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सपा-भाजपा-बसपा: बुद्धम शरणम् गच्छामि

महेंद्र प्रताप सिंह | Updated on: 21 May 2016, 14:58 IST

बौद्ध धर्म में समाजवादी पार्टी समाजवाद तलाश रही है. भारतीय जनता पार्टी को चुनावी नाव पार होने की संभावना दिख रही है और बहुजन समाज पार्टी को डर सता रहा है कि बौद्ध वोट कहीं खिसक न जाय.

गौतम बुद्ध की जयंती पर उत्तर प्रदेश के सियासी दलों में होड़ मची है. सब अपने-अपने तरीके से गौतम बुद्ध को याद कर रहे हैं. सबकि नजर चुनाव पर टिकी है. सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बौद्ध मतावलंबियों को लुभाने के लिए अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान में संगोष्ठी और भजन संध्या का आयोजन करवा रहे हैं. यह संदेश देने की कोशिश है कि समाजवादियों को बौद्ध धर्मावलंबियों और गौतम बुद्ध की फिक्र है. साल भर में एक शाम ही सही बुद्ध के नाम का जाप तो हो रहा है.

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भाजपा भी पीछे-पीछे लगी हुई है. बाकायदा बौद्ध भिक्षुओं की टोली बनाकर भाजपा उन्हें पूरे प्रदेश में घुमा रही है. घर-घर बुद्ध के नाम की अलख जगाई जा रही है. धम्म चेतना यात्रा के जरिए संदेश दिया जा रहा है कि नरेंद्र मोदी देश के ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंंने सबसे पहले जापान, चीन, कोरिया, श्रीलंका और भूटान जैसे बौद्ध बहुल देशों की यात्रा की. वहां को मठों में गए और माथा टेका. इससे देश-विदेश के बौद्ध अनुयायियों का मान बढ़ा.

गौतम बुद्ध की जयंती पर उत्तर प्रदेश के सियासी दलों में होड़ मची है

बहुजन समाज पार्टी महात्मा बुद्ध को अपना प्रेरक मानती है. मायावती ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में बुद्ध की जगह-जगह प्रतिमाएं लगवाई थीं. लेकिन, इस बार मायावती को पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा है कि उनके परंपरागत वोटर और बौद्ध धर्मावलंबियों का बसपा से मोह भंग हो रहा है. इसलिए वो भी बुद्ध की शरण में जाने को आतुर हैं.

शील रक्षित भिक्षु निकाल रहे धम्म यात्रा

उत्तर प्रदेश की 19 करोड़ से भी अधिक की आबादी में बौद्ध धर्मावलंबी एक प्रतिशत से भी काफी कम यानी .64 प्रतिशत हैं. लेकिन, 2017 के चुनावों में पार्टियां कोई मौका चूकना नहीं चाहती हैं. लिहाजा एक-एक मत की मारामारी है. सभी दल इसके लिए जूझ रहे हैं.

फिलहाल बौद्धों को लुभाने के अभियान में भाजपा आगे दिख रही है. वह बता रही है कि बुद्ध और राम एक हैं. बौद्धों और वैष्णव को जोड़ने का नया फार्मूला उत्तर प्रदेश में तैयार किया गया है.

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इसके लिए सारनाथ से धम्म यात्रा शुरू की गई है. इसका समापन 14 अक्टूबर को लखनऊ में होगा. चार चरणों की यात्रा उप्र की 300 विधानसभा क्षेत्रों से गुजरेगी. यात्रा के मुख्य समन्वयक शील रक्षित भिक्षु है. ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं. यात्रा में ये बता रहे हैं कि मोदी के नेतृत्व में देश का मान-सम्मान बढ़ रहा है. रक्षित मायावती या अखिलेश का नाम लिए यह बता रहे हैं कि वंचित समाज, जाति व धर्म के नाम पर धोखा देने वालों से सावधान रहे.

फिलहाल बौद्धों को लुभाने के अभियान में भाजपा आगे दिख रही है

वे यात्रा के जरिए धार्मिक, आर्थिक, शैक्षणिक और राजनीतिक चेतना पैदा करने का दावा करते हैं. जनता को बता रहे हैं कैसे कुछ लोग दलितों, शोषितों व पिछड़ो का नाम लेकर उनके वोट के लिए उन्हें ठग रहे है.

शील रक्षित के मुताबिक धर्म का भ्रम छोड़ना होगा लोगों को. सबको बराबरी का दर्जा देने का काम करने वाले प्रधानमंत्री के साथ खड़े होना ही विकल्प है. हालांकि भाजपा इस यात्रा से खुद को अलग बता रही है. उसका कहना है कि धम्म यात्रा से पार्टी का कोई मतलब नहीं लेकिन शील रक्षित और भाजपा के संबंध जगजाहिर हैं.

मायावती भी पीछे नहीं

मायावती दलितों को बौद्ध बनने के लिए प्रेरित करती रही हैं. दलितों के बौद्ध धर्म ग्रहण करने का पुराना इतिहास है. बाबा साहब भीमराव आंबेडकर ने भी बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया था.

धम्म यात्रा में भले ही भाजपा का झंडा और बैनर नहीं है, लेकिन मायावती को पता है कि इससे भाजपा अपने पक्ष में माहौल बना रही है. इसलिए भीम और बुद्ध के संदेशों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए बसपा का स्थानीय कैडर बौद्धों और दलितोंं के बीच सक्रिय कर दिया गया है.

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सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में बसपा शून्य पर पहुंच गई थी. 33 लोकसभा सीटों पर बसपा के उम्मीदवारों ने दूसरा स्थान हासिल किया था. एक लिहाज से बसपा 165 विधानसभा सीटों पर दूसरे स्थान पर रही थी. मायावती का फोकस इन सीटों पर ज्यादा है.

इन सीटों पर बौद्ध गुरुओं और प्रवर्तकों को पार्टी से जोड़ने का काम तेज कर दिया गया है. बसपा का आधार दलित वोट बैंक है जो 22 से 24 प्रतिशत है. इसमें 15 प्रतिशत जाटव है. मायावती के ये ठोस वोट बैंक हैं. पार्टी की कोशिश है जहां-जहां से भाजपा की धम्म यात्रा निकल रही है उसके पीछे सचेत यात्रा निकाली जाएगी. कुल मिलाकर अपने वोट बैंक को सहेजने की रणनीति पर बसपा काम कर रही है.

सपा का समाजवादी बौद्ध धर्म

धम्म यात्रा की काट में सपा भी कार्यक्रम कर रही है. सरकारी संगठन अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, लखपनऊ को इस काम में लगाया गया है. बुद्ध जयंती के अवसर पर संस्थान ने बौद्ध धर्म एवं समाजवाद नाम से सेमिनार का आयोजन किया. इसमें बौद्ध धर्म के चिंतकों और विचारकों के बीच चर्चा आयोजित की गई. भजन संध्या की भी व्यवस्था है. इन सबका मकसद सिर्फ एक है बुद्ध से नजदीकी जताना.

देखना यह होगा वोटर किस पार्टी के बुद्ध के साथ अपना दिली रिश्ता जोड़ता है.

First published: 21 May 2016, 14:58 IST
 
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