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सपा और अंसारी बंधुओं के कौमी एकता दल के विलय की सुगबुगाहट फिर तेज

पत्रिका ब्यूरो | Updated on: 16 August 2016, 13:17 IST
(फाइल फोटो)

समाजवादी पार्टी और कौमी एकता दल के विलय की संभावनाओं को फिर बल मिलता नजर आ रहा है. सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव द्वारा कौमी एकता दल के पार्टी में विलय के लिए पूर्व सांसद अफजाल अंसारी को बुलाना राजनीतिक गलियारे में चर्चा का विषय बना है.

हालांकि पत्रिका को सूत्रों के हवाले से खबर मिली है कि इस मुद्दे पर कौमी एकता दल कई खेमों में बंट गयी है. ऐसा माना जा रहा है कि अगर दोनों पार्टियां एक होती हैं, तो सपा सियासी फायदा उठा लेगी लेकिन कौमी एकता दल को नुकसान उठाना पड़ सकता है.

पत्रिका सूत्रों के मुताबिक ऐसे में कौमी एकता दल अपने अस्तित्व के साथ ही लोगों का भरोसा भी खो देगी. पार्टी के लोग ही मानते हैं कि एक बार धोखा खाने के बाद कौमी एकता दल को विलय के बारे में नहीं सोचना चाहिए.

वहीं कार्यकर्ताओं का एक बड़ा तबका इस पूरे घटनाक्रम को अफवाह और समाजवादी पार्टी की साजिश बता रहा है. पार्टी के कार्यकर्ता सोशल साइट पर इस बारे में चर्चा करते नज़र आए.

इत्तेहाद फ्रंट का असर!

मुलायम सिंह यादव द्वारा कौमी एकता दल के विलय की मंशा जाहिर करते ही पूर्वांचल में सियासी तूफान सा आ गया है. सपा और कौमी एकता दल के बीच बढ़ी खटास को अब तक भाजपा और बसपा अपने लिए मौके के रूप में देख रहे थे.

खास तौर पर कौमी एकता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष अफजाल अंसारी द्वारा सपा के खिलाफ मोर्चा खोलना और 18 दलों का गठबंधन (इत्तेहाद फ्रंट) खड़ा करने से भजपा को पूर्वांचल में फायदा नजर आ रहा था. इस बदलते सियासी घटनाक्रम से सपा सकते में थी.

पढ़ें: इत्तेहाद फ्रंट: सभी दलों में दलदल है इसलिए उत्तर प्रदेश में मुस्लिम बना रहे हैं एक नया दल

कुल मिलाकर यह बताने का प्रयास किया जा रहा है कि यह सब सपा की सियासी साजिश है, लेकिन इस चर्चा ने पूर्वांचल की राजनीति को नया रुख दे दिया है.

वहीं सपा और कौमी एकता दल से ज्यादा इस पूरे घटनाक्रम पर कांग्रेस, भाजपा और बसपा की नजर है. क्योंकि इन दलों के एक मंच पर आने को सपा अपने नुकसान के तौर पर देख रही है.

खास तौर पर भाजपा पूर्वांचल में मुस्लिम मतों के बिखराव का फायदा उठाने की ताक में है. दूसरी तरफ खुद कौमी एकता दल के लोग भी पूरे हालात पर नजर रखे हैं.

पार्टी के कार्यकर्ताओं का मानना है कि सपा से मिले धोखे के बाद पार्टी अध्यक्ष अफजाल अंसारी को अब दोबारा विलय की कोशिश नहीं करनी चाहिए. क्योंकि इससे पार्टी न सिर्फ अस्तित्व खो देगी, बल्कि अपना विश्वास भी खो देगी. 

मुलायम की अखिलेश को नसीहत

इस बीच लखनऊ में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने जिस तरह सार्वजनिक मंच से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को नसीहत दी, उससे एक बार फिर संकेत मिले कि अखिलेश और शिवपाल के बीच सब कुछ ठीक नहीं है. 

इस्तीफे की खबरों के बीच अपने भाई के बचाव में उतरे मुलायम को इसमें साजिश की बू आई और उन्होंने बताया कि उन्होंने शिवपाल को इस्तीफा न देने के लिये मना लिया है. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर शिवपाल इस्तीफा देते हैं, तो स्थितियां काबू से बाहर हो जाएंगी.

पढ़ें: शिवपाल के इस्तीफे की धमकी सपा और उसके शीर्ष परिवार के भीतर चल रही खींचतान की निशानी है

यही नहीं मुलायम ने पार्टी कार्यकर्ताओं की अनदेखी करने और चापलूसों से घिरे रहने के लिए अखिलेश को आड़े हाथों लिया. मुलायम ने इस दौरान कहा कि अधिकारी न तो वरिष्ठ मंत्रियों की ही सुन रहे हैं और न ही पार्टी कार्यकर्ताओं की और मुख्यमंत्री इस स्थिति पर काबू पाने में असफल रहे हैं.

इस्तीफे की धमकी

उत्तर प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री शिवापाल यादव द्वारा मैनपुरी में रविवार को एक जनसभा में दिए बयान के बाद समाजवादी पार्टी की पारिवारिक कलह सतह पर नजर आई.

शिवपाल ने कहा, "अधिकारी मेरी बात नहीं सुनते और मेरे आदेशों की अनदेखी करते हैं." इसके ठीक एक दिन बाद ही उनके बड़े भाई मुलायम सिंह यादव ने अपने छोटे भाई का यह कहते हुए बचाव किया कि वे एक मंत्री हैं, जो कुछ अच्छा काम करने का प्रयास कर रहे हैं. उनकी बात बिल्कुल सही है.

मैनपुरी में रविवार को आयोजित एक जनसभा को संबोधित करते हुए शिवपाल ने कहा, "हमने पहली बार प्रदेश में अपने बूते पर सरकार बनाई है, लेकिन पार्टी के ही अपने कई नेता इसे नुकसान पहुंचा रहे हैं. यहां तक कि इंजीनियर और अधिकारी भी मेरे आदेशों की अवहेलना कर रहे हैं. अगर भ्रष्टाचार और अवज्ञा जारी रहा, तो मैं मंत्री पद से इस्तीफा देकर पार्टी के लिये काम करने लगूंगा."

गौरपतलब है शिवपाल यादव इस चुनावी वर्ष में पार्टी के राज्य प्रभारी हैं, जबकि सीएम अखिलेश यादव के पास यूपी में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष की बागडोर भी है.

First published: 16 August 2016, 13:17 IST
 
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