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सैनिक स्कूल बढ़ाने से पूरी होगी सैनिकों की कमी?

पिनाकी भट्टाचार्य | Updated on: 27 April 2016, 22:55 IST

भारत की मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने सैनिक स्कूलों की संख्या बढ़ाने की बात कही है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) लंबे समय से हिंदुओं के लिए ऐसी शिक्षा की जरूरत बताता रहा है.

संभव है स्मृति ईरानी को भी लगता हो कि इससे 'हिंदू' युवाओं में सेना की नौकरी के लिए आकर्षण पैदा किया जा सकेगा. 

जर्मनी में हिटलर ने 1930 के दशक में 'हिटलर यूथ जर्मनी' नामक युवाओं का संगठन बनाया था. इन नौजवानों को जर्मन सैनिको से भी ज्यादा खूंखार माना जाता था. ये नौजवान सीधे नाजी खुफिया सेवा शुत्सश्टाफेल (एसएस) के सदस्य बना दिए जाते थे.

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हालांकि भारतीय सेना के कुछ पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों को ईरानी का विचार उचित नहीं जान पड़ता.

रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल प्रकाश कटोच कहते हैं कि युवाओं में अनुशासन और परिश्रम का भाव जगाना जरूरी है लेकिन इसके लिए नेशनल कैडेट कॉर्प्स (एनसीसी) काफी है.

सैनिक स्कूलों के सभी बच्चों सेना में नौकरी करने नहीं जाते: पूर्व सैन्य अधिकारी

भारतीय सेना के पूर्व उप-प्रमुख रिटायर्ड लेफ्टिनेट जनरल फिलिप कम्पोज गुजरात के जामनगर स्थित सैनिक स्कूल मे काम कर चुके है.

फिलिप बताते हैं, "स्कूल में स्थानीय कारोबारियों के काफी बच्चे पढ़ते थे. वो पढ़ाई के बाद अपने पारिवारिक कारोबार में चले जाते थे. यानी इन स्कूलों के सभी लड़के सेना में नहीं जाते."

दोनों पूर्व सैन्य अधिकारियों ने ये भी स्पष्ट किया सैनिक स्कूल सभी धर्मों और जातियों के लिए होते हैं. इसिलए इन्हें 'हिंदू' युवक-युवतियों को लड़ाकू बनाने की योजना मानना गलत होगा.

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दोनों पूर्व सैन्य अधिकारियों ने बताया कि इस समय में भारतीय सेना में 6-8 हज़ार अफ़सरों की कमी है.

चूंकि सैनिक स्कूलों के सभी बच्चे सेना में नहीं जाते इसलिए सैनिक स्कूलों की संख्या से जरूरी नहीं कि अफसरों की कमी पूरी की जा सकेगी.

सरकार चाहती है कि सेना में टेक-सेवी मॉर्डन नौजवान आएं. कटोच कहते हैं, "डिजिटाइजेशन बढ़ने के साथ ही सेनाओं को टेक-सेवी नौजवानों की ज्यादा जरूरत पड़ेगी."

First published: 27 April 2016, 22:55 IST
 
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