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न्याय की तलाश में कंधमाल से दिल्ली तक का सफर

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 4 March 2016, 22:41 IST
QUICK PILL
  • देबाकी, बांदीगुडाली, पबित्र, रुता, गुमिली और बदूसी अपने पति भास्कर, मुंडा, बिजॉय, गोरनाथ, दुरजो और बुधदेब के लिए न्याय मांगने आई थीं. इनका कहना है कि इन सभी के पतियों को पुलिस ने हत्या के झूठे मामले में फंसाया है.
  • इन सभी लोगों को ओड़िशा के कंधमाल जिले में हिंदू नेता स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया है.

ओड़िशा की राजधानी भुनवेश्वर से करीब 300 किलोमीटर दूर कंधमाल के जंगलों में रहने वाली 6 महिलाओं ने अपना घर और बच्चों को छोड़कर दिल्ली का रुख किया. न्याय की आस में उन्होंने दिल्ली का रुख किया. उन्हें उम्मीद है कि दिल्ली में आकर बात रखने से उन्हें देश की मीडिया का साथ मिलेगा.

इन महिलाओं के प्रेस कॉन्फ्रेंस को कवर करने के लिए करीब तीन टीवी चैनलों के पत्रकार पहुंचे लेकिन महिलाओं की बात शुरू होने से पहले ही वह वहां से चले गए क्योंकि उन्हें यह संदेश मिला कि 'अमित शाह बड़े क्षेत्रीय दलों के नेताओं से मिलने वाले हैं.' 

टीवी मीडिया के लिए छह महिलाओं की कहानी किसी काम की नहीं थी क्योंकि उनके लिए अमित शाह का कार्यक्रम ज्यादा अहम था. महिलाओं को सुने बगैर उन्होंने यह फैसला कर लिया कि यह उनके दर्शकों के लिए काम की खबर नहीं है. 

कंधमाल से आई महिलाओं को यह पता नहीं था कि उन्हें दिल्ली से क्या मिलेगा लेकिन उन्होंने इतनी उम्मीद जरूर की थी कि उन्हें वहां पर बड़ी संख्या में लोग सुनेंगे. उन्हें यह नहीं पता चल पाया कि आखिर टीवी पत्रकार उनकी बात सुने बिना क्यों चले गए.

देबाकी, बांदीगुडाली, पबित्र, रुता, गुमिली और बदूसी अपने पति भास्कर, मुंडा, बिजॉय, गोरनाथ,  दुरजो और बुधादेब के लिए न्याय मांगने आई थीं जिन्हें हत्या के आरोप में फंसाया गया है. उनका कहना है कि इस मामले में उनके पतियों को फंसाया गया है. इन सभी को करीब 8 सालों से जेल में रखा गया है. उनका कहना है कि उनके पति निर्दोष हैं और वह उन्हें निर्दोष साबित करने के लिए हर संभव काम करेंगी. उन्हें क्यों फंसाया गया? किसकी हत्या हुई थी?

सरस्वती की हत्या के बाद 300 से अधिक चर्च और 6,000 से अधिक ईसाई घरों को तहस-नहस कर दिया गया

पूरा मामला कंधमाल में 2008 में एक हिंदू नेता की हत्या से जुड़ा है. इसके बाद इन सभी छह लोगों को गिरफ्तार किया गया.

23 अगस्त 2008 को 81 साल के हिंदू नेता स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या कर दी गई थी. सरस्वती आदिवासियों के कल्याण के लिए काम कर रहे थे और उनकी हत्या उन्हीं के आश्रम में कर दी गई.

आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक सरस्वती की हत्या के बाद उपजी हिंसा में जिले के 300 से अधिक चर्च और 6,000 से अधिक ईसाई घरों को तहस-नहस कर दिया गया था.

अकारा अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि क्षेत्रीय दक्षिणपंथी समूह ने गोधरा 2002 हादसे से गलत सबक लिया. जैसे साबरमती हादसे में जलाए गए शवों को लेकर सार्वजनिक जुलूस निकाला गया वैसे ही सरस्वती के मृत शरीर को दो दिनों तक कंधमाल जिले में घुमाया गया. उनकी शवयात्रा करीब 90 दिनों तक चली. जिन गांवों से यह यात्रा गुजरी वहां हिंसा की खबरें रिपोर्ट की गई.

स्वामी की हत्या के 24 घंटों के भीतर प्रवीण तोगड़िया कंधमाल पहुंचे और उन्होंने भड़काऊ भाषण दिया. अकारा अपनी पुस्तक में लिखते हैं, 'वह (ईसाई) गाय खाते हैं. हम (हिंदू) गाय की पूजा करते हैं. जो लोग गाय खाते हैं उन्हें वहीं सजा मिलनी चाहिए जो वह गाय के साथ करते हैं.'

इससे स्थानीय प्रशासन को यह संकेत मिल जाना चाहिए था कि वहां हिंसा भड़कने वाली है. अकारा बताते हैं कि आखिर क्यों तोगड़िया जैसे लोगों को भड़काऊ भाषण देने की अनुमति दी गई. जबकि उनके भाषणों में हिंसा भड़काने और भीड़ को उन्मादी बनाने की ताकत थी.

किताब में बताया गया है कि तोगड़िया को पूरी शवयात्रा के दौरान पुलिस की सुरक्षा दी गई जबकि कई मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकारों को इस जिले में प्रवेश तक नहीं दिया जाता. 

स्वामी की हत्या के 24 घंटों के भीतर प्रवीण तोगड़िया कंधमाल पहुंचे और उन्होंने भड़काऊ भाषण दिया

नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वूमन के महासचिव एनी डी राजा ने कहा, 'मैं स्वतंत्र फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की सदस्य थी और हमें मुख्यमंत्री की तरफ से जिले में घुसने की अनुमति नहीं दी गई क्योंकि यह जिला 'अशांत' है.'

अकारा ने अपनी पुस्तक में लिखा, 'तोगड़िया को 2010 में बीजू जनता दल और बीजेपी के बीच गठबंधन टूटने के बाद राज्य में घुसने से रोक दिया गया. हालांकि अगर यही फैसला स्वामी की हत्या के बाद लिया गया होता तो तमाम लोगों की जान बच जाती.'

अकारा ने कैच को बताया कि आज की तारीख में भी मीडिया को यह लगता है कि स्वामी की हत्या के बाद भड़की हिंसा स्वाभाविक थी जबकि इसे भड़काने में दक्षिणपंथी तत्वों की गहरी भूमिका थी.

उन्होंने कहा, 'बाद में हुआ यह कि इस मामले में छह निर्दोष लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया. इस दौरान गवाहों को धमकाया गया और सही तरीके से जांच नहीं की गई.'

ओड़िशा के सामाजिक कार्यकर्ता नलिन कांत नाइक बताते हैं कि छहों मामले में पुलिस रात के बीच पहुंची और इन्हें रातों रात उठा लिया गया. इसके बाद सबूतों की तलाश में पूरे घर को तबाह कर दिया गया. उन्होंने कहा, 'अगर उन्हें एक भी सबूत नहीं मिला तो वह इसे फर्जी तरीके से तैयार करेंगे.'

मुंड की पत्नी बताती हैं, 'मेरे पति मानसिक रूप से पीड़ित हैं. वह अपना कपड़ा खुद सही तरीके से नहीं पहन सकते.'

जिन अधिकारियों ने यह कहा कि गिरफ्तार किए गए लोगों के खिलाफ आरोप सही नहीं है उनका ट्रांसफर कर दिया. अकारा बताते हैं कि उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई जबकि उनके खिलाफ शायद ही ऐसा कोई सबूत था. 

अकारा ने कहा, 'पूरे प्रकरण को ईसाईयों के षडयंत्र के तौर पर दिखाया गया. सातों को दोषी ठहराते हुए कोर्ट ने भी इस बात को लगभग मान लिया.' ओडिशा हाईकोर्ट के कई बार इस मामले में रोक लगाए जाने के बाद इन महिलाओं की उम्मीद दम तोड़ रही है.

अकारा बताते हैं, 'हम तब तक इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट तब तक नहीं जा सकते जब तक कि हाईकोर्ट का फैसला नहीं आ जाता.'

प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल हुए कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा, 'यह अफसोसजनक है कि इतने सालों बाद भी इस मामले में न्याय नहीं मिल सका है.' महिलाओं ने चीफ जस्टिस और सभी संवैधानिक अधिकारियों से सातों लोगों को रिहा किए जाने की मांग की है.

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First published: 4 March 2016, 22:41 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

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