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मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम ज़ैदी: संभव है कई छोटी पार्टियों ने काले धन को सफेद किया हो

सादिक़ नक़वी | Updated on: 21 December 2016, 9:06 IST

अब ऐसी राजनीतिक पार्टियों पर गाज गिर सकती है जो चुनाव मैदान में नहीं उतरती. खबरों की मानें तो चुनाव आयोग द्वारा रजिस्टर्ड पार्टियों के चुनाव नहीं लड़े जाने पर सवाल उठाने के बाद अब सरकार ऐसी पार्टियों पर नकेल कसने की तैयारी में है. आयोग ने कहा था जो पार्टियां चुनाव नहीं लड़ती वे चुनावों में केवल काले धन की वाहक हो सकती है.

नोटबंदी के अपने फैसले को सही ठहराने की भरसक कोशिश कर रही सरकार के सामने उस समय एक और सवाल खड़ा हो गया जब चुनाव आयोग ने कहा कि कितनी ऐसी रजिस्टर्ड राजनीतिक पार्टियां हैं, जो काले धन का संभावित वाहक हो सकती हैं क्योंकि पार्टियों को आयकर से छूट मिलती है और उन्हें इस बात की भी छूट है कि 20,000 रुपए से कम का चंदा घोषित करने की जरूरत नहीं है.

मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम जैदी ने कैच न्यूज़ को दिए एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में कहा, ‘20,000 रूपए तक का चंदा न घोषित करने की छूट के प्रावधान के चलते इन पार्टियों के चुनावों में काले धन का वाहक होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.’ उन्होंने कहा, 'हमें ऐसी रिपोर्ट मिल रही हैं, हालांकि इस बारे में फिलहाल निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता.'

चुनाव आयोग का कहना है कि पार्टियों को मिलने वाली इस छूट का दायरा कम करके 2,000 रुपए कर देना चाहिए. विधि आयोग ने कहा है कि इन पार्टियों को गुप्त दान पर मिलने वाली यह छूट साल भर में मिलने वाले 20 करोड़ रुपए का 20 फीसदी ही होना चाहिए. कई बार पार्टियां यह कहकर अपना बचाव कर लेती हैं कि उनके लिए छोटी-छोटी राशि में मिलने वाले फंड का हिसाब रखना मुश्किल होता है, जैसे कि रैलियों में मिलने वाले रुपयों का हिसाब.

देश के पांच राज्यों यूपी, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर और पंजाब में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. मुख्य चुनाव आयुक्त ने हालांकि इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दी लेकिन अनुमान है कि इस माह कभी भी यह घोषणा हो सकती है. इन पांचों राज्यों में विधानसभा चुनाव एक साथ भी करवाए जाएंगे.

20,000 रुपए से कम का सहयोग भी बताया जाए. साथ ही सालाना 20 करोड़ रुपए से अधिक का चंदा कैश में न लिया जाए

नोटबंदी के बाद राजनीतिक पार्टियों को कर से मिलने वाली छूट का मामला तूल पकड़ सकता है, क्योंकि आम आदमी बैंक और एटीएम के बाहर कतारों में खड़ा है और दूसरी ओर पार्टियों को ऐसी छूट मिल रही है; इसलिए यह बात काले धन के खिलाफ सरकार के दावे को खोखला साबित करने के लिए काफी है. जैदी ने बताया कि आयोग को राज्य चुनाव अधिकारियों से ख़बर मिली है कि 2005 से 2010 के बीच करीब 400 पार्टियों ने चुनाव नहीं लड़ा.

उन्होंने कहा, ‘हमने ऐसी पार्टियों को हमारे सक्रिय रजिस्टर से हटा दिया है लेकिन हमारे पास यह अधिकार नहीं है कि हम उनका रजिस्ट्रेशन रद्द कर दें. साथ ही उन्होंने बताया कि आयोग ने आयकर विभाग को लिखा है कि इन पार्टियों को आयकर से छूट न दी जाए.’ कुछ रिपोर्टों के आधार पर कहा जा सकता है कि सरकार इस गड़बड़ी से निजात पाना चाहती है. फिलहाल चुनाव आयोग में 1900 पार्टियां रजिस्टर्ड हैं. इनमें से कितनी सक्रिय हैं, यह पता लगाया जा रहा है.

यह पूछे जाने पर कि क्या नोटबंदी के बाद पार्टियों में पारदर्शिता बढ़ेगी? चुनाव आयुक्त ने कहा, 'उन्हें अभी यह देखना है कि नोटबंदी का चुनावों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? और यह भी कि यह कदम पूरी तरह कारगर है या नहीं.' राजनीतिक पार्टियों द्वारा फंड की पूरी जानकारी न दिए जाने से नाराज मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा, 'इन पार्टियों को फंडिंग में पारदर्शिता लाने की जरूरत है. उन्होंने कहा, पार्टियों के खर्च पर निगरानी, पार्टियों द्वारा सहयोग राशि की विस्तृत जानकारी देना आवश्यक है, जिसमें 20,000 रुपए से कम का सहयोग भी बताया जाए. साथ ही सालाना 20 करोड़ रुपए से अधिक का चंदा कैश में न लिया जाए. साथ ही पेड न्यूज को भ्रष्टाचार के दायरे में लाया जाय.

जैदी के मुताबिक चुनाव आयोग को यह अधिकार देने की जरूरत है कि अगर कहीं भी चुनावों के दौरान गड़बड़ी व धन का दुरूपयोग होने के साक्ष्य हो तो वह उस चुनाव को तुरंत रद्द कर सके.

चुनाव आयोग ने चुनाव सुधारों को लेकर विधि आयोग को 47 सिफारिशें भेजी हैं, जिस पर कानून मंत्रालय का टास्क फोर्स विचार कर रहा है. इस बीच, जैदी ने एक और इंटरव्यू में चुनावों के अन्य पहलुओं पर भी विचार-विमर्श किया.

प्रस्तुत हैं नसीम जैदी से बातचीत के कुछ अंश:

कुछ ऐसी खबरें थीं कि केंद्र सरकार और चुनाव आयोग बजट की तारीख कुछ पहले की ही रखने पर बात कर चुके हैं? इसके बारे में कुछ बताना चाहेंगे?

हमारे पास ऐसी कोई जानकारी नहीं है.

अगर सरकार चुनाव आचार संहिता लागू रहते बजट पेश करती है और उसमें कर छूट जैसे कोई प्रावधान लाती है तो क्या इसे आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन माना जाएगा?

अभी तक हमारे पास इस संबंध में कोई औपचारिक जानकारी नहीं है. और चूंकि अभी कोई आदर्श आचार संहिता लागू नहीं है, इसलिए मेरा इस बारे में टिप्पणी करना उचित नहीं होगा. हालांकि एक बार चुनावों की घोषणा हो जाने के बाद अगर आचार संहिता लागू होती है और सरकार हमें तब इस संबंध में कुछ बताती है तो हम 2009 के अपने पूर्व के अनुभवों के मद्देनजर इसकी जांच करेंगे और जरूरी हुआ तो सरकार को उचित परामर्श देंगे.

2009 में चुनाव आयोग ने एक सिफारिश जारी करके कहा था कि स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था में मौजूदा परम्परा यह है कि जिन राज्यों में चुनाव होने हैं या जहां चुनाव हो चुके हैं और आदर्श आचार संहिता लागू है, उस स्थिति में ज्यादातर राज्य सरकारें पूरा बजट पेश करने के बजाय 3-4 महीने के लिए केवल इस पर विश्वास मत हासिल कर लेती हैं.

चुनाव आयोग ऐसी स्थिति में राज्य विधानसभा के फैसले का सम्मान करते हुए कोई कार्यवाही नहीं करता. बस, इतनी सलाह अवश्य देता है कि जब चुनाव नजदीक हों तो राज्य सरकारें विश्वास मत हासिल करने का विकल्प चुनें.

राज्य विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ करवाने पर चुनाव आयोग की क्या राय है. प्रधानमंत्री मोदी की इस मामले में विशेष रुचि है. क्या सरकार ने इस पर चुनाव आयोग से कोई मशविरा किया है?

लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव एक साथ करवाने के लिए संविधान में कुछ संशोधन करने होंगे. इसके लिए राजनीतिक आम सहमति के आधार पर कुछ अनुच्छेदों में संशोधन करना होगा. चुनाव आयोग का मानना है कि अगर संविधान में यह संशोधन हो जाता है तो आयोग अतिरिक्त ईवीएम मशीनें लगवाने और ऐसी ही कुछ जरूरतों व सुविधा संबंधी मसले सुलझाएगा. हमने कानून मंत्रालय को अवगत करवा दिया है कि अगर इन कुछ समस्याओं का समाधान हो जाता है तो चुनाव आयोग संविधान के नियमानुसार कार्य करने को तैयार है.

क्या आपको लगता है नोटबंदी के तहत बड़े नोट बंद होने से राजनीतिक पार्टियां अधिक पारदर्शी होंगी? या फिर इसके लिए कानून में संशोधन करना होगा?

नोटबंदी का चुनाव आयोग और चुनावों पर क्या असर पड़ता है, अभी यह देखना बाकी है. हालांकि फंडिंग को लेकर सुधारों की जरूरत फिलहाल ज्यादा है. इसमें पारदर्शिता होनी चाहिए जैसे, पार्टियों के खर्च की एक सीमा तय कर दी जाए. एक प्रावधान यह भी होना चाहिए कि पार्टियां तय सीमा से अधिक सहयोग राशि न ले सकें जैसे सालान 20 प्रतिशत या 20 करोड़ रुपए जो भी कम हो. साथ ही राजनीतिक पार्टियों को 20,000 रुपए से कम के सारे यागदानों की जानकारी देनी होगी.

पेड न्यूज भी एक बड़ी समस्या है, आरपी एक्ट की धारा 123 के तहत इसे भ्रष्टाचार की श्रेणी में लाया जाए. चुनाव आयोग को वोटिंग में किसी तरह के धन के दुरुपयोग के साक्ष्य मिलने पर उसे रद्द करने का अधिकार मिले. मतदाताओं को पैसा बांटने या रिश्वत देने संबंधी मामले में कार्यवाही की जाए. इसके लिए आरपी एक्ट में धारा 58 का समावेश किया जाना जरूरी है.

आपने सरकार से किन चुनाव सुधारों के बारे में सिफारिश की है और सरकार ने क्या सुझाव दिए हैं?

हमने कानून मंत्रालय को चुनाव संबंधी कानून में संशोधन के लिए चुनाव सुधारों पर 47 सिफारिशें भेजी हैं. विधि आयोग ने हाल ही में सरकार को पेश अपनी 244वीं और 255वीं रिपोर्ट में इनमें से काफी सिफारिशों को सही ठहराया है. लगता है कानून मंत्रालय चुनाव आयोग और विधि आयोग की सिफारिशों पर काम कर रहा है और इस संबंध एक रूपरेखा तैयार करने के लिए टास्क फोर्स का गठन कर दिया गया है. हम इसके परिणाम का ही इंतजार कर रहे हैं और कानून मंत्रालय का ध्यान बराबर इस मुद्दे की ओर आकर्षित कर रहे हैं.

क्या आप इन प्रस्तावों पर राजनीतिक पार्टियों की राय लेंगे?

हां, आयोग समय-समय पर राजनीतिक पार्टियों से विचार-विमर्श करता रहा है. इनमें से कुछ पर इसी वर्ष मार्च माह में आयोजित बैठक में विचार किया गया था.

आपको क्या लगता है कि राजनीतिक पार्टियां इन सुधारों के प्रति उदासीन हैं? और वे स्वयं को आरटीआई केदायरे से बाहर रखना चाहती हैं?

इसका जवाब आप उनसे लें.

मतदाता सूची को लेकर हमेशा कुछ न कुछ शिकायतें रहती हैं. इस समस्या से निपटने के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं?

बिल्कुल सही मतदाता सूची बना पाना संभव ही नहीं है क्योंकि कुछ मतदाता वोट डालने ही नहीं आते, कुछ शिफ्ट हो गए या कुछ की मौत हो जाती है. हालांकि आयोग द्वारा चुनाव अधिकारियों और पर्यवेक्षकों के माध्यम से समीक्षा के दौरान इन मतदता सूचियों में वोटरों के नाम शामिल करवा कर इनमें संशोधन किया जा रहा है. इसके लिए राजनीतिक दलों, एनजीओ व आरडब्लूए की सहायता ली जा रही है. पार्टियों को मतदाता बूथ पर एजेंटों की नियुक्ति के लिए कहा जा रहा है.

आयोग ने इस संबंध में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से कई निर्देश जारी किए हैं. इनमें मतदाता सूची के प्रारूप और अंतिम मतदाता सूची पार्टियों को पहुंचाना, उन्हें चुनाव आयोग की वेबसाइट पर अपलोड करना, जिस पर सर्च का विकल्प भी हो. इसके अलावा सारे दावों और आपत्तियों का डिजिटलीकरण करना, उन्हें ट्रैक करने की सुविधा प्रदान करना जैसे कई चुनाव और मतदाता के हित में उठाए गए कदम हैं. आयोग सर्विस वोटरों और विदेश में बैठे मतदाताओं को सूचीबद्ध करने का प्रयास कर रहा है. आयोग ने सर्विस वोटरों को ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की भी सुविधा प्रदान की है.

21 आप विधयकों के लाभ के पद मामले के बारे में आप क्या कहेंगे? इस पर कब तक कोई निर्णय हो सकेगा?

इस मामले में याची और प्रतिपक्ष दोनों की ही सुनवाई चल रही है, इसलिए फिलहाल इस पर कुछ भी कहना उचित नहीं होगा.

First published: 21 December 2016, 9:06 IST
 
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