Home » इंडिया » Spooked by bromate in bread? Check these 10 deadly pesticides on your plate
 

आखिर एफएसएसएआई को 31 जानलेवा कीटनाशकों की चिंता क्यों नहीं है?

सुहास मुंशी | Updated on: 24 June 2016, 14:47 IST
QUICK PILL
  •  सरकार द्वारा हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार देश में उत्पादित और बिकने वाले तमाम खाद्य पदार्थों का पांचवा हिस्सा कीटनाशकों से संक्रमित होता है. यह डाटा केंद्रीय कृषि मंत्रालय द्वारा प्रायोजित एक राष्ट्रव्यापी अध्ययन के बाद जारी किया गया है जिसमें 25 प्रयोगशालाओं ने भाग लिया था.
  • कैच के पास ऐसे 31 बेहद हानिकारक कीटनाशकों की सूची है जिनके इस्तेमाल पर पूरी दुनिया में प्रतिबंध लगा हुआ है लेकिन भारत में इनका प्रयोग धड़ल्ले से जारी है.

एफएसएसएआई (फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथाॅरिटी आॅफ इंडिया) को ब्रेड के एक नमूने में मिले कैंसर कारक पोटैशियम ब्रोमाइड पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा करने में करीब एक महीने का समय लगा.

लेकिन उसके अबतक के प्रदर्शन और कार्यशैली पर नजर डालें तो हम इसे उनकी अबतक की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि मान सकते हैं.

उदाहरण के लिये कीटनाशकों से दूषित खाद्य पदार्थों के मामले को ही लीजिये. यह पिछले काफी समय से लंबित एक ऐसी समस्या है जिसके बारे में इस संस्था को सुप्रीम कोर्ट और एनएचआरसी तक कई बार झाड़ लगा चुका है. कई बार आदेशों के बावजूद यह अभी भी एक ऐसा मुद्दा है जिसको लेकर यह एफएसएसएआई वास्तव में कुछ नहीं कर सका है.

गंभीरता से देखें तो विशेषज्ञों की राय यह है कि खेती और बागवानी में हानिकारक कीटनाशकों के दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे उपयोग को लेकर सरकार का रवैया हठी और उदासीन है. हमारे सुरक्षित भोजन या सुरक्षित खाद्य चेन के अधिकार का उल्लंघन है जो रोजाना हो रहा है.

खुद सरकार द्वारा हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार देश में उत्पादित और बिकने वाले तमाम खाद्य पदार्थों का पांचवा हिस्सा कीटनाशकों से संक्रमित होता है. यह डाटा केंद्रीय कृषि मंत्रालय द्वारा प्रायोजित एक राष्ट्रव्यापी अध्ययन के बाद जारी किया गया है जिसमें 25 प्रयोगशालाओं ने भाग लिया था.

कैच के पास ऐसे 31 बेहद हानिकारक कीटनाशकों की सूची है जिनके इस्तेमाल पर पूरी दुनिया में प्रतिबंध लगा हुआ है लेकिन भारत में इनका प्रयोग धड़ल्ले से जारी है.

आपको इसके बारे में जानकारी देने के लिये हम इन 31 कीटनाशकों में से 10 के बारे में जानकारी दे रहे हैं.

फाॅस्फाडिमाॅन

खाद्यान्न, पिसे हुए खाद्यान्न, फलों और सब्जियों में इस्तेमाल होता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने इस कीटनाशक को ‘बेहद खतरनाक’ श्रेणी में वर्गीकृत किया है. संयुक्त राष्ट्र की ‘पर्यावरण संरक्षण एजेंसी’ (ईपीए) ने इसे ‘कैटेगरी-1 (अत्यधिक विषैला)’ में रखा है. यूरोपीय संघ के मानकों के अनुसार यह ‘बेहद विषैला’ और ‘पर्यावरण के लिये खतरनाक’ है.

अध्ययनों ने साबित किया है कि यह यौगिक केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है जिसके प्रभाव से तालमेल के अभाव, बोलने में घबराहट, प्रतिक्रिया में कमी, मांसपेशियों का अनैच्छिक ऐंठना आदि संकेत देखने को मिलते हैं. इन सबके फलस्वरूप आखिर में शरीर और श्वसन प्रणाली को लकवा भी मार सकता है.

इस कीटनाशक के अधिक प्रभाव से साईकोसिस, दिल की धड़कन का अनियमित होना, बेहोशी, आक्षेप, श्वसन तंत्र का फेल होना, हृदयघात और यहां तक कि कोमा जैसी स्थिति भी आ सकती है.

मोनोक्रोटोफाॅस

इसका इस्तेमाल अनाज, फल और सब्जियों में किया जाता है. 16 जुलाई 2013 को बिहार में इस रसायन से दूषित मिड-डे मील खाने के बाद 23 स्कूली बच्चों की मौत हो गई थी. इतनी बड़ी त्रादसी के बावजूद यह कीटनाशक बेरोकटोक हमारे खेतों में इस्तेमाल हो रहा है.

मोनोक्रोटोफाॅस को भी डब्लूएचओ ने ‘अत्यधिक खतरनाक’ रसायन की श्रेणी में वर्गीकृत कर रखा है. इस रसायन के प्रभाव से अनैच्छिक शौच या पेशाब, साईकोसिस, बेहोशी, श्वसन तंत्र का फेल होना और कोमा की स्थिति आ सकती है.

एसीफेट

इसका प्रयोग अधिकतर चावल और सूरजमुखी के बीजों में होता है. इसे फीटोटाॅक्सिक (एक ऐसा रासायनिक यौगिक जो भ्रूण को भी प्रभावित कर सकता है) माना जाता है और इस बात के प्रमाण हैं कि एसीफेट का अत्यधिक प्रयोग हाॅर्मोनल असंतुलन का कारण भी बन सकता है.

एलाक्लोर

इसका प्रयोग मूंगफली, मक्का और सोयाबीन के बीजों में किया जाता है. प्रयोगशाला के चूहों पर किये गए अध्ययन से साफ है कि इनके निरंतर प्रयोग से हिपेटो-टाॅक्सिसिटी, स्थायी नेत्रहीनता और ट्यूमर बनने जैसी परेशानियां हो सकती हैं.

कार्बोरिल

इसका प्रयोग खाद्यान्न, भिंडी और पत्तेदार सब्जियों में किया जाता है. परीक्षणों से साफ हुआ है कि कार्बोरिल तंत्रिका तंत्र को बुरी तरह से प्रभावित करता है.

कार्बोफाॅर्न

इसका इस्तेमाल खाद्यान्न, फल, तिलहन, गन्ना, सब्जियों और चाय में होता है.

इस रसायन के प्रभाव से सांस लेने में कठिनाई, उच्च रक्तचाप, मितली, उल्टी, पेट में ऐंठन, पसीना आना, दस्त, अत्यधिक लार आना, कमजोरी, असंतुलन, दृष्टि का धुंधलापन आदि हो सकता है.

कार्बोफाॅर्न की अधिक मात्रा शरीर में जाने पर श्वसन प्रणाली फेल हो सकती है, इसके चलते मृत्यु भी हो सकती है.

डाइकोफाॅल

इसका प्रयोग फलों, सब्जियों, चाय, मिर्च और जानवरों के चारे में होता है. डाइकोफाॅल को स्तनधारियों के लिये उत्तेजक और न्यूरोटाॅक्सिन माना जाता है और यह शरीर में घुलने की प्रवृत्ति रखता है.

एथियाॅन

यह चने, पिजन टी, सोयाबीन के बीज, चाय, मिर्च और फलों में प्रयुक्त होता है. यह रसायन तंत्रिका संबंधी विकार पैदा करने के लिये जाना जाता है.

आॅक्सीडिमेटोनमिथाइल

इसका प्रयोग मिर्च, सरसों के तेल और खाद्यान्न में किया जाता है. इस रसायन के प्रयोग के फलस्वरूप अत्यधिक पसीना आना, मतली, उल्टी, दस्त, पेट में ऐंठन, सामान्य कमजोरी, सिरदर्द, एकाग्रता की कमी और चक्कर आने जैसी जटिलताएं हो सकती हैं.

ज़िनेब

यह फलों और सब्जियों का उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रयुक्त होता है. यह मुख्यतः थायराॅइड, जिगर और मांसपेशियों के लिये हानिकारक साबित हुआ है.

इन कीटनाशकों के प्रभाव के चलते होने वाली मौतों के बावजूद अभी तक इनका इस्तेमाल बंद नहीं हो पाया है.

वास्तव में सुप्रीम कोर्ट ने तो खाद्य पदार्थों के कीटनाशकों के संक्रमित होने के लिये एफएसएसएआई को ही जिम्मेदार ठहराते हुए उन्हें 2013 में एक नोटिस भी जारी किया था.

इसके अलावा दिसंबर 2014 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएवआरसी) ने एक रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए एफएसएसएआई को एक नोटिस भी जारी किया था. इस रिपोर्ट के अनुसार परीक्षण के लिये इकट्ठा किए गए फल और सब्जियों के अधिकतर नमूनों में कीटनाशकों का असर निर्धारित मात्रा से कहीं अधिक पाया गया.

हमारे लिए नीतियां और कानून बनाने वाले इस संकट से निबटने के प्रति कितने उदासीन और स्वार्थी हैं इसका एक उदाहरण देते हुए टाॅक्सिक्सवाॅच के निदेशक गोपाल कृष्ण एक किस्सा साझा करते हैं.

कृष्ण बताते हैं, ‘‘2003 के प्रारंभ में जब कोकाकोला समेत कई शीतल पेयों में कीटनाशकों के अवशेष पाये जाने की बात सामने आई थी तब इसके प्रभाव पर गौर करने के लिये एक संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) का गठन किया गया था. यह समिति इन नमूनों में कीटनाशकों का विषाक्त स्तर देखकर अचंभे में रह गई लेकिन आखिरकार नतीजा यह सामने आया कि इन शीतलपेय निर्माताओं और कीटनाशक कंपनियों के खिलाफ कोई ठोस नियम-कानून न होने के कारण कोई कार्रवाई नहीं हुई. अलबत्ता संसद में इन शीतलपेयों को जरूर प्रतिबंधित कर दिया गया.’’

सरकार द्वारा अबतक उठाये गए कदमों के बारे में बात करते हुए कृष्णा कहते हैं कि उन्होंने सिर्फ कीटनाशकों के उपयोग पर नजर रखने के लिये समितियों के गठन पर जोर दिया है.

वे आगे कहते हैं, ‘‘एक समिति का गठन सिर्फ इन कीटनाशकों द्वारा दूषित भोजन के मुद्दे पर गौर करने के लिये किया गया जबकि पूर्व की समिति के निष्कर्षों के सत्यापन के लिये एक और समिति का गठन होता है और यह सिलसिला ऐसे ही चलता है.’’

टाॅक्सिक्स लिंक के एसोसिएट डायरेक्टर सतीश सिन्हा कहते हैं कि कीटनाशकों द्वारा भोजन को दूषित करने का मुद्दा ‘‘बेहद गंभीर’’ है लेकिन इस समस्या को जल्द ही हल नहीं किया जा सकता क्योंकि भारत अभी तक हानिकारक माने जाने वाले ऐसे कीटनाशकों की सूची तक तैयार नहीं कर पाया है और न ही वह उनमें से किसी पर प्रतिबंध लगा पाया है.

सिन्हा कहते हैं, ‘‘हम सब जानते हैं कि हम जो कुछ भी खा रहे हैं वह इन कीटनाशकों और रसायनों से दूषित है लेकिन इसके बावजूद हमारे देश में इन कीटनाशकों को लेकर कोई नियम नहीं है. अगर इनका निर्माण स्थानीय स्तर पर नहीं किया जा रहा है तो कौन इन्हें आयात कर रहा है और कैसे यह किसानों के हाथों तक पहुंच रहा है.’’

देश में इन रसायनों को प्रतिबंधित करने का तरीका बताते हुए कृष्णा कहते हैं कि इसके लिये होने वाली जांच के लिये सांसदों का खून लिया जाए. हो सकता है कि यह कदम हमारे नीति-नियंताओं को झझकोरने के लिये काफी रहे.

कृष्णा कहते हैं, ‘‘बाज में इस परीक्षण को करने की प्रणाली मौजूद है जिसे बाॅडी बर्डन टेस्ट कहते हैं. इन परीक्षणों के परिणाम से किसी भी व्यक्ति के रक्त प्रवाह में मौजूद सभी जहरीले रसायनों का पता लगने के अलावा इन रसायनों के मूल स्रोत का भी पता लगाया जा सकता है. एक बार हमारे नीति-नियंतओं को इन 31 कीटनाशकों के लिये इस बाॅडी बर्डन टेस्ट को खुद पर करवाना चाहिये और फिर देखिये यह लोग हम जनता-जनार्दन के लिये कितनी जल्दी नियमों को लागू करते हैं.’’

इस बीच कैच न्यूज ने 15 जून को एफएसएसएआई को इन कीटनाशकों से संबंधित सवालों की एक विस्तृत सूची भेजी है और हम उनकी प्रतिक्रिया के इंतजार में हैं.

First published: 24 June 2016, 14:47 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

He hasn't been to journalism school, as evident by his refusal to end articles with 'ENDS' or 'EOM'. Principal correspondent at Catch, Suhas studied engineering and wrote code for a living before moving to writing mystery-shrouded-pall-of-gloom crime stories. On being accepted as an intern at Livemint in 2010, he etched PRESS onto his scooter. Some more bylines followed in Hindustan Times, Times of India and Mail Today.

पिछली कहानी
अगली कहानी