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#MGNREGA मनरेगा को लेकर दिख रही राजनीतिक प्रतिबद्धता की कमी

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:52 IST
QUICK PILL
  • महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को लागू हुए 10 साल का समय हो चुका है. मनरेगा को लागू किए जाने के मामले में अहम भूमिका निभाने वाले समाज विज्ञानी ज्यां द्रेज का मानना है कि अभी भी मनरेगा की राह में कई चुनौतियां हैं जिसे खत्म करना जरूरी है.
  • ज्यां द्रेज के मुताबिक फंडिंग में कमी समेत अन्य कारणों के अलावा राजनीतिक प्रतिबद्धता का नहीं होना मनरेगा की राहत में सबसे बड़ी बाधा है.

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को मूर्त रूप देने में समाज विज्ञानी ज्यां द्रेज की अहम भूमिका रही है. उन्होंने इसके पक्ष में न केवल लगातार कैंपेन किया बल्कि इसका मसौदा भी तैयार किया. इसके साथ ही उन्होंने इस योजना को लागू किए जाने की प्रक्रिया की निगरान की और लगातार मीडिया में इसके बारे में लिखा भी. द्रेज राष्ट्रीय सलाहकार परिषद और सेंट्रल एम्प्लॉयमेंट गारंटी काउंसिल के भी सदस्य रह चुके हैं.

मनरेगा को लागू किए जाने के एक दशक बाद कैच से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि अभी इस दिशा में और भी कई चुनौतियां हैं. द्रेज को लगता है कि मजदूरी में बढ़ोतरी नहीं किए जाने और उसके भुगतान में होने वाली देरी से इस योजना के प्रति कामगारों का मोहभंग हुआ है. इसके अलावा राजनीतिक प्रतिबद्धता के अभाव ने इस योजना को लेकर गलत संदेश दिया है.

जब 10 साल पहले मनरेगा को लागू किया गया तो आपको यह आज की तारीख में कहां नजर आता था. उम्मीदों के मुताबिक यह कितना सफल और विफल रहा है?

मुझे और अधिक की उम्मीद थी. इसमें किसी तरह की कोई चुनौती और भ्रम नहीं था. मनरेगा में कई लोगों के हित निहित हैं और यह अभी भी संघर्षों का सामना कर रहा है. 

मनरेगा को लागू किए जाने का आंकड़ा यह बताता है कि औसतन प्रति परिवारों को 50 दिनों का काम मिला. 10 फीसदी से भी कम परिवारों को साल भर के दौरान 100  दिनों का रोजगार मिला. ऐसा क्यों हुआ?

कई बार इसकी वजह फंड का अभाव रहा लेकिन इसके अलावा भी कई कारण थे. मजदूरी में नहीं होने वाली बढ़ोतरी और उसके भुगतान में होने वाली देरी की वजह से मनरेगा को लेकर मजदूरों का मोहभंग हुआ. दिशानिर्देश बेहद जटिल हैं और कई इलाकों में मनरेगा को इंटरनेट से जोड़े जाने की बुनियादी संरचना बेहद खराब है. इसके अलावा मनरेगा को लेकर राजनीतिक प्रतिबद्धता भी कम दिखाई देती है. इससे नीचे के लोगों में बेहद खराब संदेश गया है. 

फंडिंग के मोर्चे पर सरकार का रवैया सुस्त नजर आता है. अगर आगे भी यह रवैया जारी रहा तो आपको क्या स्थिति नजर आती है?

केंद्र सरकार को इसके लिए ओपन एंडेड फंडिंग की व्यवस्था लागू करनी चाहिए. कामगारों को काम मांगने का अधिकार है और अगर वह काम करते हैं तो उन्हें इसके लिए भुगतान करना पड़ेगा. ओपन एंडेड फंडिंग केंद्र सरकार की प्रतिबद्धता के लिए सबसे जरूरी टेस्ट है और इसके बिना डिमांड के आधार पर काम असंभव है.

सूखा प्रभावित इलाकों में मनरेगा की स्थिति बेहद खराब रही है. मनरेगा लागू किए जाने के आंकड़े बताते हैं कि अधिकांश मजदूरों को 15 दिनों के भीतर भुगतान नहीं किया गया और कई लोगों को इस वित्तीय वर्ष में 100 दिनों का काम भी नहीं मिला. 150 दिनों का काम तो भूल जाइए जबकि सरकार ने सूखा प्रभावित क्षेत्रों में 150 दिनों के काम का वादा किया था. इस पर आपका क्या कहना है?

नकदी के मुकाबले बैंक और पोस्ट ऑफिस के जरिये भुगतान किए जाने की व्यवस्था शुरू होने के बाद मनरेगा के तहत होने वाले मजदूरी  भुगतान में देरी हुई है. ग्रामीण विकास मंत्रालय का दावा है कि पिछले साल के मुकाबले इस साल मजदूरी भुगतान में होने वाली देरी में कमी आई है. हालांकि भुगतान में होने वाली देरी से मजदूरों का मनोबल टूटता है. कई मजदूर अपनी मजदूरी के लिए हफ्ते भर का इंतजार नहीं कर सकते.

आगे की रणनीति क्या होगी?

सूखा जैसे हालात में राहत और बचाव का काम समय पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए. इसके अलावा मजदूरी का भी भुगतान समय पर किया जाना चाहिए.

जलवायु परिवर्तन के मामले में ग्रीन इकनॉमी बनाने की दिशा में मनरेगा जैसी योजना की क्या भूमिका होनी चाहिए?

पर्यावरण की स्थिति में सुधार करना और उसकी हिफाजत करना मनरेगा की प्राथमिकता रही है. जल संरक्षण, भूमि संरक्षण, सड़क किनारे वृक्षारोपण और बाढ़ नियंत्रण जैसी कई परियोजनाएं पहले से चल रही हैं. जलवायु परिवर्तन के मामले में मनरेगा की अहमियत और भी अधिक बढ़ जाती है क्योंकि इसकी लागत बेहद कम है. 

First published: 3 February 2016, 11:41 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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