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भारत मानवाधिकार और असहिष्णुता के पायदान पर बहुत नीचे खड़ा है

एना वर्गीस | Updated on: 25 February 2016, 0:08 IST
QUICK PILL
  • एमनेस्टी की रिपोर्ट बताती है कि अधिकारियों ने अफ्सपा जैसे कानूनों की आड़ में कई लोगों को अवैध तरीके से हिरासत में लिया. पिछले साल अप्रैल में गुजरात ने एंटी टेरर बिल पास किया जो अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक नहीं है.
  • मानवाधिकार संगठन ने मृत्युदंड को लेकर भी भारत सरकार की आलोचना की है. विधि आयोग की सिफारिशों के बाद भी भारत में अभी तक मृत्युदंड की सजा को खत्म नहीं किया जा सका है.

2015-16 की एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट इससे बेहतर समय में नहीं आ सकती थी. जेएनयू विवाद, सोनी सोरी पर हुआ हमला, रोहित वेमुला की खुदकुशी और साहित्यकारों और कलाकारों की तरफ से पुरस्कारी वापसी का अभियान और आखिर में बजट सत्र की शुरुआत. रिपोर्ट देश में मौजूद अमानवीय स्थिति को बयां करती है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल रिपोर्ट 2015-16: द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड ह्यूमन राइट्स नाम से प्रकाशित रिपोर्ट में दुनिया के कई देशों के मानवाधिकार स्थिति की समीक्षा की गई है. भारत एक बार फिर से मानवाधिकारों को सुनिश्चित करने के मामले में ख्रराब स्थिति में रहा है. एमनेस्टी ने 15 पैमानों पर भारत की स्थिति की समीक्षा की है.

हथियारबंद समूहों की ज्यादती

  1. पिछले साल मार्च में झारखंड के लोहरदगा में कथित माओवादियों ने तीन लोगों की हत्या कर दी.
  2. सितंबर महीने में तीन साल के बच्चे और उसके पिता की सोपोर में हत्या कर दी गई.

गिरफ्तारी और हिरासत

  1. अधिकारियों ने अफ्सपा जैसे कानूनों की आड़ में कई लोगों को अवैध तरीके से हिरासत में लिया.
  2. पिछले साल अप्रैल में गुजरात ने एंटी टेरर बिल पास किया जो अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक नहीं है. पहले भी इसकी आलोचना होती रही है.

बाल अधिकार

  1. निजी स्कूलों को गरीब बच्चों के लिए 25 फीसदी सीट आरक्षित किए जाने की जरूरत है. अभी तक इसे लागू नहीं किया जा सकता.
  2. अंतरराष्ट्रीय कानूनों से सामंजस्य बिठाने की दिशा में संसद ने जुवेनाइल जस्टिस लॉ पारित किया जा चुका है. 16-18 साल की उम्र के बच्चों को अब गंभीर अपराधों के मामले में कानूनी कार्रवाई का भी सामना करना पड़ेगा.

मृत्युदंड

अगस्त में विधि आयोग ने सरकार को रिपोर्ट सौंप कर मौत की सजा को खत्म किए जाने की सिफारिश की. हालांकि अभी क इस मामले में कोई तरक्की नहीं हो पाई है.

अन्य निष्कर्ष

  1. एमनेस्टी के मुताबिक सरकार ने सिविल सोसाएटी संगठन मसलन ग्रीनपीस समेत अन्य का दमन करने के लिए एफसीआरए का गलत इस्तेमाल किया.
  2. रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिकारी भारत में सांप्रदायिक दंगों को रोकने में विफल रहे. इसके अलावा नेताओं ने भी बयान देकर इस तरह की हिंसा को बढ़ावा दिया.
  3. एमनेस्टी की रिपोर्ट जम्मू-क श्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों में अफ्सपा का जिक्र करती है. एमनेस्टी ने उस कमेटी की रिपोर्ट का भी जिक्र किया है जिसने अफ्सपा को खत्म किए जाने की सिफारिश की थी.
  4. रिपोर्ट में उन कोशिशों का भी आकलन किया गया है जिसके तहत देश में समलैंगिकता को अपराध से इतर रखने की कोशिश की जा रही है. हालांकि अभी भी धारा 377 का इस्तेमाल कर एलजीबीटीक्यू समुदाय पर निशाना साधा जा रहा है.
  5. कानून के बावजूद महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हिंसा की घटना में कमी नहीं आई. 2014 में 37,000 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए. हालांकि इसके बावजूद कई मामलों की रिपोर्टिंग नहीं हो पाई.
  6. पुलिस और न्यायिक हिरासत में उत्पीड़न की घटनाओं में कमी नहीं आई. एमनेस्टी के मुताबिक 2014 में न्यायिक हिरासत में 93 लोगों की मौत हुई जबकि बलात्कार के 197 मामले सामने आए.

कुछ नया नहीं

कन्हैया कुमा के खिलाफ पुलिस और स्वयंभू वकीलों की तरफ से किए गए बर्ताव के संदर्भ में देखा जाए तो एमनेस्टी की रिपोर्ट वास्तविकता की पुष्टि करती है. यह बताती है कि हम एक राष्ट्र के तौर पर सहनशील नहीं है. 

रिपोर्ट हमें चौंकाती नहीं है. पिछले साल के अनुभवों को देखते हुए सब कुछ सही लगता है. सबसे बड़ी विडंबना यह है कि साल दर साल भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है. 

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First published: 25 February 2016, 0:08 IST
 
एना वर्गीस @catchhindi

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