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दक्षिण चीन सागर पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का फैसला बाकियों से ज्यादा भारत के हित में

सादिक़ नक़वी | Updated on: 14 July 2016, 8:52 IST
QUICK PILL
  • हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने दक्षिण चीन सागर को लेकर अपना फैसला सुना दिया है. दक्षिण चीन सागर चीन और फिलीपींस के बीच विवाद का केंद्र रहा है. न्यायालय ने अपने आदेश में दक्षिण चीन सागर पर मनीला केे अधिकार को मान्यता दी है.
  • बीजिंग इसे अपना क्षेत्र बताता है जबकि फिलीपींस के अलावा वियतनाम, ताइवान, ब्रूनेई, मलेशिया और जापान भी इस क्षेत्र पर अपना दावा करते हैं. चीन कहता रहा है कि इस द्वीप को लेकर ट्राइब्यूनल कोई फैसला नहीं दे सकता.

हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने दक्षिण चीन सागर को लेकर अपना फैसला सुना दिया है. दक्षिण चीन सागर चीन और फिलीपींस के बीच विवाद का केंद्र रहा है. न्यायालय ने अपने आदेश में दक्षिण चीन सागर पर मनीला के अधिकार को मान्यता दी है, जिसे लेकर बीजिंग ने कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की है.

दक्षिण चीन सागर महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों में से एक है, जिसके जरिये 5 ट्रिलियन डॉलर का करोबार होता है. इसकी वजह से तेल की कीमतों में प्रति बैरल एक डॉलर की तेजी आ चुकी है.

चीनी मंत्रियों और न्यूज एजेंसियों की प्रतिक्रिया

चीन के विदेश मंत्रालय ने इस फैसले को बेकार करार दिया और कहा कि इसे मानने की कोई बाध्यता नहीं है. चीन न तो इसे खारिज करता है और नहीं इसे मानता है. नीदरलैंड में चीन के राजदूत ने इसे काला मंगलवार घोषित कर दिया.

चीनी रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि चीन की सेना राष्ट्रीय संप्रभुता और अपने समुद्री हितों एवं अधिकारों की रक्षा करेगी. राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि चीन की संप्रभुता और समुद्री अधिकारों पर फैसले से असर नहीं पड़ेगा और चीन इस फैसले पर आधारित किसी भी प्रस्ताव को खारिज करता है.

फिलीपींस ने 2013 में ट्राइब्यूनल में अपील की थी. चीन की विस्तारवादी नीति के खिलाफ मनीला ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था. 

दक्षिण चीन सागर का इलाका 3.5 वर्गकिलोमीटर में फैला हुआ है. बीजिंग इसे अपना क्षेत्र बताता है जबकि फिलीपींस के अलावा वियतनाम, ताइवान, ब्रूनेई, मलेशिया और जापान भी इस क्षेत्र पर अपना दावा करते हैं. चीन कहता रहा है कि इस द्वीप को लेकर ट्राइब्यूनल कोई फैसला नहीं दे सकता.

चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ लंबे समय से यह संदेश देने की कोशिश करती रही है कि ट्राइब्यूनल की पूरी प्रक्रिया महज प्रहसन है. अपने एक संपादकीय में शिन्हुआ ने लिखा, 'एक जहरीले पौधे की तरह जो कभी मीठे फल नहीं दे सकता, वैसे ही यह पूरा ट्रिब्यूनल शुरू से दूषित रहा है.'

ट्रिब्यूनल ने क्या कहा?

ट्रिब्यूनल ने कहा, 'चीन के समुद्री यात्री और मछुआरे ऐतिहासिक तौर पर अन्य देशों की तरह दक्षिण चीन सागर में जाते रहे हैं लेकिन इस बात का कोई ऐतिहासिक सबूत नहीं है कि इन इलाकों और यहां के संसाधनों पर चीन का विशेष अधिकार है.'

चीन परोक्ष रूप से इस इलाके में अपनी सैन्य ताकत और हस्तक्षेप बढ़ाता जा रहा है. हेग अदालत के फैसले के बाद इस इलाके में चीन की सैन्य दखलअंदाजी में बढ़ोतरी हो सकती है. अमेरिका भी साफ कर चुका है कि वह इस मामले में कोई संघर्ष नहीं चाहता है. चीन अमेरिका का वैश्विक व्यापार में अहम साझेदार है.

हालांकि अमेरिका और चीन दोनों ने इस क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई है. अमेरिका चीन के दावे का मुक्त समुद्री अधिकार के आधार पर विरोध करता रहा है.

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

मनीला ने हालांकि अपनी प्रतिक्रिया में सावधानी बरती है लेकिन जापान और अमेरिका ने इस फैसले को अंतिम बताया है. उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों को इस फैसले का सम्मान करना चाहिए. बीजिंग अमेरिका और जापान की प्रतिक्रिया से खुश नहीं है.

अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, 'अमेरिका यह उम्मीद जाहिर करता है कि दोनों पक्ष अपनी तरफ से इस फैसले को मानेंगे.'

चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने जापान को इस मामले में कुछ भी बोलने से परहेज रखने की सलाह दी है. विशेषज्ञों की माने तो चीन ने जिस तरह से संयुक्त राष्ट्र समर्थित न्यायालय के फैसले को खारिज किया है, उसके भविष्य में बड़े परिणाम सामने आएंगे.

इस बीच भारत ने उम्मीद के मुताबिक ही प्रतिक्रिया दी है. विदेश मंत्रालय ने सभी पक्षों से फैसले का सम्मान करने की अपील की है.

चीन-पाकिस्तान बनाम भारत-अमेरिका

चीन, पाकिस्तान-चीन आर्थिक गलियारे में अरबों डॉलर की फंडिंग कर रहा है. साथ ही वह परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में भारत के प्रवेश को रोकने की हर मुमकिन कोशिश भी कर रहा है.

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिले थे तब जारी संयुक्त बयान में दक्षिण चीन सागर का जिक्र किया गया था. हालांकि जून में जारी संयुक्त बयान में भारत ने इसका जिक्र नहीं किया था क्योंकि उसे एनएसजी में चीन के समर्थन की जरूरत थी. चीन के विरोध की वजह से फिलहाल भारत को एनएसजी में सदस्यता नहीं मिल पाई.

विशेषज्ञों की माने तो भारत ने सभी पक्षों को फैसले का सम्मान करने का संदेश देकर चीन को सख्त संदेश देने की कोशिश की है. यूएनसीएलओएस में बातचीत करते वक्त अब भारत की स्थिति ज्यादा मजबूत होगी. 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत ने हेग न्यायालय के फैसले का सम्मान किया था. मामला बांग्लादेश के साथ जमीन को लेकर जुड़ा हुआ था.

जेएनयू में चीनी स्टडीज के प्रोफेसर श्रीकांत कोंडपल्ली ने कहा, 'भारत ने यह दिखाया है कि बड़ी ताकत छोटी शक्ति के साथ रह सकता है.' कोंडपल्ली ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का फैसला भारत के लिए ठीक होगा क्योंकि दक्षिण चीन सागर से इसका 55 फीसदी व्यापार होता है. 

अब हिंद महासागर में आक्रामकता दिखाने के बाद भारत के पास दक्षिण चीन सागर में काम करने का विकल्प होगा.

चीन में काम कर चुके एक अन्य डिप्लोमेट ने कहा कि हमें निहित स्वार्थों के प्रति सावधान रहते हुए तेजी से बढ़ती हुई ताकत की तरह बर्ताव करना होगा. 

First published: 14 July 2016, 8:52 IST
 
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