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सुभाष वेलिंगकर और हार्दिक पटेलः शिवसेना को मिला भाजपा पर हावी होने का मौका

अश्विन अघोर | Updated on: 18 September 2016, 7:52 IST

लगभग एक दशक पुराने गठबंधन में वरिष्ठ की पदवी पाती रही शिवसेना महाराष्ट्र में 2014 में भाजपा को झटका देते हुए उससे अलग हो गई. इसी कड़ी में पार्टी ने तय किया है कि वह गोवा, गुजरात, और उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव अपने गठबंधन सहयोगी के खिलाफ लड़ेगी.

भाजपा के लिए मुश्किलें बढ़ाते हुए सेना ने गोवा में पूर्व संघ प्रमुख सुभाष वेलिंगकर के साथ हाथ मिला लिया है, जो विधानसभा चुनाव में पार्टी की ‘मदद’ करेंगेे. उधर गुजरात में सेना पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल में अपना सहारा ढूंढ रही है. दरअसल सेना इन राजनीतिक घटनाक्रमों से इस कदर उत्साहित है कि इनमे से कुछ ने गुजरात में हार्दिक के साथ गठबंधन करने की घोषणा तक कर दी, जिससे पटेल ने इनकार कर दिया.

हार्दिक पटेल का साथ भले ही न मिला हो लेकिन सेना किसी तरह वेलिंगकर को अपने साथ मिलाने में कामयाब रही. वेलिंगकर ने गोवा में मराठी और कोंकणी भाषी स्कूलों में सहायता के मुद्दे पर भाजपा से टक्कर ले ली है और उसे अगले विधानसभ में हराने का संकल्प लिया है.

आरएसएस के 90 सााल के इतिहास में पहली बार बगावत करने वाले इसके कार्यकर्ता वेलिंगकर को इस अनुशासनहीनता के लिए संघ से बर्खास्त कर दिया गया है. कार्रवाई के तुरंत बाद ही उन्होंने अपना अलग संघ बनाने की घोषणा कर दी.

सेना का पूरा ध्यान हार्दिक पर केंद्रित

सेना ने मौका देख कर वेलिंगकर को अपने साथ शामिल करने के लिए वरिष्ठ नेता संजय राउत को पणजी भेजा. और कुछ बातचीत के बाद राउत उन्हें मनाने में सफल रहे.

उसके बाद सेना का सारा ध्यान गुजरात, खास तौर पर हार्दिक पर केंद्रित हो गया. हार्दिक के नेतृत्व में पटेल आरक्षण आंदोलन ने भाजपा नेताओं की रातों की नींद हराम कर दी थी. सेना के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, पार्टी ने पाटीदारों के बीच पनपी इस भाजपा रोधी लहर का फायदा उठाने का निर्णय किया और हार्दिक के साथ बातचीत शुरू कर दी.

इस बात की पुष्टि के लिए जब सेना की प्रवक्ता मनीषा कायंदे से बात की गई तो उन्होंने कहा, ‘देश के किसी भी राज्य में अगर पार्टी अपना विस्तार कर रही है तो इसमें कुछ गलत नहीं है. हम एक स्वतंत्र राजनीतिक दल हैं और भाजपा के साथ अपने गठबंधन के बावजूद किसी भी राज्य में हमें पार्टी के विस्तार का अधिकार है. हमने बिहार विधानसभा चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारे और हमारे उम्मीदवारों को दो लाख से अधिक वोट मिले. यह इस बात का संकेत है कि शिवसेना दूसरे राज्यों में भी लोकप्रिय हो रही है. इसीलिए हमने गुजरात, गोवा और उत्तर प्रदेश में चुनावी समर में कूदने का निर्णय किया है.’

अपने गठबंधन सहयोगी के हार्दिक से हाथ मिलाने की खबरों से जाहिर है भाजपा नेताओं के होश उड़ा दिए हैं, भले ही वे इसे सार्वजनिक तौर पर स्वीकार न करें. इस संबंध में महाराष्ट्र में पार्टी के प्रवक्ता माधव भण्डारी ने कहा, ‘गोवा और गुजरात के मामलों पर पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व ही निर्णय लेगा.’

राजनीति में नहीं जाना चाहते हार्दिक

इतने सबके बावजूद हार्दिक ने सेना के साथ किसी तरह के समझौते से इनकार किया है. वे कहते हैं- ‘मेरा राजनीति में शामिल होने का कोई इरादा नहीं है. समाज सेवा और ग्रामीणों का उत्थान ही मेरा उद्देश्य है. मैं राजनीति मेें प्रवेश नहीं करूंगा.’

जब उनसे पूछा गया कि क्या वे सेना के साथ वार्ता कर रहे हैं तो उन्होंने कहा, ‘नहीं शिवसेना से किसी ने मुझसे सम्पर्क नहीं किया. शिवसेना को छोड़ो, मैं किसी राजीतिक दल के सम्पर्क में नहीं हूं. चूंकि मेरी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है; इसलिए किसी चुनाव में किसी राजनीतिक दल के साथ गठबंधन या समर्थन का कोई सवाल नहीं उठता.’

अब सवाल उठता है कि क्या सेना हार्दिक से हाथ मिलाने का शिगूफा छोड़ भाजपा नेताओं को बेचैन करना चाहती थी? भाजपा की गोवा इकाई के एक वरिष्ठ कहते हैं, ‘न तो हार्दिक न ही वेलिंगकर किसी भी तरह पार्टी का नुकसान कर पाएंगें. अगर शिवसेना को लगता है कि वेलिंगकर से हाथ मिला लेना उनके लिए बड़ी उपलब्धि है तो वह पूरी तरह गलत है. आरएसएस ऐसा संगठन है जो किसी कीमत पर ऐसी अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं करता जो कि वेंलिंगकर ने दिखाई. आरएसएस ऐसा सख्त संगठन है जिसने इसकी लीक से हटने पर जन संघ के राष्ट्रीय प्रमुख बलराज मधोक तक को नहीं बख्शा था. इसलिए अगर वेलिंगकर की कीमत पर संघ-भाजपा गोवा में सत्ता में नहीं भी लौटती हैं तो कोई बात नहीं.

First published: 18 September 2016, 7:52 IST
 
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