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एक संशोधन को लेकर अटकी भाजपा अब पूरे लोकपाल से ही पल्ला झाड़ रही है?

चारू कार्तिकेय | Updated on: 11 February 2017, 5:48 IST
QUICK PILL
  • अन्ना हजारे के नेतृत्व में 2011 में शुरू हुआ भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल उस समय एक राष्ट्रीय जुनून बन गया था. इसने दिल्ली और केंद्र की तत्कालीन सत्तासीन पार्टी कांग्रेस के खिलाफ असंतोष की लहर पैदा करने में काफी योगदान किया.
  • इस आंदोलन ने ही मुख्यधारा के राजनेताओं को इस ओर ध्यान देने पर बाध्य किया. संसद में लोकपाल बिल लाया गया, उस पर बहस हुई और अंतत: 17 दिसंबर 2013 को निचले सदन में यह पारित कर दिया गया.
  • पर उसके बाद क्या हुआ? तब से दो साल से ज्यादा समय बीत गया और इस संस्था पर अब भी अमल होना बाकी है. यह कहां अटक गई? एक मूर्खतापूर्ण संसोधन पर, जिसे एनडीए सरकार ने दो सरकारों के बीच उसे आगे बढ़ाने की जरूरत महसूस नहीं की, और एक अन्य संसोधन पास कर दिया, जो कानून को व्यवहार में आने से पहले ही कमजोर करता है.

पांच साल देखते ही देखते निकल गए और लोकपाल विधेयक पर अब तक अमल नहीं हो सका. यह हमारी राष्ट्रीय चेतना के साथ सबसे बड़ा मजाक है.

अन्ना हजारे के नेतृत्व में 2011 में शुरू हुआ भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल उस समय एक राष्ट्रीय जुनून बन गया था. इसने दिल्ली और केंद्र की तत्कालीन सत्तासीन पार्टी कांग्रेस के खिलाफ असंतोष की लहर पैदा करने में काफी योगदान किया.

इस आंदोलन ने ही मुख्यधारा के राजनेताओं को इस ओर ध्यान देने पर बाध्य किया. संसद में लोकपाल बिल लाया गया, उस पर बहस हुई और अंतत: 17 दिसंबर 2013 को निचले सदन में यह पारित कर दिया गया.

पर उसके बाद क्या हुआ? तब से दो साल से ज्यादा समय बीत गया और इस संस्था पर अब भी अमल होना बाकी है. यह कहां अटक गई? एक मूर्खतापूर्ण संसोधन पर, जिसे एनडीए सरकार ने दो सरकारों के बीच उसे आगे बढ़ाने की जरूरत महसूस नहीं की, और एक अन्य संसोधन पास कर दिया, जो कानून को व्यवहार में आने से पहले ही कमजोर करता है.

शुरुआत

लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम 2013 में जो आवश्यक संसोधन होना था, उसकी 2014 के लोक सभा चुनाव के आदेश पत्र में पुष्टि की गई थी. जब भाजपा ने निचले सदन में 282 सीटों से अभूतपूर्व जीत हासिल की और सबसे बड़ी विपक्ष पार्टी कांग्रेस को महज 44 सीटें मिलने से भारी मात खानी पड़ी, तब सत्तासीन पार्टी ने कांग्रेस को विपक्ष के नेता की स्थिति देने से इनकार करने का निर्णय लिया, क्योंकि कांग्रेस जीतने के लिए न्यूनतम सीटें भी पाने में विफल रही थी.

सदन में कांग्रेस नेता को केवल सबसे बड़ी विपक्ष पार्टी की स्थिति मिल सकती थी. तो अब यह समस्या थी कि लोकपाल अधिनियम ने इस स्थिति की कल्पना नहीं की थी और लोकपाल नियुक्त करने के पैनल में कांग्रेस केवल सबसे बड़ी विपक्ष पार्टी के तौर पर थी.

विपक्ष के अविवादित नेता की अनुपस्थिति में सलेक्शन पैनल पर विपक्ष की एक मात्र सबसे बड़ी पार्टी के नेता को शामिल करने के लिए संशोधन जरूरी हो गया था.

संसदीय समिति की मंजूरी के बावजूद इसी संशोधन को लेकर बिल अटक रहा और परिणामत: लोकपाल अधिनियम का क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा.

लोकपाल तैयार

राज्यों में अधिकतम 22 ने लोकायुक्त के कार्यालय स्थापित किए हैं, जो राज्यों में लोकपाल होंगे. इनमें आंध्रप्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, आसाम, बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, गोवा, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश शामिल हैं.

सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका में कहा गया है कि कर्नाटक में 2010 में लोकायुक्त संतोष हेगड़े के इस्तीफे के बाद अब तक नया लोकायुक्त नियुक्त नहीं किया गया है. उसकी पुलिस शाखा में आईपीएस के पद भी ज्यादातर खाली हैं.

केरल में लोकायुक्त अपना काम खुद आरंभ नहीं कर सकता और स्वतंत्र स्टाफ भी नहीं है. पश्चिम बंगाल में ग्रुप डी के महज दो ऑफिस हैं, गुजरात में आठ साल से लोकायुक्त नहीं था.

उत्तर प्रदेश लोकायुक्त को अभियोग की शक्तियां नहीं हैं और उसकी जांच टीम में स्टाफ कम है. लोकायुक्त की रिपोर्ट्स मानने के लिए सरकार बाध्य नहीं है. महाराष्ट्र में लोकायुक्त के अधीन अलग से जांच एजेंसी नहीं है.

राजस्थान में लोकायुक्त की अपनी जांच एजेंसी नहीं है, यहां तक कि संलग्न भी नहीं, और उसके पास दंडात्मक शक्तियां नहीं हैं. आंध्रप्रदेश लोकायुक्त के पास 'तलाशी और जब्ती' के आदेश देने की शक्तियां भी नहीं हैं.

जम्मू और कश्मीर, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम, तमिलनाडु, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल सहित नौ राज्यों में लोकायुक्त अधिनियम को अमल में लाना बाकी है.

इसमें कितना समय लगेगा?

लंबे समय से ऐक्टिविस्ट सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा रहे हैं और इस शीर्ष न्यायालय ने भी इसमें ढील बरतने के लिए केंद्र सरकार की खिंचाई करते हुए दुख प्रकट किया है.

लोकपाल नियुक्त करने के लिए केंद्र से निर्देश की मांग करते हुए एनजीओ कॉमन कॉज की ओर से दर्ज एक मुकदमा सुनने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने मई 2016 में सरकार को टोका था कि वह शीघ्र कार्यवाही करे और उसे अब लेकर बैठी नहीं रहे. जाहिर है, सरकार ने नहीं सुना और एक अन्य ऐक्टिविस्ट को बाद में सर्वोच्च न्यायालय जाने को विवश होना पड़ा.

अब कोर्ट इस मामले पर सर्वोच्च न्यायालय के वकील अश्विनी उपाध्याय की ओर से दर्ज एक जनहित याचिका सुन रहा है. जनहित याचिका में केंद्र में लोकपाल और सभी राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति की मांग की गई है.

सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर केंद्र और राज्यों को यह जवाब देने के लिए नोटिस दिया है कि लोकपाल और लोकायुक्त अब तक क्रियाशील क्यों नहीं हुए हैं.

अब इसका इंतजार करना होगा कि सरकार की इस बार क्या प्रतिक्रिया रहती है, पर यह शायद ही मायने रखता है. जो फिलहाल मायने रखता है, वह यह कि केंद्र सरकार आवश्यक संशोधन क्यों नहीं कर रही, जिससे लोकपाल का ऑफिस क्रियाशील हो सकेगा.

लोकपाल के लिए जनांदोलन को समर्थन और इतना बढ़ावा देने के पांच साल बाद क्या भाजपा अब एक सशक्त भष्टाचार विरोधी लोकपाल नहीं चाहती?

First published: 20 September 2016, 10:38 IST
 
चारू कार्तिकेय @charukeya

असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़, राजनीतिक पत्रकारिता में एक दशक लंबा अनुभव. इस दौरान छह साल तक लोकसभा टीवी के लिए संसद और सांसदों को कवर किया. दूरदर्शन में तीन साल तक बतौर एंकर काम किया.

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