैं."

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अधिकारी के अनुसार बंदरों को मारने का काम सरकार नहीं करेगी. लोगों को खुद ये करना होगा. वो कहते हैं, "कई लोगों के लिए बंदरों का धार्मिक महत्व है. अब ये देखने की बात है कि लोग इसपर क्या रवैया अपनाते हैं. करीब एक दशक पहले सिरमौर में जब पहले ऐसी इजाजत मिली थी तो वहां के लोगों ने 200 बंदर मारे थे."

बंदरों को मारने के मुद्दे पर कई पर्यावरण कार्यकर्ता भी सरकार के समर्थन में हैं. राज्य के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता सुखदेव विश्वप्रेमी कहते हैं, "पिछले साल सड़क किनारे काम करने वाले एक व्यक्ति की बंदर को काटने से मौत हो गयी. बंदरों के काटने से रैबीज हो जाता है. सबसे ज्यादा खतरा बच्चों पर है. नसबंदी कार्यक्रम के विफल हो जाने के बाद कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है."

हालांकि विश्वप्रेमी स्पष्ट करते हैं कि बंदरों को मारना कोई टिकाऊ उपाय नहीं है. सरकार को इस मुद्दे का स्थायी समाधान खोजना चाहिए.

First published: 2 April 2016, 13:14 IST
 
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