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स्मार्ट सिटी का लोकतंत्र : इस शोशेबाजी में गरीबों-विकलांगों के लिए कितनी जगह है?

टॉम थॉमस | Updated on: 26 November 2015, 20:50 IST
QUICK PILL
  • स्मार्ट सिटी परियोजना में शहरी गरीबों, कामगारों, बच्चों, लड़कियों और लैंगिक अल्पसंख्यकों की राय नहीं ली जा रही है.
  • जिन कंपनियों को स्मार्ट सिटी की योजना का सुझाव देने के लिए चुना गया है उनके पास अनुभव की कमी है. मौजूदा प्रारूप में स्मार्ट सिटी में लोकतंत्र पूंजीवाद का पिछलग्गू बनकर रह जाएगा.

भारतीय मध्यम वर्ग स्मार्ट सिटी को लेकर बहुत उत्साहित है. लेकिन ये स्मार्ट शहर कितने स्मार्ट होंगे?

सरकार ने 48 कंसल्टिंग कंपनियों को भारत के 100 शहरों को स्मार्ट बनाने का प्रस्ताव तैयार करने के लिए चुना है. अब तक इस परियोजना के बारे में जितनी भी जानकारी सामने आयी है उसे देखते हुए इसके भविष्य को लेकर चिंताएं जताई जाने लगी हैं.

क्या ये स्मार्ट सिटी भारतीय संविधान की मूल भावना के अनुरूप होंगे. जो संकेत मिल रहे हैं उससे तो स्थिति इसके उलट लग रही है. सबसे पहले संविधान में दिए गए समानता और गैर-भेदभाव जैसे बुुनियादी अधिकारों की बात करते हैं.

दिल्ली और चेन्नई जैसे जो शहर स्मार्ट सिटी बनने की दौड़ में सबसे आगे खड़े हैं. उनमें शहरी ग़रीबों की इस बारे में राय लेने की किसी को सुध नहीं है. इन शहरों में इसका अपवाद वो जगहें ही होंगी जहां कोई एनजीओ बड़े पैमाने पर सक्रिय है.

साल 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की शहरी आबादी 37 करोड़ 71 लाख है. तेंदुलकर आयोग के अनुमान के अनुसार साल 2011-12 में शहरी ग़रीबों की संख्या पांच करोड़ 28 लाख थी. क्या ये लोग स्मार्ट सिटी से बाहर रहेंगे? फिलहाल तो ऐसा ही लग रहा है.

जो इंटरनेट पर नहीं उनका क्या?

चेन्नई में नगर निगम ने इंटरनेट पर स्मार्ट सिटी से जुड़े सुझाव मांगे हैं. साफ है कि ये सुविधा उन लोगों के लिए है जो इंटरनेट पर मौजूद हैं. नगर निगम ने इस बात को नजरअंदाज कर दिया कि बहुत से शहरी गरीबों की अभी तक इंटरनेट तक पहुंच ही नहीं है.

इससे आहत चेन्नई के शहरी ग़रीब, लैंगिक अल्पसंख्यक और बच्चों ने प्रैक्सिस नामक एनजीओ की एक बैठक में अपनी चिंताएं और इच्छाएं सामने रखीं. इन लोगों का संदेश साफ़ था, "हम शहर निर्मित करते हैं. हमें समानता और ग़ैर-भेदभाव के बुनियादी अधिकार चाहिए जिससे स्मार्ट सिटी में सभी के लिए सम्मानित जीवन का माहौल तैयार हो सके." 

चेन्नई नगर प्रशासन ने आश्वासन दिया था कि एक टीवी चैनल सम्मेलन को कवर करेगा और प्रशासन शहरी ग़रीबों से बातचीत भी करेगा. एक महीने बाद भी लोगों को इइश बातचीत का इंतजार है.

इस रवैये से सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर सवाल खड़े होते हैं. शहरी गरीबों को शामिल करने को लेकर स्थानीय प्रशासन एवं कंसल्टिंग कंपनियों की क्षमता और नेतृत्व पर प्रश्न खड़े हो रहे हैं.

स्मार्ट सिटी की योजना बनाने वालों में क्राइसिल और महिंद्रा जैसी कंपनियां भी शामिल हैं. क्या ऐसी कंपनियां इसमें सक्षम हैं?

ज्यादातर शहरों में गरीब झुग्गियों में रहते हैं. अपना अस्तित्व बचाने के लिए वो किसी न किसी राजनीतिक पार्टी के साथ जुड़े रहते हैं. ये राजनीतिक पार्टियां इन झुग्गियों के कुछ प्रभावशाली स्थानीय नेताओं को अपनी छत्रछाया में रखती हैं. बदले में ये लोग चुनाव के समय नेताओं को वोट डलवाते हैं.

अगर सरकार और प्रशासन ने इन शहरी गरीबों से संवाद किया भी होगा तो बहुत संभावना है कि इन्हीं स्थानीय नेताओं से बातचीत हुई होगी. ग़रीबों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए जिसने भी काम किया होगा उसे पता होगा कि ये एक जटिल प्रक्रिया है. इन लोगों की राय जेंडर, उम्र, योग्यता यहां तक कि लैंगिक झुकावों के अनुसार अलग-अलग होती है.

जनता की भागीदारी में  सबसे बड़ी बाधा ये होती है कि अक्सर उसी व्यक्ति की बात सुनी जाती है जो सबसे ज्यादा जोर देकर या चिल्लाकर अपनी बात कहता है. कमजोर या दबेकुचलों की आवाज तभी सामने आती है जब उन्हें अपनी बात रखने का विशेष मौका दिया जाए. ऐसे लोगों की बात सुनकर ही हम ऐसे शहर बना पाएंगे जो बच्चों, लड़कियों और विकलांगों, गरीबों के नजरिये से भी मुफीद होंगे. नहीं तो हमारे शहर केवल खाए-पीए सुविधासंपन्न लोगों के रहने लायक होकर रह जाएंगे.

बच्चों की राय


बच्चों के संग हमारी बातचीत में लड़कियों के एक समूह ने कहा कि वो चाहेंगी कि किसी भारी यातायात वाली सड़क पर सबवे की बजाय फुट ओवरब्रिज बनाया जाए. उनमें से बहुतों ने प्रशासन के सौंदर्य-बोध पर भी सवाल खड़ा किया. उनके सवालों से हम हैरान हो गए.

लड़कों को भी फुट ओवरब्रिज ही पसंद था. लड़के और लड़कियों का कहना था कि फुट ओवरब्रिज सबकी नजर में होता है और उसपर वो सुरक्षित भी महसूस करते हैं.

इसी तरह कई लड़कियों का कहना था कि शहरों में उनके लिए खेल के विशेष मैदान होने चाहिए क्योंकि खेल के आम मैदानों पर लड़कों का कब्जा सा रहता है. अगर ऐसा नहीं हुआ तो लड़कियां घर की चारदीवारी तक महदूद रह जाएंगी.

क्या स्मार्ट सिटी बनाने वालों को ऐसी जरूरी सलाहें नहीं सुननी चाहिए? क्या इन लोगों, खासकर गरीबों और वंचितों की राय सुने बिना कोई शहर स्मार्ट बन सकता है? जो लोग इन स्मार्ट सिटी की योजना तैयार कर रहे हैं क्या वो इन आवाजों को सुनने में सक्षम हैं?

स्मार्ट सिटी की योजना बनाने में शामिल कंसल्टेंसी कंपनियों की लिस्ट देखकर तो ऐसा लगता है कि उनकी विशेषज्ञता दूसरे ही क्षेत्रों में है

भारतीय कंपनियां क्राइसिल और महिंद्रा का ही उदाहरण लें तो उनकी ख्याति कारोबार की रेटिंग करने और इंजीनियरिंग क्षेत्र में है. स्मार्ट सिटी डिज़ाइन में अनुभव की बात छोड़ भी दें तो किसी संवाद में गरीबों की भागीदारी का शायद ही उनके पास कोई अनुभव हो.

जिस तरह क्राइसिल और महिंद्रा जैसी देसी और ऐसी ही कुछ विदेशी कंपनियां इस परियोजना का नेतृत्व कर रही हैं उससे साफ है कि उनकी प्राथमिकता सूची में सबकी भागीदारी नहीं है. उनका मकसद 'स्मार्ट सिटी' के नाम पर कुछ आयातित विचारों को भारत में थोपना प्रतीत होता है. जिसमें सूचना और प्रसारण प्रौद्योगिकी का दबदबा होगा. जिससे एक बार फिर शहरी गरीब समानता और गैर-भेदभाव के अधिकार से वंचित हो जाएंगे.

स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की दूसरी सबसे बड़ी संवैधानिक दिक्कत संविधान के 74वें संशोधन की अनदेखी है. क्या स्मार्ट सिटी में सुविधा के नाम पर इस संशोधन को नजरअंदाज कर दिया जाएगा?

संभावना है कि स्मार्ट सिटी का प्रशासन एक सीईओ के हाथ में होगा. यानी भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारियों के वर्ग में ऐसे पद को पाने के लिए नई होड़ शुरू हो जाएगी. क्या स्मार्ट सिटी निजी टाउनशिप का ही एक लोकलुभावन नाम है जिसका प्रमुख कोई आईएएस या कोई कॉरपोरेट सीईओ होगा?

निजीकरण की राह पर?

केंद्र सरकार ने इनके लिए जितनी कम धनराशि आवंटित की है उसे देखते हुए लग रहा है कि स्मार्ट सिटी निजीकरण के रास्ते पर बढ़ने वाले हैं और इसके साथ ही इससे जुड़ी बुराइयां भी सामने आएंगी.

हमारे सामने गुड़गांव जैसी विफलता के उदाहरण पहले से हैं. गुड़गांव मेें कुछ लोगों को तो मुनाफा हुआ लेकिन उसके बाद सभी नागरिक सुविधाओं का बोझ करदाताओं के सिर पर डाल दिया गया. इसमें कोई शक नहीं है कि देश का अमीर और सत्ताधारी तबका यही चाहता है लेकिन शहरी गरीबों और कामगार तबके की इसमें कोई भलाई नहीं है.

संविधान के 74वें संशोधन के अनुसार शासन पर अंतिम अधिकार जनता का है जिसे वो अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से क्रियान्वित करती है. सीईओ मॉडल वाले शहरों में जनता के इस अधिकार का क्या होगा? तर्क देने के लिए कहा जा सकता है इसके दूसरे अपवाद भी हैं लेकिन क्या किसी लोकतंत्र में जनता की प्रभुता को छीन लेना पूरी तरह असंवैधानिक नहीं है.

अनुभव बताते हैं कि प्रशासन के बुरे विकेंद्रीकरण का उपचार उसका फिर केंद्रीकरण करना नहीं है, बल्कि उसका बेहतर विकेंद्रीकरण है

संभावना है कि पूंजीवादी मॉडल पर तैयार 100 स्मार्ट सिटी लोकतंत्र को अपना पिछलग्गू बना लें. इसका हर स्तर पर विरोध होना चाहिए. जिसकी शुरुआत इनकी योजना बनाने में हस्तक्षेप से हो सकती है ताकि इसमें सभी नागरिकों की वाजिब आवाज सुनी जाए.

समावेशी स्मार्ट सिटी जिसमें सभी के लिए जगह हो, बनाने के लिए हमें इसको लेकर चल रहे संवाद को ज्यादा व्यापक और जमीनी बनाने की जरूरत है. जिसमें सभी तरह के समूह, नागरिक संगठन और अकादमिक क्षेत्र शामिल हो. इसमें विभिन्न प्रशासनिक अधिकारियों और राजनीतिक दलों की भी राय होनी चाहिए.

ऐसा नहीं होगा तो ये शहर कुछ लोगों के लिए होंगे, सभी के लिए नहीं.

First published: 26 November 2015, 20:50 IST
 
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