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कश्मीर जहां भारतीय मीडिया के लिए दरवाज़ा बंद कर दिया गया है

पार्थ एमएन | Updated on: 18 October 2016, 4:52 IST
(एएफ़पी फोटो/तौशीफ़ मुस्तफ़ा)
QUICK PILL
  • भारतीय मीडिया के एक वर्ग की इकतरफ़ा रिपोर्टिंग और स्टूडियो में होने वाले बखान से कश्मीर में पत्रकारों के लिए एक नई चुनौती पैदा हो गई है. 
  • इस पत्रकारिता से उनके भीतर अलगाववाद पनप रहा है और बार-बार गुस्सा स्थानीय कश्मीरी पत्रकारों पर उतारा जा रहा है.   

मैं 14 अक्टूबर को श्रीनगर में था. उस दिन मैं अल-सुबह ही उठ गया था. मैं पिछले कुछ दिनों से यहीं हूं और श्रीनगर के लोगों से मिलता-मिलाता रहा. पूरा एक दिन मैंने साउथ कश्मीर के कुछ विस्फोटक इलाकों की पड़ताल में गुज़ारा. उस दिन मुझे उरी के लिए निकलना था ताकि यह देख सकूं कि लाइन ऑफ कन्ट्रोल के सीमाई क्षेत्रों में लोग क्या कर रहे हैं.

मैंने श्रीनगर के अपने पत्रकार दोस्त समीर यासीर को उनके घर से सुबह 8 बजे अपने साथ लिया और हम दोनों 110 किमी के सफ़र पर निकल गए. हम कार में थे और पुराने हिन्दी गानों का मज़ा लेने में डूबे थे. हवा में ठंडक का एहसास था. जब हम यहां से 30 किमी आगे डेलिना पहुंचे कि तभी एक बड़ा सा पत्थर हमारी कार के शीशे से आ टकराया. पत्थर उसी तरफ आकर लगा जिधर मैं बैठा हुआ था. मैं तो बच गया, पर खिड़की का शीशा चकनाचूर हो गया.

पत्थर से मुझे मेरे सीने पर चोट पहुंची और टूटे हुआ शीशा मेरे शरीर पर जगह-जगह धंस गया. मेरा बाएं हाथ पर शीशे के टुकड़े काफी गहरे से धंस गए जिसके कारण खून बहने लगा. हमने कुछ मीटर दूर आगे जाकर गाड़ी रोकी. समीर तुरन्त ही कार से कूदकर और उस लड़के की ओर दौड़ा जो पत्थर फेंककर भाग रहा था. मैं भी कार से बाहर निकला और शीशे के जो टुकड़े कार के भीतर थे, उन्हें उठाकर बाहर निकालने लगा. ड्राइवर ने पिछली सीट साफ की. इस बीच कुछ स्थानीय़ बाशिंदे वहां का हाल जानने के लिए आकर खड़े हो गए थे.

मैं पक्का नहीं कह सकता कि पत्थर फेंकने वाले लड़के ने गाड़ी पर ‘प्रेस’ लिखा स्टीकर देखा है लेकिन अगले ही पल जो कुछ हुआ, वह ज़्यादा हैरान कर देने वाला था. लोगों का समूह मेरी कार के आसपास खड़ा हो गया था मानों कि मैं इस ही लायक हूं. मुझे ज़ेहनीतौर पर चोट पहुंची. यह मेरे लिए पहला मौका था जब मुझे पत्थर लगा था. इसके पहले कभी भी मुझे पत्थरों का सामना नहीं करना पड़ा था.

भारतीय मीडिया प्रोपगंडा करता है

मैं वहीं खड़ा रह गया. यह सोच रहा था कि अगर कहीं यह पत्थर मेरे सिर पर आकर लग गया होता या शीशे के टुकड़े मेरी आंख में धंस गए होते तो क्या होता. मेरी बेचैनी और दुख देखकर आसपास खड़े लोगों को ख़ुशी का एहसास हो रहा था. यह उनके चेहरे से झलक रहा था. तभी एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने चेहरे पर बनावटी हंसी लाते हुए कहा, ‘भारतीय मीडिया हमारे खिलाफ प्रोपेगंडा करता है’.

कुछ देर के लिए मुझे उस अधेड़ पर हैरानी हुई क्योंकि उसका रवैया मुझे अंदर से परेशान कर रहा था जो ‘कश्मीरियत’ से मेल नहीं खाता था. वही कश्मीरियत जिसका तजुर्बा मुझे पिछले साल घाटी में एक हफ्ता रहने के दौरान हुआ था. अधेड़ के सुर में सुर मिलाते हुए एक नौजवान, जो शायद 20 साल के आसपास का होगा, ने बड़े फख्र से कहा, ‘हमने यहां पिछले कुछ दिनों में तीन मीडिया की गाड़ियां चूर-चूर कर दी हैं.’

मैंने कड़कदार आवाज में कहा, फिर क्या हुआ?  मिल गई आजादी ?  हालांकि, मैं यह महसूस कर रहा था कि इस समय मुझे यह बात नहीं कहनी चाहिए थी. इस नौजवान ने भी सभ्य तरीके से अपना गुस्सा जताया. उसने मेरी ओर देखते हुए मुझ पर और मीडिया पर भी आरोप लगाया कि भारतीय मीडिया उन पर राष्ट्रविरोधी होने की तोहमत लगा रहा है और हालात पहले से अधिक बदतर होते जा रहे हैं.

 मैंने तुरन्त ही अपना प्रेस कार्ड निकाला और उससे कहा कि मैं ‘लॉस एंजिल्स टाइम्स’ के लिए काम करता हूं. भारतीय मीडिया का एक वर्ग क्या करता है, मैं उससे इत्तेफाक नहीं रखता. मैंने ‘भारतीय मीडिया का एक वर्ग’ वाक्य को एक बार फिर दोहराया. वह रुक गया और उसके चेहरे पर थोड़ा सुकून के भाव आ गए. 

ठीक तभी समीर लौट आया. उसने बताया कि पत्थर फेंकने वाला वाला भाग निकला था. समीर ने चटका हुआ शीशा और मेरे हाथ पर घाव देखा तो उससे रहा न गया. उसने पत्थर फेंकने वाले लड़के के खिलाफ कुछ अशोभनीय शब्द कह दिए.

जिस युवा ने मेरे ऊपर तोहमत जड़ी थी, जब उसने समीर की बात सुनी तो उसमें और समीर दोनों में गरमागरम बहस हो गई. कुछ बुजुर्ग लोगों के समूह ने दोनों को अलग-अलग किया. मैं यह तो नहीं अंदाज लगा सका कि उन्होंने क्या कहा है क्योंकि वे कश्मीरी भाषा में बात कर रहे थे लेकिन एक व्यक्ति को ‘लॉस एंजिल्स’ कहते हुए कई बार सुना.

प्रेस को रोको

हम अपनी बिना खिड़की वाली कार में वापस आकर बैठ गए और आगे का सफ़र शुरू किया. मेरे ज़ेहन में शुजात बुखारी के वे लफ्ज़ कौंध गए जो उन्होंने कुछ दिन पहले कहे थे. ‘दि राइजिंग कश्मीर’ के सम्पादक शुजात ने कहा था, यहां के लोग राष्ट्रवाद का वही अफसाना सुनते हैं जिसका बखान टीवी स्टूडियो में बैठकर कुछ लोग करते हैं.

मानों कि मीडिया देश की भावनाओं की नुमाइंदगी करता हो. इसमें कोई शक़ नहीं कि मीडिया कश्मीरियों में अलगाववाद की भावना को और मजबूत करने की भूमिका निभा रहा है.

श्रीनगर के पत्रकारों का कहना है कि यहां के पत्रकारों के लिए रिपोर्टिंग करना बुहत ही खतरनाक और मुश्किल हो गया है. ‘कश्मीर रीडर’ से जुड़े एक पत्रकार मोअज्ज़म मोहम्मद कहते हैं कि कुछ हफ्तों पहले मेरे प्रेस कार्ड को एक गुस्साई भीड़ ने फाड़ डाला था. मेरे सम्पादक ने मुझे बचाया और प्रेस कार्ड को फिर से इकट्ठा किया. 

बताते चलें कि हमने कुछ दिन पहले जब दक्षिणी कश्मीर के कुछ विस्फोटक इलाकों का दौरा किया था, तब समीर ने वहां गाड़ी पर से ‘प्रेस’ का स्टीकर हटा लिया था. समीर ने इसे तभी लगाया, जब हम श्रीनगर लौट आए.

बदलता वक़्त

मैं मई-2015 में घाटी में गया था. तब वहां हालात बिल्कुल शांतिपूर्ण थे. वैसे तो उनमें गुस्सा था, लेकिन सिर्फ़ भारत सरकार और सुरक्षा बलों के खिलाफ था. लेकिन इस बार तो सबके खिलाफ गुस्सा है. मीडिया भी उनकी नफ़रत की लिस्ट में अलग से जुड़ गया है. 

प्रदर्शनकारियों से पैलेट्स के जरिए निपटा जाता है. प्रदर्शनों का जवाब पब्लिक सुरक्षा एक्ट लगाकर दिया जाता है. राज्य द्वारा इस विद्रोह और असंतोष से निपटने के कोई संकेत नहीं मिल रहे हैं.

ऐसे माहौल में रहना जहां इंसाफ़ की कोई आहट न हो, और मीडिया के लोगों के लिए अपने विचार जायज न ठहरा पाना कि कश्मीरी क्या चाहते हैं, मोटे तौर पर घाव पर नमक छिड़कने का ही काम करेगा. इस तरह की स्थिति में कोई भी अर्नब गोस्वामी और बरखा दत्त के बीच बारीक भेद और अंतर नहीं देख सकता. जब गुस्सा और नाराजगी इतनी बढ़ गई हो कि गाड़ी से ‘प्रेस’ का स्टीकर भी हटाना पड़ जाए तो हालात बदतर होने के लिए काफ़ी हैं.

First published: 18 October 2016, 4:52 IST
 
पार्थ एमएन @catchhindi

Parth is a special correspondent with the Los Angeles Times. He has a degree in mass communication and journalism from Journalism Mentor, Mumbai. Prior to journalism, Parth was a professional cricketer in Mumbai for 10 years.

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