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मोदी सरकार पर मुसलमानों के लिए काम न करने का दबावः अमिताभ कुंडू

सौम्या शंकर | Updated on: 9 January 2016, 15:00 IST
QUICK PILL
  • 2011 की जनगणना के आंकड़ों से एक बार फिर इस बात का पता चलता है कि भारत में मुसलमानों की स्थिति खराब हुई है. आंकड़ों के मुताबिक कामगारों में मुसलमानों की हिस्सेदारी सबसे कम है.
  • सरकार के भीतर और बाहर कुछ ऐसे दबाव समूह हैं और एनडीए सरकार के साथ कुछ ऐसे सामाजिक संगठन जुड़े हुए हैं जिसकी वजह से सरकार सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लागू करने में झिझक रही है.

2011 की जनगणना के आंकड़ों से फिर इस बात का पता चलता है कि भारत में मुसलमानों की स्थिति खराब है. आंकड़ों के मुताबिक कामगारों में मुसलमानों की हिस्सेदारी सबसे कम है. भारत में सभी धार्मिक समुदायों के कामगारों में सबसे कम औसत मुसलमानों का है. यह केवल 33 फीसदी है. जबकि राष्ट्रीय औसत 40 फीसदी है. 

हालांकि, सच्चर कमेटी के बाद बनाई गई कुंडू समिति के अध्यक्ष प्रोफेसर अमिताभ कुंडू कहते हैं यह पिछड़ेपन का सूचक हो़, यह जरूरी नहीं हो सकता. कुंडू समिति 2013 में बनाई गई, जिसने सितंबर 2014 में रिपोर्ट सौंपी.

कैच के साथ बातचीत में कुंडू ने दोनों रिपोर्टों की सिफारिशों को लागू करने में सरकार की विफलता को लेकर निराशा जाहिर की. उन्होंने विपक्ष को जिम्मेदार बताते हुए कहा कि इस मोर्चे पर वह सरकार पर दबाव डालने में नाकाम रहा है. 

उन्हें लगता है कि राजग सरकार के भीतर और बाहर के कुछ समूहों के दबाव में वह सच्चर समिति और कुंडू समिति की सिफारिशों को लागू करने में झिझक रही है. जाहिर है उनका इशारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के भीतर मुस्लिम विरोधी तत्वों की ओर है.

कैच ने इस मसले को लेकर उनसे विस्तार से बातचीत की:

2011 जनगणना रिपोर्ट बताती है कि कामगारों के बीच मुसलमानों की संख्या बहुत कम है. इसके पीछे क्या कारण है?

ऐसी रिपोर्टिंग के जरिये आसानी से गुमराह किया जा सकता है. व्यापक लैंगिक अध्ययन किए बिना हम धार्मिक समूहों के साथ मुस्लिम कामगारों की भागीदारी दर की तुलना का कोई सार्थक निष्कर्ष नहीं निकाल सकते हैं. 

कामगारों के बीच हिंदू महिला कर्मचारियों की 23 फीसदी संख्या की तुलना में मुस्लिम महिलाओं की संख्या 15 फीसदी है.

हां, अगर आप महिलाओं और पुरुषों को मिला देते हैं तो कामगारों में मुसलमानों की भागीदारी की दर काफी नीचे होगी. इसके आधार पर कोई भी रणनीति बनाना गलत हो सकता है. हम इन दो दरों को एक साथ न जोड़ें और ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में इनके अंतर की जांच करें. 

ग्रामीण क्षेत्रों के मुसलमानों में कामगार भागीदारी दर अनुसूचित जाति-जनजाति की जनसंख्या की तुलना में कम देखने को मिलती है क्योंकि भारी तादाद में मुसलमान खेती से दूर हैं. गैर कृषि गतिविधियों में धार्मिक आधार पर कामगारों की स्थिति का पता नहीं चलता.

खेती किसानी वाले घरों में रोजाना खेतों पर 2-3 घंटे के लिए काम करने वाले को भी कामगारों में शामिल कर लिया जाता है. इसका मतलब कि जो काम तीन लोगों द्वारा किया जा सकता है उसे पांच लोग करते हैं. लेकिन खेती के अलावा अन्य क्षेत्रों में ऐसा बहुत कम होता है. 

आदर्श रूप में, समुदायों के साथ लेबर मार्केट की गतिशीलता को समझने के लिए विभिन्न आयुवर्गों में कामगार भागीदारी दर में अंतर पर विचार करना चाहिए.

विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच कामगार भागीदारी का आकलन करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?

अनुसूचित जाति-जनजाति या ग्रामीण क्षेत्रों में किसी भी अन्य समुदाय की अधिक कामगार दर उनके आर्थिक विकास या सशक्तिकरण का सूचक नहीं है. उदाहरण के लिए, यदि किसी समुदाय में 15 वर्ष की आयु से नीचे के लोगों की कामगार भागीदारी दर ज्यादा है तो इस पर उस समुदाय को गर्व नहीं करना चाहिए. बच्चों को स्कूलों में होना चाहिए न कि काम करना चाहिए.

हालांकि, अगर वयस्क कामगार भागीदारी दर को देखें तो 15 साल से ज्यादा आयुवर्ग के लोगों में ग्रामीण क्षेत्रों में हिंदुओं की तुलना में मुसलमानों की संख्या ज्यादा है. इसकी वजह यह है कि मुसलमानों में कॉलेज जाने वालों की संख्या कम होती है. 

शहरी इलाकों की बात करें तो 15-55 आयुवर्ग में एससी-एसटी लोगों की तुलना में मुसलमानों की कामगार दर ज्यादा है. वहीं, शहरी मुस्लिम वयस्कों में सवर्ण हिंदुओं और अन्य समुदायों की तुलना में ज्यादा कामगार भागीदारी दर है.

उच्च कामगार भागीदारी और कम आर्थिक भलाई के बीच इन विषम संबंधों को बढ़ावा देने वाले कारक कौन से हैं?

एक समुदाय का कामगार भागीदारी में उच्च स्तर होने का केवल यह मतलब नहीं है कि वह आर्थिक रूप से भी समृद्ध हो. अनुभव के हिसाब से गरीब समुदायों में कामगार भागीदारी दर ज्यादा है.

बेरोजगारी एक लग्जरी है जिसका वहन केवल अमीर ही कर सकते हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में अनुसूचित जनजाति के लोगों की गरीबी की वजह से उनकी जनसंख्या का कामगारों में सर्वाधिक प्रतिशत होता है. 

उच्च कामगार भागीदारी दर का मतलब यह भी हो सकता है कि बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं, वयस्क कॉलेज नहीं जा रहे जबकि बड़ों को श्रम बाजार में काम करने के लिए मजबूर किया जाता है ताकि वे अपने परिवार का पोषण कर सकें. सच्चर मूल्यांकन समिति के बाद वाली रिपोर्ट यह साफ करती है कि ऊपर बताए गए कारकों के चलते मुसलमानों में कामगारों की संख्या काफी ज्यादा है.

एससी-एसटी के साथ ही मुसलमानों में बेरोजगारी लग्जरी की बात है. नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक जनसंख्या के अमीर और शिक्षित वर्ग में बेरोजगारी हमेशा ज्यादा देखी जाती है. गरीब और अशिक्षित लोग बेरोजगारी का बोझ नहीं सह सकते. 

मुझे दोनों पक्षों पर तर्कसंगत सोच का अभाव नजर आता है. हिंदू नेताओं द्वारा अक्सर यह गलतबयानी की जाती है कि मुसलमानों की उच्च प्रजनन दर है और यह ध्यान नहीं देते कि इनमें समय के साथ अभिसरण की धीमी प्रक्रिया होती है. 

दूसरी ओर मुसलमान नेता कामगार भागीदारी में कमी के आधार पर भेदभाव का आरोप लगाते रहते हैं. यहां पर रोजगार की गुणवत्ता भी देखना बहुत महत्वपूर्ण है. शीर्ष स्तर की नौकरियों में मुस्लिमों की हिस्सेदारी नाममात्र की है. सच्चर और इसके बाद की समिति द्वारा दी गई रिपोर्ट में इस पर सबसे ज्यादा चिंता जताई गई है.

सरकार के सामने यह चुनौती नहीं है कि वो मुसलमानों के लिए रोजगार के अवसरों में बढोतरी करे. बल्कि सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वो निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में मुसलमानों के साथ किसी भी तरह का भेदभाव न हो, यह सुनिश्चित करेे.

जमीनी सच्चाई का क्या मतलब है ?


कामगारों के ज्यादा बड़े योगदान को आर्थिक सशक्तिकरण से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता है. यह आर्थिक कठिनाईयों का पैमाना जरूर हो सकता है.

यहां तक की बच्चों को मजदूरी करने के लिए भेजा जा रहा है और परिवार के सभी सदस्यों को कोई भी नौकरी करनी पड़ती है क्योंकि उनके पास आखिरी विकल्प यही होता है.

बहुत से मुस्लिम युवक और युवतियां अच्छी शिक्षा के बावजूद बेरोजगार हैं. परिवार के दबाव में वह अच्छी नौकरी के लिए ज्यादा समय तक इंतजार नहीं कर सकते हैं.

अंततः उन्हें जो भी काम मिलता है उसे करते हैं. और हां, मुस्लिम महिला कामगारों का काम के क्षेत्र में योगदान इसलिए कम है क्योंकि उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताएं उन्हें इस बात के लिए रोकती हैं.

लेकिन अब समय के साथ स्थिति बदल रही है. इस मामले में मुस्लिम सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि राज्य के द्वारा मुस्लिम समुदाय की लगातार अनदेखी से भी श्रम के क्षेत्र में कामगारों की भागीदारी कम हुई है.

अन्य समुदायों की तुलना में मुस्लिमों में असुरक्षा की भावना ने उन्हें एक वंचित समुदाय बना दिया है. यह सही नहीं है लेकिन कहने के लिए तो सभी कहते हैं कि हम इसलिए परेशान हैं क्योंकि कामगारों में हमारी संख्या काफी कम है और बाजार में हमारे साथ पक्षपात किया जाता है.

मैं यह नहीं कह रहा हूं की पक्षपात नहीं है. इस बात के सबूत भी हैं कि लेबर और हाउसिंग मार्केट में पक्षपात होता है. लेकिन इस तरह के नतीजों पर कोई आंकड़ा नहीं दिया जा सकता.

तो आपके मुताबिक पक्षपात को तय करने के सही पैमाना क्या हैं ?


 
सरकारी नौकरी और शैक्षिक संस्थाओं में मुस्लिमों की कम भागीदारी से यह आंकड़े प्रदर्शित होते हैं और ये ही चिंता के मुख्य बिंदू हैं.

यह सही है कि मुस्लिमों की बड़ी जनसंख्या खुद के बिजनेस से जुड़ी हुई है लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं की सरकारी और गैरसरकारी क्षेत्रों में उनके लिए कोई प्रतिबंध है.

दूसरे बच्चों के मुकाबले मुस्लिम स्कूली बच्चों की संख्या में गिरावट क्यों नजर आ रही है ?


 
यह एक अलग मुद्दा है. यदि सामान्य जनसंख्या के 95 फिसदी बच्चे जो 6 से 9 साल के स्कूल जा रहे हैं, उनमें मुस्लिम बच्चों में केवल 2 फीसदी की गिरावट देखी गई है.

असली समस्या तो गरीबी और आर्थिक परेशानियों से जुझते मुस्लिमों में स्कूल छोड़ने की बढ़ी हुई दर का है. मुस्लिम लड़कों के मुकाबले लड़कियों में स्कूल छोड़ने के अलग कारण हैं.    
 
लेकिन एक अच्छी बात है जिसे मैंने बाद में नोटिस किया. शहरी मुस्लिम महिलाओं की नौकरियों में भागीदारी बढ़ी है और वो समय के साथ शिक्षा और नौकरी पाने के लिए पारिवारिक बंदिशों और परंपराओं को तोड़ भी रही हैं.

लेकिन नौकरी के क्षेत्र में कम मौकों की वजह से उनमें बेरोजगारी की दर ज्यादा है. यह सच है कि मुस्लिमों में पारंपरिक बंदिशों और सामाजिक समस्याओं की वजहों से उन्हें उस तरह से सरकारी शैक्षिक सहायता नहीं मिल पाती. जैसा की उन्हें मिलनी चाहिए.

लेकिन चिकित्सा के क्षेत्र में मिलने वाली सहायता के मामले में ऐसा नहीं है. हमने पाया कि मुस्लिम क्षेत्रों में सरकारी चिकित्सा मुश्किल से पहुंच पा रही है लेकिन फिर भी मुस्लिम समुदाय अन्य की तुलना में इसका अच्छी तरह से लाभ उठा रहे हैं.    

गरीबी के बावजूद मुस्लिम महिलाओं में अन्य धर्मों की महिलाओं की अपेक्षा एनिमिया की शिकायत कम पायी गई है. हिंदूओं की तुलना में मुस्लिमों में नवजात बच्चियों की मृत्युदर भी काफी कम है.

राष्ट्रीय स्तर पर भी मुस्लिम महिला प्रसव मृत्युदर काफी कम है और हिंदू महिलाओं के मुकाबले मुस्लिम महिलाएं 2 से 3 साल तक ज्यादा जीवित रहती हैं.

क्या आपको वर्तमान सरकार से उम्मीद है कि वह सच्चर और कुंडू कमेटी की सिफारिशों को
लागू करेगी ?


 
 मैं राजनीतिक व्यक्ति नहीं हूं. मैंने इस मामले में वर्तमान सरकार के दोनों मंत्रियों नजमा हेप्तुल्ला और मुख्तार अब्बास नकवी से बात की है.

उन्होंने कहा है कि वे रिपोर्ट को गंभीरता से लेंगे. संसद में भी इस मामले में बयान आया है कि सच्चर कमेटी के बाद की रिपोर्ट को सक्रियता के साथ लिया जायेगा. लेकिन सरकार ये बात 4 साल से कह रही है. मैं खुद निराश हूं, लेकिन मसला ये है कि हम केवल सरकार को दोष देते हैं.

किस विपक्षी दल ने सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को गंभीरता से लिया है? क्या मीडिया ने इस मुद्दे को ईमानदारी से उठाया था? मैं नहीं सोचता कि इस रिपोर्ट को स्वीकार करने और लागू करने के लिए बड़े स्तर पर कोई कदम उठाये गये.

हमें पता है कि वर्तमान सरकार ने इसे कुछ विशेष प्राथमिकता दी है. लेकिन सरकार के भीतर और बाहर कुछ ऐसे दबाव समूह हैं और एनडीए सरकार के साथ कुछ ऐसे सामाजिक संगठन जुड़े हुए हैं जिसकी वजह से सरकार इस दिशा में काम करने में झिझक रही है.

यह बात मुझे सच में बहुत निराश करती है और मैं विपक्षी दलों के साथ-साथ मीडिया से भी खुश नहीं हूं क्योंकि वह भी इसे गंभीरता से नहीं ले रहे हैं.

सरकार ने यह वादा किया है कि सबका साथ-सबका विकास. क्या हम सरकार पर स्पष्ट रोडमैप बनाने के लिए दबाव बना रहे हैं? जैसा कि फ्रैंकलिन रूजवेल्ट ने कहा था कि यह हमारी जिम्मेदारी नहीं है कि सरकार अपने कहे हुए वादे को पूरा करे.

First published: 9 January 2016, 15:00 IST
 
सौम्या शंकर @shankarmya

A correspondent with Catch, Soumya covers politics, social issues, education, art, culture and cinema. A lamenter and celebrator of the human condition, she hopes to live long enough to witness the next big leap in human evolution or the ultimate alien takeover of the world.

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