Home » इंडिया » Soli Sorabjee: Regarding National anthem Supreme court verdict is not good
 

सोली सोराबजी: राष्ट्रगान पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश संविधान परक नहीं

कैच ब्यूरो | Updated on: 11 February 2017, 5:44 IST
(पीटीआई)

सुप्रीम कोर्ट द्वारा सिनेमाघरों में फिल्मों के प्रदर्शन से पहले राष्ट्रगान की धुन बजाना की अनिवार्यता के निर्णय पर कानूनी विशेषज्ञों की अलग-अलग प्रतिक्रिया आ रही है.

संविधान के कुछ विशेषज्ञों ने इसे न्यायपालिका का अतिउत्साह बताया है, तो कुछ का कहना है कि राष्ट्रगान की धुन बजाने और इसे सम्मान देने से कोई नुकसान नहीं होगा.

इस मामले में पूर्व अटॉर्नी जनरल और सुप्रसिद्ध वकील सोली सोराबजी ने कहा कि अदालतें लोगों को खड़े होने और कुछ करने का आदेश नहीं दे सकतीं.

सोली सोराबजी के अलावा सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता केटीएस तुलसी का कहना है कि न्यायपालिका को उन क्षेत्रों में नहीं जाना चाहिए जो उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आते.

वहीं, बीजेपी से नई दिल्ली लोकसभा सांसद मीनाक्षी लेखी ने कहा कि राष्ट्रगान को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर उन्हें या उनकी पार्टी को कोई आपत्ति नहीं है. सांसद लेखी ने कहा कि राष्ट्रगान को सम्मान देने से कोई नुकसान नहीं होगा.

उन्होंने कहा कि स्कूलों, सार्वजनिक समारोहों जैसे कई स्थानों पर राष्ट्रगान गाया जाता है. अन्य जगहों पर यह धुन बजाने में भला क्या नुकसान है. राष्ट्रगान की धुन बजते समय खड़े हो जाना स्वाभाविक है.

तुलसी और वरिष्ठ अधिवक्ता के के वेणुगोपाल का मानना है कि यह आदेश केवल कानून व्यवस्था की समस्या खड़ी करेगा, क्योंकि थिएटर मालिकों के लिए लोगों को, खास कर बच्चों को, बूढ़े दर्शकों को और दिव्यांगों को खड़ा करना मुश्किल होगा.

सोराबजी ने न्यायपालिका के आदेश को उसका अतिउत्साह बताते हुए कहा कि वह कार्यपालक सरकार को कानून में संशोधन का सुझाव दे सकते हैं, लेकिन वह खड़े होने, यह करने और वह करने का आदेश नहीं दे सकते.

लेखी ने कहा कि राष्ट्रगान को लेकर कानून बिल्कुल स्पष्ट है क्योंकि राष्ट्रीय गौरव के अपमान की रोकथाम कानून में पहले ही इस बारे में जिक्र किया गया है. उन्होंने कहा कि अदालत ने तो केवल इसे पढ़ा है. उन्होंने कहा कि देश में रह रहे लोगों को देश के कानून का पालन करना चाहिए.

इस बीच तुलसी ने न्यायपालिका को याद दिलाया कि उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी न्यायिक निर्णय है. अदालत को अपने अधिकार क्षेत्र के बारे में सोचना चाहिए.

न्यायिक निर्णय आने में दशकों का समय लग रहा है और हम उन क्षेत्रों में जा रहे हैं जो हमारे हैं ही नहीं. तुलसी ने कहा कि मैं फैसले से सहमत नहीं हूं. लोगों का आचरण कैसा होना चाहिए, यह तय करना अदालतों का काम नहीं है.

इससे यह सुनिश्चित करने में बहुत समस्या होगी कि राष्ट्रगान का अनादर न हो. इसके साथ ही तुलसी ने कहा कि जब कोई व्यक्ति या दिव्यांग व्यक्ति खड़ा नहीं होगा, तब शायद कुछ लोग अति उत्साही प्रतिक्रिया देंगे और शायद झगड़ा भी करेंगे.

First published: 4 December 2016, 4:29 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी