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प्रेस पर हमला: एनआरआई पत्रकारों के पीछे पड़ी सरकार

राजीव खन्ना | Updated on: 12 September 2016, 7:30 IST

भारत के घटनाक्रम पर रिपोर्टिंग उन पत्रकारों पर भारी पड़ रही है, जो विदेशों में एनआरआई मीडिया प्रतिष्ठानों के लिए भारत से रिपोर्टिंग करते हैं. इन पत्रकारों पर दूतावास के स्टाफ या मीडिया हाउस के मालिकों के जरिये भारत सरकार का दबाव बढ़ रहा है.

ये पत्रकार अपने कार्यक्रमों में सीधे भारत सरकार की आलोचना करके अपने मीडिया प्रतिष्ठान और सोशल मीडिया वॉल्स पर लेख लिखकर इस दबाव की शिकायत कर रहे हैं. उनका कहना है कि पूर्व कांग्रेस सरकार के दौरान भी पत्रकारों की प्रताड़ना के ऐसे किस्से आम थे, जब अधिकारियों ने सरकार की आलोचना करने के लिए उनकी शिकायत की या कुछ जांचकर्ताओं को उनकी जांच के लिए भेज दिया.

नरेंद्र मोदी के शासनकाल में स्थितियां और भी बिगड़ गई हैं. अब इन पत्रकारों को इस बात के लिए निशाना बनाया जा रहा है कि वे मोदी और उनके व्यक्तित्व के बारे में किस तरह की रिपार्टिंग करते हैं, बजाय पूरी सरकार के. इस कड़ी में ताजा वाकया पंजाब के पत्रकार शिव इंदर सिंह का है, जो कि वेंकुवर के एक रेडियो नेटवर्क से जुड़े हुए हैं. उन्होंन तय किया है कि वे एनआरआई मीडिया के पत्रकारों की स्वतंत्रता से जुड़ा मसला उठाएंगे.

कनाडियन रेडियो टेलीविजन एंड टेलीकम्युनिकेशन (सीआरटीसी) का लिखे एक पत्र में उन्होंने बताया कि राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते उन्हें निलंबित कर दिया गया. यह पत्रकारीय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर चोट है.

पत्र में लिखा है, ‘पिछले कुछ महीनों से मेरा रेडियो के एक टॉक शो होस्ट से किन्हीं राजनीतिक मुद्दों पर मतभेद चल रहा था, खास तौर पर नरेंद्र मोदी सरकार की कुछ नीतियों पर. यह बताना जरूरी है कि मानवाधिकार के मामले में हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी भाजपा का रिकॉर्ड खराब ही रहा है. जिम्मेदार भारतीय पत्रकार भी इन घटनाओं पर नजर रख रहे हैं और इनके बारे में खुल कर बोल रहे हैं. चूंकि कनाडा में रह रहे भारतीय भी इन परिस्थितियों को लेकर चिंतित हैं. इसलिए उन्हें वास्तविकता से अवगत करवाना जरूरी हो जाता है.’

मुझे इसलिए हटाया गया क्योंकि मैंने एक शो के दौरान करगिल अभियान पर जो रिपोर्टिंग की

उन्होंने कैच न्यूज को बताया, ‘मुझे इसलिए हटाया गया क्योंकि मैंने एक शो के दौरान करगिल अभियान पर जो रिपोर्टिंग की, वह शो होस्ट को पसंद नहीं आया. यहां तक कि मुझे कहा गया कि मैं मोदी को मोदीजी कह कर संबोधित करूं. मैंने जवाब दिया कि जब हम कनाडा के प्रधानमंत्री को जस्टिन ट्रूड और अमेरिकी राष्ट्रपति को ओबामा कह कर संबोधित करते हैं तो मोदी को मोदीजी कहने की क्या जरूरत है?'

उसे बताया गया कि रेडियो को इस पर श्रोताओं के नाराजगी भरे कॉल्स झेलने पड़े और बेहतर होगा अगर मैं नई प्रोग्रामिंग का हिस्सा बनूं, जिसमें तीन माह का समय लगेगा. उसके बाद रेडियो के सीईओ के जरिये भारत सरकार का दबाव बढ़ता गया और दूसरे स्टाफ ने मेरे फोन कॉल्स उठाने बंद कर दिए. उनके कनाडाई मित्रों ने बताया कि एक बैठक में सीईओ ने खास तौर पर कहा कि उनके द्वारा मोदी और भारतीय सेना की आलोचना करने पर श्रोताओं के शिकायती कॉल्स आने के कारण उन्हें यह कार्रवाई करनी पड़ी.

अपने पत्र में शिव इंदर ने पूछा है कि अगर उन्हांेने सीआरटीसी के किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं किया है तो कुछ लोगों की व्यक्तिगत शिकायत के आधार पर यह कैसे तय किया जा सकता है कि उन्होंने पूरे भारतीय-कनाडाई समुदाय की अवहेलना की. उन्होंने कहा, 'मेरे खिलाफ भारतीय एजेंटों और मोदी समर्थक लॉबी के दबाव मंे कार्रवाई की गई. वेंकुवर में यह समस्या बढ़ती ही जा रही है.'

इससे पहले एक वरिष्ठ पत्रकार गुरप्रीत सिंह ने सूरी, वेंकुवर में एक रेडियो नेटवर्क की नौकरी छोड़ी थी. 2014 में उन पर दबाव डाला गया था कि वे मोदी का समर्थन करें और उत्तरी अमेरिका की यात्रा के दौरान मोदी की आलोचना न करें. उन्हें इस बात के लिए निशाना बनाया गया कि उन्होंने अपने शो पर उस व्यक्ति को बोलने का मौका दिया जो मोदी की यात्रा के दौरान विरोध प्रदर्शन की तैयारी कर रहे थे.

गुरप्रीत कहते हैं, ‘वे सिख थे. इनमें से कुछ भाजपा के सहयोगी दल शिरोमणि अकाली दल के थे, जो ऐसी बातों पर हल्ला मचाते हैं और पत्रकारों पर दबाव बनता है.' कनाडा की ही एक और पत्रकार तेजिंदर कौर ने बताया, '2002 के गुजरात ‘हत्याकांड’, जैसा कि वे इसे अपनी रिपोर्टिंग में नाम दे रही थीं. उन्हें मानवाधिकार मामले उठाने के लिए निशाना बनाया गया. इसके अलावा इसलिए भी कि मोदी की उत्तरी अमेरिका यात्रा के खिलाफ प्रदर्शनकारियों में वह भी शामिल थीं.'

मुझे बताया गया कि मुझे अपनी वॉल पर क्या लिखना है और क्या नहीं

उन्होंने कैच को बताया, 'यहां तक कि मुझे सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर भी सख्त निर्देश दिए गए. मुझे बताया गया कि मुझे अपनी वॉल पर क्या लिखना है और क्या नहीं. साथ ही मुझे यह भी कहा गया कि मैं मोदी की आलोचना न करूं. मैंने उन्हें कह दिया कि यह मेरा निजी माध्यम है, इसका इसतेमाल मैं अपने निजी विचार के लिए कर रही हूं. इसके बाद मुझे कुछ समय के लिए छुट्टी पर चले जाने के सुझाव दिए जाने लगे. मैंने उन्हें साफ कह दिया कि या तो मुझे अपना शो करने दिया जाए या मैं ऑफ ले रही हूं और मैं सब कुछ छोड़ आई.'

ब्रिटिश कोलम्बिया में पंजाबी प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष गुरविंदर सिंह धालीवाल को पूर्व यूपीए एवं मौजूदा सरकार दोनों के ही कार्यकाल में विरोध झेलना पड़ा. 2010 में जब उन्हें पंजाबी भाषा विभाग द्वारा साहित्यिक पत्रकारिता के लिए शिरोमणि अवार्ड देने की घोषणा की गई, उसी वक्त उनका मल्टीपल एंट्री वीजा रद्द कर दिया गया.

उन्हें वीजा हासिल करने में दो साल का समय लग गया, जब पंजाब यूनिवर्सिटी, पटियाला के अधिकारियों ने मामले में यह कहते हुए हस्तक्षेप किया कि अपने डॉक्टरेट के कार्य के सिलसिले में उन्हें यूनिवर्सिटी आना जरूरी है. मुझे अधिकारियों द्वारा अनौपचारिक रूप से पूछ गए ऐसे सवालों का जवाब देना पड़ा कि कहीं मैं कोई भारत विरोधी और खालिस्तान समर्थक प्रचार अभियान तो नहीं चला रहा हूं.

उन्होंने कहा, 'मैंने उन्हें बता दिया कि हम सिर्फ तथ्यों पर आधारित रिपोर्टिंग करते हैं. मेरा तर्क यह है कि हम मानवाधिकार के मुद्दों पर बात करते रहे हैं, भले ही यह 1984 के दिल्ली के सिख विरोधी दंगे हों या 2002 के गुजरात दंगे. स्थानीय संस्थानों के हस्तक्षेप के जरिये दूतावास के अधिकारी दबाव बनाते हैं.'

उन्होंने बताया पहले शीर्ष स्तर पर दबाव बनाया जाता है. इस पर भी अगर रिपोर्टर चुप नहीं बैठते तो उन्हें व्यक्तिगत तौर पर निशाना बनाया जाता है. दूतावास अधिकारियों ने बताया, ‘केवल पांच लोगों द्वारा अलग से लिखी गई लिखित शिकायत वीजा रद्द करने के लिए पर्याप्त है.' उन्हें फिर 2014 में भी वीजा देने से इनकार कर दिया, जब 2014 में भाजपा सत्ता में आई थी. उस वक्त उन्हें कोमगाटा मारू घटना की जयंती पर संबोधन देने जाना था. राज चाहे कांग्रेस का हो या भाजपा का कोई भी मुद्दा उठाने पर निशाना जरूर बनाया जाता है.

मुझे काफी देर से बताया गया कि मैं आवेदन करूं तो मुझे वीजा मिल सकता है लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया

उन्होने कहा, ‘मुझे काफी देर से बताया गया कि मैं आवेदन करूं तो मुझे वीजा मिल सकता है लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि मैं फिर से अपमानित नहीं होना चाहता था. उन्होंने कहा, आप हमें हमारी मातृभूमि आने से रोकते हो और एनआरआई मसले सुलझाने के बड़े-बड़े दावे करते हो.’

पंजाब गार्जियन अखबार के हरकिरत सिंह कुल्लर का अनुभव भी कुछ ऐसा ही है. 2007 में दिल्ली एयरपोर्ट से ही उन्हें वापस भेज दिया गया. इसके बाद पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में कानूनी लड़ाई जीतने के बाद ही वे पंजाब जा सके थे. उन्होंने बताया 2015 में फिर उनका वीजा रद्द कर दिया गया, जब मैं पारिवारिक शादी के लिए शॉपिंग करने जाना चाहता था. किसी तरह की कोई व्यवस्थ ही नहीं है. मैं बस इतना कह सकता हूं कि शायद मुझे निष्पक्ष रिपोर्टिंग करने की सजा मिली है.

इन पत्रकारों का कहना है कि जब वे ब्लैक लिस्टेड पंजाबियों की सूची में शामिल नहीं हैैं, तो उन्हें निशाना बना कर अपमानित करने से क्या लाभ? उन्होंने कहा, पत्रकार की स्वतंत्रता के हनन के मामले केवल भारत ही नहीं बल्कि एनआरआई मीडिया में भी आसानी से देखने को मिल जाते हैं.

शिव इंदर ने सीआरटीसी को लिखे अपने पत्र में बताया, ‘अंत में बता दूं कि मैं आपको यह पत्र इसलिए नहीं लिख रहा हूं कि मैं फिर से ऑन एयर आना चाहता हूं. मेरे लिए चिंता का विषय यह है कि मीडिया के कामकाज में राजनीतिक दखल अगर भारत और दक्षिण एशिया में ऐसे ही चलता रहा तो ये लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक नहीं है. इसके लिए सीआरटीसी और दूसरे नियामक निकायों को सतर्क रहना होगा. साथ ही जिस तरह से पत्रकारों के बीच खौफ पैदा करने के लिए सीआरटीसी का नाम उछाला जा रहा है. इसका आपकी संस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा. अतः जितना जल्द हो सके मामले का हल 

First published: 12 September 2016, 7:30 IST
 
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