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रोहित वेमुला फैक्ट फाइंडिंग टीमः 'छात्र फांसी पर लटकते रहें, लेकिन सरकार को परवाह नहीं है'

श्रिया मोहन | Updated on: 29 January 2016, 16:10 IST
QUICK PILL
हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या के दस दिन बाद दो फैक्ट फाइंडिंग मिशन इस बात की जांच कर रहे थे ताकि पता लगाया जा सके कि आखिर गलती कहां हुई है, क्यों एक युवा छात्र को आत्महत्या का रास्ता चुनना पड़ा. मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने पिछले सप्ताह दो सदस्यीय फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाई थी. इस टीम की जांच में मुख्य रूप से दो बातें सामने आईं-पहली बात यह कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय के पत्र से किसी तरह का दबाव नहीं बना था रोहित पर.
दूसरी बात रिपोर्ट में पता चली कि छात्र के लिए बनी ग्रीवांस रिड्रेसल बॉडी की निष्क्रियता दरअसल \"सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के छात्रों में भेदभाव की भावना को बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है.इन निष्कर्षों से असहमत ज्वाइंट एक्शन कमेटी फॉर सोशल जस्टिस ने भी इंडियन पीपल्स ट्रिब्यूनल से रोहित वेमुला की मौत की जांच के लिए एक अलग फैक्ट फाइंडिंग टीम भेजने का अनुरोध किया. न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) सुरेश एच, सीबीसी फेडरेशन के अध्यक्ष यूएस राव, शोधकर्ता मीना मेनन, वरिष्ठ अधिवक्ता गायत्री सिंह और प्रोफेसर सुजाता सुरेपल्ली के एक दल ने 25-26 जनवरी को हैदराबाद विश्वविद्यालय का दौरा किया और छात्रों, शिक्षकों, अधिकारियों और रोहित वेमुला के मित्रों परिजनों से मुलाकात की. इन फाइंडिंग्स के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए कैच ने कमेटी की एक सदस्य सुजाता सुरेपल्ली से बात की. सुरेपल्ली करीमनगर स्थित सातवाहन विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र की प्रोफेसर हैं.

आपकी फैक्ट फाइंडिंग कमेटी द्वारा मीडिया को दी गई जानकारी में कहा गया है कि रोहित मौत विश्वविद्यालय प्रशासन की लापरवाही और पक्षपात के कारण हुई है. थोड़ा विस्तार से इसे समझाएंगी?

हम यह कहना चाहते थे कि विश्वविद्यालय के अधिकारियों को जो करना चाहिए था उन्होंने नहीं किया और गलत तरीके से अपनी खामियों को उचित ठहराया. उन्होंने जो भी किया वह हर स्तर पर असंवैधानिक था.

रोहित वेमुला और आंबेडकर छात्र संघ (एएसए) के अन्य सदस्यों को किस तरह से सामाजिक रूप से बहिष्कृत किया गया? क्या आप हमें इस बारे में और अधिक जानकारी दे सकती हैं?

सजा के बाद, इस पूरे समूह को उनके छात्रावास से भी बाहर निकाल दिया गया जबकि उनका कोर्स अभी पूरा नहीं हुआ था. उन्हें हर तरह की गतिविधियों से प्रतिबंधधित कर दिया गया. सार्वजनिक स्थानों पर जानें, विश्वविद्यालय की गतिविधियों या चुनाव में हिस्सा लेने से उन्हें रोक दिया गया. सिर्फ लाइब्रेरी या सेमिनार में हिस्सा लेने की छूट थी उन्हें.

सजा का एक पक्ष यह भी था कि उन्हें किसी भी विचारधारा से जुड़ने या कोई वैचारिक समूह का गठन करने से भी रोक दिया गया था. यह पूरी तरह से असंवैधानिक सजा थी. हमारे सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी भी प्रकार की विचारधारा में विश्वास करने के लिए किसी नागरिक को दंडित नहीं किया जा सकता. यह संविधान के अंतर्गत संगठन के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है.

इसके अलावा कोई ग्रीवांस रिड्रेसल तंत्र न होने के कारण उनके सामने हालात और खराब हो गए. जब रोहित और उसके दोस्तों ने अपनी स्थिति का वर्णन करते हुए कुलपति को पत्र लिखा तो उन्होंने इसे जवाब देने लायक भी नहीं समझा.

वास्तव में उसका पहला पत्र ही पहला सुइसाइड नोट था, जिसमें उसने सभी दलित छात्रों को खुद को फांसी के फंदे पर लटकाने के लिए पूछा था. इस पर अधिकारियों की ओर से कोई जवाब नहीं आया. इस पर उसने अपमानित और अलग-थलग महसूस किया. उसके सामने ऐसी स्थितियां पैदा हो गईंं कि उसे लगा कि सभी दरवाजे बंद होते जा रहे हैं, उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं है.

क्या छात्रोंं का नेतृत्व करने के कारण उसका स्कॉलरशिप रोकी गई?

यह विश्वविद्यालय की ओर से की गई केवल एक सुनियोजित देरी थी. ऐसा तमाम छात्रों के साथ होता है.

तो आपके मुताबिक यह कोई भेदभाव नहीं था. क्या दूसरे गैर-दलित छात्रों के साथ भी ऐसी ही गंभीर स्थिति होती है?

हां, अन्य छात्रों के साथ भी ऐसी गंभीर परिस्थिति होती है. उस दौरान छात्र अपने परिवार और दोस्तों से पैसे लेकर काम चलाते हैं. नरेंद्र मोदीजी स्टार्ट अप इंडिया की बात करते हैं लेकिन समस्या यह है कि हमारे विश्वविद्यालयों के पास छात्रों को स्कॉलरशिप देने के लिए पैसे नहीं है. छात्र और किसान आत्महत्या कर रहे हैं. यह हमारी सरकार के प्राथमिकताओं में नहीं है.

आपने जिक्र किया है कि अधिकारियों ने बेसिक प्रोटोकॉल का पालन करने से इंकार कर दिया?

कार्यकारी परिषद ने छात्रों को निलंबित करने का फैसला बिना उचित जांच के लिया. पहले के कुलपति ने नए सिरे से जांच की मांग करते हुए निलंबन रद्द कर दिया था. पहली जांच रिपोर्ट को खारिज कर दिया गया था लेकिन दोबारा निलंबन के लिए उसी जांच रिपोर्ट को आधार बनाया गया.

क्या जांच समिति दिखावा थी. इस समिति के बारे में क्या कहना है? और उन्होंने क्या किया?

यह अभी तक स्पष्ट नहीं है मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा लिखे गए पत्रों का निलंबन से क्या रिश्ता है. अगर पत्र सिर्फ विश्वविद्यालय से कार्रवाई के बारे में पूछ रहा था तो स्मृति ईरानी को कैसे दोष दिया जा सकता है?

सबसे पहले, जब तक कोई गंभीर मामला सामने ना आए तो सरकार किसी स्वायत्त संस्था के मामले में हस्तक्षेप नहीं करती है.

दूसरी बात, जिस पत्र में एएसए के लिए 'राष्ट्रविरोधी' शब्द का उपयोग किया गया वह एक गंभीर अपराध है. आप कैसे बिना साक्ष्य के शिक्षित स्कॉलरों को राष्ट्रविरोधी ठहरा सकते हैं?

बंडारू दत्तात्रेय ने किस आधार पर एचआरडी के समक्ष शिकायत दर्ज की? सिर्फ इसलिए कि वह एएसए के पक्ष में नहीं थे? अपने पूर्वाग्रह के आधार पर किसी समूह को निलंबित करना असंवैधानिक है.

आखिर क्यों वीसी ने इस मामले में कोई कमेटी नहीं बनाई, सभी तथ्यों को जुटाया जाता और टीचरों के साथ मिलकर लोकतांत्रिक तरीके से इस मसले को सुलझाने के लिए कदम उठाया जाता. लेकिन वीसी ने इसके उलट केंद्र सरकार के दबाव में आकर छात्रों के निलंबन का फैसला ले लिया.

मानव संसाधन मंत्रालय ने जब यूनिवर्सिटी को इस मामले में एक्शन के लिए चिट्ठी लिखी तो इसमें मंत्रालय के सचिव दखल दे रहे थे और जब इस मामले में जांच कमेटी बनी तो इसके लिए कार्यालय के सचिव को भेजा गया. हम स्मृति ईरानी के इस अंतर को स्वीकार नहीं कर सकते.

आपकी प्रारंभिक जांच में पाया गया कि हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में सुधार के लिए कोई उपाय नहीं किए गए. जबकि यहां जातिगत भेदभाव चरम पर था.

यहां एंटी रैगिंग कमेटी को विशेष फंड की व्यवस्था की गई थी ताकि इस तरह के मामले में सुधार लाया जा सके. इसके लिए एक अनुशासन कमेटी बनाई गई है, लेकिन यह कमेटी प्रभावी नहीं है. लेकिन उच्च शिक्षा के मामले में जाति को मुद्दा बनाकर कानून के दायरे में नहीं लाया जा सकता है. 

इस केंद्रीय विश्वविद्यालय में ज्यादातर शिक्षक और प्रशासनिक अधिकारी ऊंची जाति से ताल्लुक रखते हैं. यहां तक कि दलित छात्रों को पीएचडी में बड़ी मुश्किल से गाइड मिलते हैं. इतना ही नहीं परीक्षा में मिलने वाले नंबरों में भी इस तरह का भेदभाव किया जाता है. जब अनुसूचित जाति के शिक्षकों ने इस मामले में अपना विरोध दर्ज कराया तो उन्हें धमकी दी गई कि उनका स्थानांतरण कर दिया जाएगा. इसलिए लोग इस तरह के भेदभाव को सहने के लिए मजबूर हैं.  

क्या रोहित को लेकर जो कानून बनाने की बात हो रही है, वह सही मायने में इस तरह की घटनाओं को रोकने में कारगर होगी?

रोहित के नाम पर कानून बनाने की मांग रोहित की मां ने की है. उन्होंने कहा है कि जिस तरह से निर्भया के नाम पर रेप के मामले में कानून बना है, उसी तरह रोहित के नाम से इस तरह का कानून बने. जिससे उनके बच्चे की तरह विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्र इस कानून का लाभ उठा सकें. 

रोहित एक्ट का उद्देश्य है कि विश्वविद्यालय मेें एक कमेटी के जरिये जातिगत भेदभाव को रोका जा सके. इस कमेटी के सामने छात्र अपनी बात रख सकेंगे और इस तरह की शिकायतों के आधार पर कोर्ट सजा भी सुना सकती है. 

वर्तमान में अनुसूचित जाति/जनजाति एक्ट में पिछड़ी जातियों की सुरक्षा और बचाव के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं हैं. आने वाले समय में रोहित एक्ट उच्च शिक्षा के क्षेत्र में इस तरह की घटनाओं को रोकने में काफी मददगार साबित होगी.

First published: 29 January 2016, 16:10 IST
 
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