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विश्व महिला दिवस: यौनकर्मी की बेटी का पत्रकार बनने का सपना

लमत आर हसन | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST

फरहा शेख ने महज 20 की उम्र में काफी दुनिया देख ली है. 2002 के गुजरात दंगों में उनका घर छिन गया. उनके परिवार के एकमात्र कमाऊ सदस्य उनके पिता दुनिया में नहीं रहे. और उनकी सबसे पुरानी दोस्त उनकी अम्मी को वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर होना पड़ा.

फरहा को उस समय की ज्यादा बातें याद नहीं हैं. उन्हें बस इतना याद है कि दंगों के बाद वो अपने एक रिश्तेदार के पास मुंबई चले गए. फिर उनका परिवार कभी गुजरात वापस नहीं आ सका. उसी समय उनके पिता का निधन हो गया. परिवारवालों ने चार बेटियों वाले परिवार का जिम्मा उठाने से मना कर दिया.

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उस समय उनकी मां नजमा शेख की उम्र 30 से ऊपर थी. उन्होंने परिवार पालने के लिए एक डांस बार में क्लीनर का काम करना शुरू किया. करीब एक साल बाद जब वो गुजरात अपने गांव गईं तो उनकी एक करीबी रिश्तेदार ने देह व्यापार की तरफ मोड़ दिया.

नजमा को वो काम सख्त नापसंद था लेकिन उन्हें पैसे की सख्त जरूरत थी. उन्होंने एक साल बाद देह व्यापार का काम छोड़ दिया. लेकिन उनके ऊपर 'बुरी महिला' का ठप्पा लग चुका था. उन्हें मुंबई वापस जाना पड़ा.

फरहा आगे पढ़ना चाहती हैं. वो दिल्ली स्थित आईआईएमसी से पढ़कर पत्रकार बनना चाहती हैं

फरहा कहती हैं, "जब हम थोड़े बड़े हुए तब हमें पता चला कि हमारी अम्मी क्या करती हैं. उन्होंने हमें खुद ही बताया कि वो क्या करती हैं."

नजमा जब गुजरात में देह व्यापार से जुड़ी थीं तब उनकी चारों बेटियां मुंबई के एक मिशनरी संस्थान में रहती थीं. फरहा उस एनजीओ में उनके संग होने वाले बरताव को याद करके आज भी सिहर उठती हैं. वहां उनकी बुरी तरह पिटायी होती थी. एक बार तो उन्हें बेल्ट से मारा गया क्योंकि 'दीदी' को लगा कि वो फोन पर किसी लड़के से बात कर रही थीं.

फरहा कहती हैं, "वो लोग बहुत सख्त थे. उन्हें लगता था कि मेरा किसी से रिलेशन है. जबकि ये सच नहीं था."

फरहा बताती हैं कि "वहां छोटी-छोटी गलतियों पर उन्हें कड़ी सजा मिलती थी. कई बार सजा के तौर पर उन्हें वो खाना दिया जाता था जो उन्हें पसंद नहीं था. या कई बार बार-बार खाने पर मजबूर किया जाता था. अगर हम खाना कूड़े में फेंक देते थे तो दोबारा उसे वापस खाने के लिए मजबूर किया जाता था."

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फरहा जब पैदा हुईं तो उनकी मां उन्हें मार देना चाहती थीं. वो एक और बेटी नहीं चाहती थीं. फरहा इसके लिए अपनी मां से कोई शिकायत नहीं.

वो बताती हैं, "मेरे पिता की एक सड़क दुर्घटना के कुछ दिन बाद निधन हो गया था. उन्होंने मरने से पहले मुझे बताया था कि मां ने मेरा गला घोंटने की कोशिश की थी. मैं समझ सकती हूं कि बेटा न पैदा होने पर उनपर क्या गुजरी होगी." शायद इसीलिए उनके पिता ने दूूसरी शादी कर ली थी.

अब क्रांति नामक एनजीओ फरहा की पढ़ाई का खर्च उठा रहा है. उनकी मां के पेशे के बारे में दिए जाने वाले तानों की अब वो परवाह नहीं करतीं.

फरहा जिस एनजीओ में रहती थीं वहां उनके संग बहुत बुरा बरताव होता था. मामूली बातों पर उनकी पिटायी की जाती थी

फरहा धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलती हैं. वो टीच फॉर इंडिया प्रोग्राम के तहत पहली कक्षा के बच्चों को पढ़ाती भी हैं.

वो कहती हैं, "मुझसे कक्षा आठ के बच्चों को पढ़ाने के लिए कहा गया. लेकिन मैं खुद उनके जैसी ही दिखती थी तो प्रिंसपल ने मुझे दूसरी क्लास चुनने को कहा. मैंने क्लास एक को चुना."

फरहा को बच्चों को पढ़ाना पसंद है लेकिन वो आगे चलकर पत्रकार बनना चाहती हैं.

वो कहती हैं, "पहले जिस एनजीओ में रहती थी वहां 12वीं के बाद काम करने के लिए मजबूर किया गया. जब मैंने उनसे कहा कि मैं आगे पढ़कर पत्रकार बनना चाहती हूं तो उन्होंने कहा कि मैं अपनी 'औकात' भूल रही हूं."

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फरहा की बाकी तीन बहनें भी क्रांति एनजीओ से जुड़ी हैं. उनकी सबसे बड़ी बहन बैंक में काम करती हैं. वो बहुत जल्द एक शॉर्ट टर्म कोर्स के लिए अमेरिका जाने वाली हैं. उनकी सबसे छोटी बहन मूक-बधिर हैं. वो एक स्पेशल स्कूल में पढ़ती हैं. उनकी तीसरी बहन 12वीं की परीक्षा की तैयारी कर रही हैं.

वो कहती हैं, "अब मेरी मां काम नहीं करती. मैं और मेरी बड़ी बहन उनकी आर्थिक मदद करते हैं."

जब नजमा अपने गांव गई थीं तो उनके परिवारवालों ने उनपर आरोप लगाया कि उन्होंने अपनी बेटियों को बेच दिया है. फिर उन्होंने किसी को अपनी बेटियों का पता नहीं बताया.

वो कहती हैं, "मां कहती थीं कि वो मुझे मार भी देते तो मैं नहीं बताती. मैं उन्हें बता देती तो वो कहते कि मैंने तुम्हें ईसाई 'बनवा' दिया है."

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मिशनरी एनजीओ में उन्हें और उनकी बहनों को बाइबिल पढ़ना पड़ता था. वो उम्मीद करते थे कि फरहा और उनकी बहनें "ईसाई बन जाएंगी."

फरहा कहती हैं, "उनके पिता का परिवार रूढ़िवादी है. भले ही हमारे पिता के निधन के बाद उन्होंने हमारा ख्याल नहीं रखा लेकिन ईसाई बनने के बारे में सुनकर वो कड़ा ऐतराज जताते."

वो कहती हैं कि अब उनपर ईसाई बनने या मुस्लिम होने का कोई दबाव नहीं. न ही अपनी मां के अतीत से उन्हें कोई मुश्किल होती है.

वो कहती हैं, "मैं आईआईएमसी जाना चाहती हूं. मुझे भरोसा है कि मैं अच्छा करूंगी."

इतनी कम उम्र में कई कड़े संघर्षों से गुजरने के बाद भी फरहा जिस गरिमा और आत्मविश्वास के साथ बात करती हैं उसे देखकर उनकी मंजिल दूर नहीं लगती.

First published: 8 March 2016, 3:58 IST
 
लमत आर हसन @LamatAyub

संवाददाता, कैच न्यूज़

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