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सुप्रीम कोर्ट और मेडिकल काउंसिल की लड़ाई में छात्रों का सबसे ज्यादा नुकसान

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 20 August 2016, 7:45 IST

सुप्रीम कोर्ट और मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया (एमसीआई) की लड़ाई में सबसे ज्यादा नुकसान छात्रों का हुआ है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा एमसीआई के काम करने के तरीकों पर नजर रखने वाली गठित निगरानी समिति ने एमसीआई के एक फैसले को पलट दिया है. निगरानी समिति ने पूरे देश में 26 नए स्थापित मेडिकल कालेजों को अकादमिक कोर्सेस पढ़ाने की अनुमति दे दी है. इन सभी को एमसीआई ने अनुमति देने से इनकार कर दिया था.

एमसीआई ने फैकल्टी और अन्य ढांचागत सुविधाओं के अभाव में 86 कालेजों को पढ़ाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था. निगरानी समिति ने अपना निर्णय 14 अगस्त को लिया. इस निर्णय से एमसीआई के पदाधिकारियों में असंतोष है. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा की अगुवाई वाली निगरानी समिति को एमसीआई के काम करने के तरीकों की निगरानी करने को कहा गया था. 

निगरानी समिति ने उन 86 कॉलेजों में से 26 को अपनी अनुमति दे दी है. ये 26 कॉलेज अब विभिन्न कोर्सेस के लिए नामांकन प्रक्रिया शुरू कर सकेंगे. समिति में जस्टिस लोढ़ा, पूर्व महानियंत्रक और लेखा परीक्षक विनोद राय और लीवर विशेषज्ञ डॉक्टर एसके सरीन शामिल हैं.

इसके अलावा मेडिकल रिफॉर्म्स के लिए प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त पैनल ने एमसीआई की जगह नया नियामक लाए जाने की भी सिफारिश की है जिसे नेशनल मेडिकल कमीशन कहा जाएगा. प्रारूप मसौदे पर जनता से उनकी प्रतिक्रियाएं भी मांगी गई है.

लोढ़ा समिति ने हालांकि यह अनुमति सशर्त दी है. समिति ने यह लिखा है कि वह इस मुद्दे को पुनः देखेगी, कालेजों का खुद मुआयना करेगी और अपने रुख को बदल भी सकती है.

उतार-चढ़ाव का वहन

हालांकि, ये 26 संस्थान एमसीआई के ही निगरानी में रहेंगे. 30 सितंबर को जब नया सत्र शुरू होगा, वे सुविधाओं में कोई कमी नहीं रखेंगे और उनमें से प्रत्येक को दो करोड़ रुपये की बैंक गारंटी देनी होगी. इन कालेजों के निरीक्षण की जिम्मेदारी एमसीआई की होगी. हालांकि, इस साल इन 26 कालेजों में नामांकन लेने वाले नए छात्रों को सभी तरह के उतार-चढ़ाव सहन करने होंगे. यदि सुप्रीम कोर्ट एमसीआई के रुख को बदलने का निश्चय करता है तो उन नामांकित छात्रों को वह डिग्री मिलेगी जिसे एमसीआई ने अनुपयुक्त पाया था. इससे तो सैकड़ों छात्र उलझन पड़ जाएंगे.

तीन सदस्यों वाली इस समिति ने कालेजों से यह भी कहा है कि वे यह उत्तरदायित्व लेने वाला हलफनामा पेश करें कि वे वह सभी नियमों और नियामकों का अनुपालन करेंगे जिसे एमसीआई नया सत्र शुरू होने पर समय-समय पर जारी करता है.

समिति ने यह भी कहा है कि नया सत्र शुरू होने के पहले, वह सभी कॉलेजों का एक बार फिर मुआयना करेगा. और यदि कोई गड़बड़ी पाई जाती है तो वह छात्रों को प्रवेश देने की अनुमति को वापस भी ले लेगा.

कैच ने इन सूचीबद्ध कालेजों से संपर्क करने की कोशिश की. इनमें एनआईएमआरए इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, आंध्र प्रदेश, हरियाणा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड हॉस्पिटल (एचआईएमएस), कैथल, केरल मेडिकल कॉलेज, एनसी मेडिकल कॉलेज, पानीपत (हरियाणा) और सरस्वती मेडिकल कॉलेज, उत्तर प्रदेश शामिल हैं.

इनमें से अधिकांश कॉलेजों, जिनमें आंध्र का एनआईएमआरए और केरल मेडिकल कॉलेज भी शामिल है, के मैनेजमेंट ने कोई भी प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया. वहीं कुछ कॉलेजो ने कहा कि वे कभी भी निरीक्षण के लिए तैयार हैं. जो कुछ सुविधाएं जरूरी होती है, वे सभी उनके पास हैं.

सुविधाओं का अभाव

पूर्व में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कुछ कॉलेजों में फैकल्टी और ढांचागत सुविधाएं न होने का संज्ञान लिया था और तभी एमसीआई ने आगे आकर इस पर आगे बढ़ने का निश्चय किया. उदाहरण के लिए, हरियाणा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड हॉस्पिटल (एचआईएमएस), कैथल का मामला सामने हैं. स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस पर पहले से ही प्रतिबंध लगा दिया था और 2015-16 के सत्र में छात्रों को प्रवेश देने की अनुमित देने से इनकार कर दिया था.

केरल का परपल्ली मेडिकल कॉलेज भी संकट में पड़ गया था. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्य सरकार की मान्यता देने वाले आवेदन पर अनुमति देने से मना कर दिया था. इसकी वजह यह थी कि कॉलेज एमसीआई द्वारा निर्धारित अनिवार्य ढांचागत और फैकल्टी सुविधाएं को पूरा करने में विफल रहा था.

और विवाद बढ़ा...

स्वास्थ्य मंत्रालय के इस कदम के बाद केरल के कोल्लम जिले के सांसद एन के प्रेमचंद्रन ने एक याचिका दाखिल की. इस विवाद को लोढ़ा समिति ने भी संज्ञान में लिया.

सांसद ने खुले तौर पर क्षेत्रीय मीडिया में आरोप लगाया कि कुछ अधिकारी यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं कि कॉलेज नहीं चले क्योंकि उनके कुछ निहितार्थ हैं. एमसीआई के प्रतिबंध के चलते बिहार में भी 250 सीटों के कम होने का अनुमान है.

कुछ कॉलेजों पर प्रतिबंध लगाने का एमसीआई का यह समय भी सवालों के घेरे में है. इससे सैकड़ों छात्रों का भविष्य भी अनिश्चय में पड़ गया है. वे यह सोच रहे हैं कि उनकी कॉलेज की डिग्री का क्या होगा.

उदाहरण के लिए अक्टूबर 2015 में एमसीआई ने बेंगलुरू के श्रीदेवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च सेन्टर के एमबीबीएस कोर्स को अप्रूवल देने से मना कर दिया था. ऐसे में 150 छात्रों की कक्षाओं पर पहले ही अंधकार छा गया. हालांकि, बाद में कर्नाटक हाईकोर्ट के दखल पर छात्रों को प्रवेश की अनुमति दी गई. हाईकोर्ट ने एमसीआई के निर्णय पर अस्थाई स्थगन दिया था.

एमसीआई के अनुसार वह साल में एकबार हर मान्यताप्राप्त मेडिकल कॉलेज का मुआयना करता है. आश्चर्यजनक तो यह है कि एमसीआई खुद भी संकट में है. मेडिकल रिफॉर्म्स पर प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त पैनल एमसीआई का ढांचा बदलने पर विचार कर रहा है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित पैनल ने भी एमसीआई पर लग रहे भ्रष्टाचार आरोपों पर संज्ञान लिया है.

ऐसे में जबकि न्यायपालिका, एमसीआई और स्वास्थ्य मंत्रालय अकादमिक कोर्सेस को अप्रूवल देने के प्रयास में हैं और कोर्सेस को चलाने के लिए कॉलेजों में फैकल्टी और ढ़ांचागत सुविधाओं का पैमाना बनाने की कोशिश में है, तो दूसरी ओर छात्र फंसे हुए हैं. छात्रों को बाहर निकलने का कोई आसान रास्ता नहीं दिखाई दे रहा है. 

First published: 20 August 2016, 7:45 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

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