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माओवादियों के गढ़ बस्तर में सोनी सोरी की तिरंगा यात्रा

राजकुमार सोनी | Updated on: 10 August 2016, 11:56 IST

मंगलवार को जानी मानी सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी ने छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित क्षेत्र बस्तर में तिरंगा यात्रा शुरू कर दी है. यह यात्रा 15 अगस्त की सुबह उस गोमपाड़ गांव में पहुंचेगी जहां पिछले दिनों सुरक्षाबलों ने मड़कम हिड़मे नाम की एक युवती को माओवादी बताकर मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया था.

हिड़मे की मौत के बाद इस बात पर हो-हल्ला मचा कि सुरक्षाबलों ने उसके साथ दुष्कर्म किया था. इस मामले पर बिलासपुर हाईकोर्ट के आदेश पर न्यायिक जांच चल रही है.

यात्रा की शुरुआत के मौके पर सोनी सोरी का कहना था कि चाहे पुलिस उन्हें माओवादी बताकर गोली मार सकती है, मगर वे उस गोमपाड़ इलाके में तिरंगा लहराने से नहीं रोक सकती जहां आजादी के बाद से आज तक सरकार के नुमाइंदो ने दस्तक देने की जरूरत नहीं समझीं.

गौरतलब है कि गोमपाड़ को धुर नक्सल प्रभावित इलाका माना जाता है. सुरक्षा तंत्र का यह मानना है कि वहां केवल माओवादी बसते हैं. माओवाद की आड़ में अक्सर इस इलाके से साधारण आदिवासियों के मुठभेड़ में मारे जाने की खबरें भी आती रहती हैं.

सोनी सोरी ने कहा कि सरकार ने बस्तर को एक अजायबघर में तब्दील कर रखा है. आदिवासियों की जिंदगी गुलामों जैसी बना दी गई है. सोरी ने बताया कि दंतेवाड़ा से गोमपाड़ तक कुल 180 किलोमीटर की यात्रा के दौरान एक दर्जन से ज्यादा गांवों में उनका पड़ाव होगा. इस दौरान जहां भी काफिला रुकेगा वहां ग्रामीणों को संविधान, तिरंगे और खुली हवा में सांस लेने का मतलब समझाया जाएगा.

यात्रा को विफल करने का आरोप

सोरी कहती है, “यह यात्रा इसलिए भी है क्योंकि गोमपाड़ और उसके आसपास के डेढ़ सौ गांवों के ग्रामीणों से पुलिस ने उनका राशनकार्ड और जीने का अन्य बुनियादी अधिकार छीन लिया है. दंतेवाड़ा से गोमपाड़ तक ग्रामीण मर-मरकर जी रहे हैं. देश और दुनिया को यह तो मालूम होना ही चाहिए कि बस्तर में पुलिस माओवाद के खात्मे के नाम पर कैसा गंदा खेल खेल रही है.”

यात्रा के संयोजक संकेत ठाकुर ने पुलिस और स्थानीय प्रशासन पर यात्रा को विफल करने के लिए हथकंडे अपनाने का आरोप लगाया. ठाकुर ने बताया कि यात्रा को बस्तर के कमिश्नर से अनुमति मिल जाने के बाद भी दंतेवाड़ा के कलेक्टर यह कह रहे हैं कि उनके पास कोई सूचना नहीं है.

विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर निकाली गई इस यात्रा के बारे में यह भी प्रचारित किया गया कि सोनी सोरी को आदिवासियों के हितों से कोई लेना-देना नहीं है इसलिए वे आदिवासियों के उत्सव के दिन अपनी निजी यात्रा को तरजीह दे रही है. इसके जवाब में सोनी सोरी और उनके समर्थकों ने अपनी यात्रा सुबह की बजाय शाम को निकाली.

यात्रा में शिरकत करने के लिए दूर-दराज से आने वाले लोगों को होटलों में जगह नहीं दी गई. गांवों में नाच-गाने का आयोजन भी हुआ और ग्रामीणों को इस बात के लिए डराया-धमकाया गया कि यदि वे यात्रा में शामिल होते हैं तो पुलिस में उनका रिकार्ड खराब हो सकता है और वे मुसीबत में फंस सकते हैं.

हुर्रे का नवजात भी यात्रा में शामिल

अब से कुछ समय पहले पुलिस ने हुंगा नाम के एक आदिवासी को माओवादी होने के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार किया था, तब उसकी पत्नी हुर्रे जो गर्भवती थीं, उसे बचाने के लिए भागदौड़ कर रही थी. पुलिस ने हुर्रे के पेट पर बंदूक की बट मारी. कुछ दिनों बाद उसने एक बच्चे को जन्म दिया लेकिन हुर्रे को इंफेक्शन हो गया.
अपने नवजात को लेकर हुर्रे दंतेवाड़ा जेल के बाहर दिन-दिन भर खड़ी रहती थी. एक रोज जब उसकी हालत गंभीर हो गई तो सोनी सोरी और सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया ने उसे अस्पताल में दाखिल करवाया. लेकिन हुर्रे ने दम तोड़ दिया, तब से बच्चे को सोरी ही पाल रही थी. यात्रा में सोरी उस बच्चे को लेकर भी शामिल हुई.

देश के कई दिग्गज शामिल

सोरी की तिरंगा यात्रा को देश के कई दिग्गजों ने अपना समर्थन दिया है. यात्रा में सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया, लीगल एड की शालिनी गेरा, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के जनक लाल ठाकुर, श्रेया, पीयूसीएल के प्रदेश अध्यक्ष लाखन सिंह, सुकुल नाग, संकेत ठाकुर, छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला, किसान नेता आनन्द मिश्रा, नंद कश्यप, कलादास सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हैं.

First published: 10 August 2016, 11:56 IST
 
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