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राष्ट्रगान जरूरी: क्या थिएटरों में राष्ट्रगान से देशभक्ति बढ़ेगी?

बिनो के जॉन | Updated on: 1 December 2016, 8:10 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि अब थियेटर में दर्शकों को फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान के लिए खड़ा होना पड़ेगा. 
  • एक बड़ा सवाल यह है कि अगर किसी फिल्म में राष्ट्रभक्ति के विचार को चुनौती दी जा रही हो, तो क्या उस फिल्म में राष्ट्रगान के लिए खड़े होना बेतुका नहीं होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने 30 नवंबर को आदेश दिया है कि सभी थिएटरों में राष्ट्रगान ज़रूरी है, जबकि थियेटर स्क्रीन पर लहराता राष्ट्रीय झंडा इस फैसले पर कुछ और ही सवाल करता नजर आता है. क्या सरकार और देश को अपने नागरिकों की देशभक्ति पर भरोसा नहीं है?

इस फैसले से कई मुद्दे उठे हैं. सबसे पहले तो यह कि जब देश अपना काम अच्छी तरह कर रहा है, तो कौमपरस्ती के लिए न्यायिक दबाव क्यों? क्या ऐसा करके न्यायपालिका इस महान देश का सहारा बन रही है या प्रबुद्ध न्यायाधीशों को देशवासियों की कौमपरस्ती पर संदेह है? इस फैसले से फिल्म शुरू होने के पहले पांच मिनट के राष्ट्रगान से राष्ट्र के लिए सम्मान तो दिखेगा, पर दूसरे दूरगामी प्रभाव भी होंगे. 

बेतुका फ़ैसला?

समझ में नहीं आ रहा कि आखिर थिएटर में राष्ट्रगान की क्या आवश्यकता है? सिनेमा हॉल, जहां सभी तरह की हिंसक और भडक़ीली फिल्में दिखाई जाती हैं, ऐसे पवित्र गान के लिए उपयुक्त जगह नहीं हो सकता. क्या हिंसक या औरतों को उपभोक्ता वस्तु मानने वाली फिल्म देखने से पहले राष्ट्रगान गाने से हमारे अपराध धुल जाएंगे? 

हर बार फिल्म देखने से पहले या और कहीं मनोरंजन से पहले राष्ट्रगान गाने का आदेश हमें बाध्य कर रहा है कि हम अपनी देशभक्ति को और दृढ़ करें. एक भयानक मूवी देखने और राष्ट्र के प्रति निष्ठा के बीच क्या संबंध है? एक ऐसी फिल्म, जिसमें न्यायसंगत जीवन की सभी धारणाएं बिखरती नजर आती हैं. यहां राष्ट्रगान का क्या तुक है?

फिल्म देशभक्ति के ख़िलाफ़ हो तो?

अगर कोई फिल्म देशभक्ति के खिलाफ हो तो? और हो भी सकती है अगर वह रवीन्द्रनाथ टैगोर की ऑब्जेक्टिव बायोपिक हो तो. जाहिर है, ऐसी मूवी में टैगोर के विचार होंगे, जो राष्ट्रवाद और राष्ट्र की सीमाओं के खिलाफ थे. जन गण मन के इसी रचयिता ने लिखा है, ‘भारत में कभी सही मायने में देशभक्ति की भावना नहीं रही. बचपन से ही मुझे सिखाया गया था कि देश का सम्मान करना ईश्वर की पूजा और मानवता का आदर करने से ज्यादा जरूरी है. मैंने अब उस सबक को छोड़ दिया है और मेरा मानना है कि मेरे देशवासी अपने भारत को सही मायने में तभी आगे ला पाएंगे, जब वे अपने शिक्षकों की उस शिक्षा का विरोध करेंगे कि देश मानवता के आदर्शों से ज्यादा बड़ा है.’

दक्षिणपंथ से प्रभावित फ़ैसला?

देश में 2014 से ही चरम दक्षिणपंथी विचारधारा का प्रभाव है और यह फैसला उससे प्रभावित है. इस विचारधारा का विश्वास है कि देश और राष्ट्र का निर्माण उस सख्त नैतिक आचरण से होता है, जहां देश में बुरे लोग, विद्रोही, कैदी, राज्य द्वारा घोषित अपराधियों के लिए देश में कोई जगह या प्रवेश नहीं है. थिएटर जैसी जगहों का इस्तेमाल राष्ट्र विरोधी लोगों को चिह्नित करने के लिए भी किया जाता है, जब वे राष्ट्रगान के दौरान बैठे रहते हैं.

जो नहीं खड़े होते

पिछले दो महीनों से अमरीका में नेशनल फुटबाल लीग के प्रमुख अश्वेत खिलाड़ी राष्ट्रगान के दौरान घुटने के बल बैठ रहे हैं. वे इस तरह देश में अश्वेतों के प्रति बुरे बर्ताव का विरोध जता रहे हैं. उनका यह व्यवहार ओबामा को गलत नहीं लगा, बल्कि उन्होंने इसका समर्थन किया. कुछ इसी तरह का रवैया आधुनिक आत्मविश्वासी राष्ट्रों का होना चाहिए. वे विद्रोहियों और गैरों को राष्ट्रीयता और न्याय पर सवाल करने की छूट दें. 

पिछले साल अमीषा पटेल जब पीवीआर थिएटर में जन गण मन के लिए खड़ी नहीं हुईं, तो उन्हें पकड़ लिया गया. उन्होंने कहा कि उन्हें कुछ समस्या थी. लेकिन उनकी जमकर खंचाई की गई. अब इस तरह की उत्पीड़न की घटनाएं ज्यादातर अल्पसंख्यकों पर बढ़ेंगी. सर्वोच्च न्यायालय के आदेश ने तो बस इसके रास्ते खोल दिए हैं. 

बैठे रहने पर सज़ा नहीं

राष्ट्रगान वहां होना चाहिए, जहां राष्ट्रीयता की भावना का संचार करना मुख्य उद्देश्य है या उसका कोई तुक है. मसलन ओलिंपिक जैसे अंतरराष्ट्रीय खेल देशभक्ति की भावना जगाने की सही जगह है, जहां सभी देश एक दूसरे के प्रतिस्पर्धी होते हैं और सबको अपने-अपने राष्ट्र की श्रेष्ठता सिद्ध करनी होती है. सिनेमा हॉल में ऐसा कुछ भी खतरे में नहीं है. 

थिएटर में राष्ट्रगान का होना टेलीविजन के पूर्व के दिनों की बात है, जब सरकारी प्रचार या उनकी लघु फिल्मों (खबरों की) को कानूनन पुष्ट होना होता था. द प्रीवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर्स एक्ट 1971 में राष्ट्रगान के दौरान बैठे रहने वाले को सज़ा देने का विधान नहीं है. अगर कोई किसी को गाने नहीं देता है या ‘किसी असेंबली में राष्ट्रगान के दौरान रुकावट डालता है, तो उसे तीन साल तक की कैद हो सकती है.’

खड़ा होना क्यों ज़रूरी?

गृह मंत्रालय के नियमों के मुताबिक नागरिकों को राष्ट्रगान के दौरान सीधा खड़ा होना चाहिए. नियमों में यह भी है कि राष्ट्रगान को बेवजह बजाने को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए. सिनेमा में राष्ट्रगान उन अवसरों या जगहों में शामिल नहीं है, जिनका उल्लेख मंत्रालय के निर्देशों में किया गया है. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने इसे बदल दिया है. एक लिहाज से देेखा जाय तो सिनेमा में राषट्रगान गृहमंत्रालय के उसी नियम को पुष्ट करता है. यहां राष्ट्रगान बेवजह है जिसे बढ़ावा नहीं देना चाहिए.

फिल्में देश की ओर से स्पॉन्सर्ड प्रोग्राम नहीं हैं. राष्ट्रगान केवल इसलिए कि सलमान को किसी ठग की पिटाई करते देखने से पहले हमें राष्ट्रीय मूल्यों को ध्यान में रखना चाहिए, बेतुकी बात है. दरअसल कई फिल्मों में खलनायक फिल्म का आकर्षण होते हैं और उन बॉलीवुड खलनायकों की हीरो से ज्यादा चर्चा होती है. खलनायकी, हिंसा और दोहरे अर्थ वाले संवादों को गले लगाना ही है, तो इससे पहले राष्ट्रगान गाना क्यों आवश्यक होना चाहिए?

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के निजी है. संस्थान का इनसे सहमत होना जरूरी नहीं है)

First published: 1 December 2016, 8:10 IST
 
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