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अमित शाह और आरएसएस की शह पर रुपानी पहुंचे मुख्यमंत्री पद तक

राजीव खन्ना | Updated on: 7 August 2016, 8:28 IST
(कैच)
QUICK PILL
  • विजय रुपानी को केशुभाई पटेल के साथ-साथ नरेंद्र मोदी का भी खास माना जाता है.
  • गैर हिंदू माने जाने वाले जैन समुदाय से संबंधित होने के चलते विजय रुपानी नाराज दलितों तक आसानी से अपनी पहुंच बना सकते हैं.

बीजेपी के भीतर चली अंदरूनी रस्साकशी और गुजरात के जाति संघर्ष दोनों के प्रति तटस्थ रवैया अपनाने हुए आरएसएस की पृष्ठभूमि को तवज्जो दी गई. अशांति के शिकार सौराष्ट्र को लेकर पार्टी की नीति भी विजय रुपानी को राज्य के नए मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण कारक बनी.

बेहद मृदुभाषी रुपानी को बीजेपी ने ऐसे समय में राज्य का नेतृत्व करने के लिये चुना है जब पार्टी राज्य में एक तरफ तो बेहद शक्तिशाली माने जाने वाले पटेल समुदाय की नाराजगी का सामना कर रही है और दूसरी तरफ दलितों की. वर्तमान समय में वे पार्टी की राज्य इकाई के प्रमुख भी हैं.

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अशांत सौराष्ट्र को लेकर पार्टी की नीति रुपानी के सीएम की कुर्सी तक पहुंचने में अहम कारक बनी.

सिर्फ तीन दिन पहले ही रुपानी ने अपने गृहनगर राजकोट में अपना 61वां जन्मदिन मनाया है. उन्होंने पूरा दिन कई नई परियोजनाओं का उद्घाटन करने और विभिन्न आयोजनों का हिस्सा बनने में बिताया.

वे राज्य में बेहद शक्तिशाली माने जाने वाले जैन (वैश्य) समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं. ऐसे में उनकी ताजपोशी बीजेपी के सामने पटेलों और दलितों से संबंधित समस्याओं को सुलझाने कि दिशा में खासा महत्व रखती है.

पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल के नजदीकी

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गैर हिंदू माने जाने वाले जैन समुदाय से संबंधित होने के चलते वे उन नाराज दलितों तक आसानी से अपनी पहुंच बना सकते हैं जिन्हें आरएसएस बेहद तत्परता से अपनी हिंदुत्व की विचारधारा से जोड़ने की कोशिश में लगी है. इसके अलावा बीजेपी भी इसी नीति पर आगे बढ़ रही है.

माना जा रहा है कि अलावा पटेलों के गढ़ माने जाने वाले सौराष्ट्र में उनका प्रभाव और पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल से उनकी नजदीकी उन्हें पटेलों में अपना प्रभाव छोड़ने में मदद करेगी.

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रुपानी कानून के स्नातक हैं और विभिन्न मंचों के माध्यम से अलग-अलग मुद्दों पर सकारात्मक बहस करने के लिये जाने जाते हैं. अपने छात्र जीवन में आरएसएस के छात्र संगठन एबीवीपी से जुड़ने के बाद वे आरएसएस के कार्यकर्ता बने और उसके बाद जनसंघ से जुड़ गए. अपने प्रारंभिक जीवन में वे अहमदाबाद में एबीवीपी के साथ पूर्णकालिक रूप से जुड़े हुए थे.

एक तरफ केशुभाई पटेल के नजदीकी होने के अलावा उन्हें नरेंद्र मोदी के खास सिपहसालारों में भी माना जाता है. नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में कार्यकाल के दौरान वे गुजरात बीजेपी के महासचिव थे साथ ही गुजरात वित्त बोर्ड के अध्यक्ष भी थे.

विजय रुपानी जैन समुदाय से होने के चलते नाराज दलितों तक आसानी से अपनी पहुंच बना सकते हैं.

वे वहली बार गुजरात विधानसभा के लिये राजकोट (पश्चिम) से 2014 में तब चुने गए जब पूर्व विधानसभाध्यक्ष और राज्य के वित्तमंत्री वजूभाई वाला ने कर्नाटक का राज्यपाल नियुक्त किये जाने के चलते यह सीट खाली की. वे इस उपचुनाव को खासे भारी बड़े अंतर से जीतने में सफल रहे.

इसके तुरंत बाद मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने रुपानी को अपने पहले मंत्रिमंडल विस्तार में शामिल किया और उन्हें परिवहन, जल आपूर्ति, श्रम और रोजगार मंत्रालयों का प्रभार सौंपा.

इससे पूर्व इसी वर्ष फरवरी के महीने में स्थानीय और नगर निकाय के चुनावों में पार्टी के दयनीय प्रदर्शन के बाद रुपानी को पार्टी की राज्य इकाई की जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी. उन्होंने पटेल समुदाय से आने वाले पार्टी प्रदेश अध्यक्ष आरसी फल्दू का स्थान लिया था.

शाह की शह

ऐसा माना जाता है कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल के बीच चल रही रस्साकशी के चलते उनकी नियुक्ति में देरी हुई. संयोग से रुपानी के संबंध अमित शाह के साथ बेहद अच्छे हैं और उन्होंने ही रुपानी को आनंदी बेन पटेल के स्वाभाविक उत्तराधिकारी नितिन पटेल के स्थान पर तरजीह दी.

कहा जा रहा है कि रुपानी के मुख्यमंत्री रहते एक तरह से अमित शाह ही गुजराग के डीफैक्टो मुख्यमंत्री रहेंगे.

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राज्य के नए मुख्यमंत्री के रूप में उनका चयन कुछ अन्य बातों की ओर भी इशारा करता है. सबसे पहले तो इस कदम को आरएसएस के पूरे प्रदेश पर अपना संपूर्ण नियंत्रण पाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है जिसके लिये गुजरात हिंदुत्व की एक बड़ी और प्रमुख प्रयोगशाला की तरह है.

राजनीति के जानकार इस परिस्थिति की तुलना उस समय से कर रहे हैं जब 2001 में भुज में आए भूकंप से निबटने में नाकाम रहने और स्थानीय शहरी निकाय चुनावों में करारी हार के बाद राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल की लोकप्रियता बिल्कुल निचले पायदान पर थी और मोदी को राज्य की बागडोर की सौंपी गई थी.

मोदी भी पूर्व में आरएसएस के प्रचारक थे और संगठन ने संकट की उस घड़ी में राज्य का नेतृत्व करने के लिये उन पर दांव लगाया था.

इस कदम को आरएसएस के पूरे प्रदेश पर अपना संपूर्ण नियंत्रण पाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है.

एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं, ‘मोदी और शाह दोनों के साथ ही उनकी निकटता उनकी सबसे बड़ी पूंजी है. इसके अलावा उम्मीद की जा रही है कि एक गैर दलित, गैर ओबीसी और गैर पटेल होने के चलते वे वर्तमान मुश्किल परिस्थितियों में नाराज पटेलों के अलावा दलितों को भी आसानी से मनाने में सफल रहेंगे.’

वास्तव में विश्लेषकों को गुजरात की राजनीति में उनके बढ़ते हुए कद का अंदाजा उस समय हो गया था जब कुछ महीने पूर्व पटेल आंदोलन के समय उन्होंने आगे आकर आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिये 10 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की थी. आदर्श रूप से तो यह घोषणा प्रदेश की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल द्वारा की जानी चाहिये थी लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ.

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सौराष्ट्र से उनका संबंध होना भी उनके पक्ष में रहा क्योंकि फिलहाल यही क्षेत्र है जो पटेलों और दलितों की सबसे अधिक नाराजगी से गुजर रहा हैं. यहां तक कि सूरत और उससे सटे क्षेत्रों के जिन पटेलों ने आंदोलन में सबसे अधिक सक्रिय भूमिका निभाई थी वे भी सौराष्ट्र के ही थे. बीजेपी को उम्मीद है कि दिसंबर 2017 में राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले वे इन दोनों समुदायों की चिंता को दूर करने में कामयाब रहेंगें.

हालांकि रुपानी के नाम की घोषणा कई लोगों के लिये एक आश्चर्य की तरह रही है क्योंकि बीजेपी को जानने वाले अधिकतर लोग यह मानकर चल रहे थे कि नितिन पटेल नए मुख्यमंत्री बनेंगे. लेकिन एक जननेता न होने और अपने गृह जिले मेहसाणा से बाहर कोई पकड़ न होना उनके खिलाफ रहा.

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इसके अलावा उन्हें आनंदी बेन के खेमे का नेता माना जाता है जिसका सीधा मतलब शाह के रुपानी के लिये पूर्ण समर्थन के रूप में था. साथ ही गांधीनगर में मुख्यमंत्री के रूप में रुपानी की मौजूदगी से शाह को पार्टी और सरकार के भीतर क्या कुछ चल रहा है इसपर नजर रखने में भी सहूलियत मिलेगी. नितिन को राज्य का उपमुख्यमंत्री बनाया गया है ताकि यह संदेश दिया जा सके कि पार्टी अपने पटेल समर्थकों को भी भूली नहीं है.

कुशल आयोजक की क्षमता का फायदा

विश्लेषकों का मानना है कि उन तक आसान पहुंच, उनका मृदुभाषी होना और एक कुशल आयोजक की क्षमता रखना भी उनके पक्ष में रहा है. कठिन से कठिन मसलों को बातचीत के जरिये सुलझाने और कुशल प्रशासनिक क्षमता भी उन्हें नितिन से कहीं आगे रखने में मददगार रही. भुज के भूकंप के बाद सौराष्ट्र के दौरों के दौरान भी यह संवाददाता उनके इस कौशल का साक्षी रह चुका है.

अंत में उम्र एक पहलू रहा जो उनके पक्ष में गया, वे हाल ही में 61 के हुए हैं.

अंत में उम्र एक पहलू रहा जो उनके पक्ष में गया. वे हाल ही में 61 के हुए हैं. रुपानी 75 वर्षीय आनंदी बेन पटेल के मुकाबले अपेक्षाकृत युवा और अधिक ऊर्जावान हैं. बीजेपी को इस बात की पूरी उम्मीद है कि आरएसएस के साथ उनका लंबा जुड़ाव और उनकी स्वच्छ छवि आने वाले दिनों में पार्टी के पक्ष में काम करेगी.

पहले ही दिन से रुपानी पर अपेक्षाओं का काफी भार रहेगा. बीते कई वर्षों से बीजेपी के मुख्य जनाधार माने जाने वाले और फिलहाल पार्टी से नाराज चल रहे पटेलों और दलितों के मुद्दों और समस्याओं को सफलतापूर्वक सुलझाना उनकी प्राथमिकता में रहेगा.

First published: 7 August 2016, 8:28 IST
 
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