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भाजपा के भस्मासुर सुब्रमण्यम स्वामी

नीरज ठाकुर | Updated on: 27 June 2016, 7:32 IST

पहले वे आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन के पीछे पड़े. उस वक्त भाजपा समर्थित बुद्धिजीवी वर्ग चुप्पी साधे रहा. उसके बाद मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम उनके निशाने पर आ गए. एक बार फिर वित्त मंत्री अरूण जेटली के अलावा हर कोई चुप है. इसके बाद स्वामी का अगला निशाना बने हैं आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांत दास.

ऐसे आसार कम ही हैं कि इस बार भी कोई बोलेगा. कोई नहीं जानता कि स्वामी का अगला निशाना कौन होगा. सुब्रमण्यम स्वामी सही मायनों में भाजपा के लिए भस्मासुर साबित हो रहे हैं. अब उन्होंने टाई-कोट पहनने वालों को वेटर की संज्ञा दी है और अनुशासन तोड़ने पर खून खराबे की चेतावनी भी जारी की है. स्पष्ट रूप से यो दोनों हमले वित्तमंत्री अरुण जेटली पर हैं. जिनकी हाल ही में एक कॉन्फ्रेंस के दौरान टाई-कोट पहने फोटो आई है.

कौन था भस्मासुर?

हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार, भस्मासुर एक राक्षस था, जो भगवान शिव का भक्त था. उसकी भक्ति और तप से प्रसन्न हो कर भगवान शिव ने उसे एक वरदान दिया. पहले तो भस्मासुर ने अमरता का वर मांगा. इस पर शिव जी ने कहा कि उनके पास उसे यह वरदान देने का अधिकार नहीं है. 

तब भस्मासुर ने ऐसा वर मांगा कि वह जिस किसी के सिर पर हाथ रखे, वह देखते ही देखते भस्म हो जाए. शिवजी ने उसे यह वर दे दिया. इसके बाद वह तुरंत शिवजी के सिर पर ही हाथ रखने के लिए लपका.

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कहा जाता है कि वह शिवजी की पत्नी पार्वती की ओर आकर्षित था. एक कथा कहती है कि वह अपने वर का सबसे पहले शिवजी पर प्रयोग करना चाहता था. बहरहाल शिवजी भगे और भगवान विष्णु के पास पहुंच गए. विष्णुजी ने एक युक्ति निकाली. 

वो एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर भस्मासुर के सामने प्रकट हुए. भस्मासुर को उस महिला से प्रेम हो गया. मोहिनी ने भस्मासुर से कहा, अगर वह उसकी तरह भाव भंगिमाएं बना कर नृत्य करे तो वह भस्मासुर के साथ विवाह कर लेगी. इसी दौरान मोहिनी की नकल करते हुए भस्मासुर ने अपने ही सिर पर हाथ रख लिया और वह वहीं जल कर भस्म हो गया.

फायर ब्रांड स्वामी

कुछ समय पहले तक स्वामी के आग उगलते बयान भाजपा के लिए एक तोप के समान थे जिसका मुंह उसने कांग्रेस की ओर कर रखा था. टेलीविजन पर बहस हो, ट्विटर या कोर्ट; स्वामी ने लगातार सोनिया गांधी,राहुल गांधी और पी चिदम्बरम को हर जगह घेरा.

लेकिन अब लगता है स्वामी ने इस जुबानी तोप का मुंह मोड़ कर अपनी पार्टी की तरफ कर लिया है. अब इसका निशाना सरकार के ही बुद्धिजीवी और नेता बना रहे हैं. अगर स्वामी के ट्विटर संदेशों को सही माना जाए तो फिलहाल एनडीए सरकार के 27 और अधिकारी स्वामी के निषाने पर हैं, जिन्हें ‘ठीक किए जाने’ की जरूरत है.

स्वामी ने हार्वर्ड से पीएचडी की है और 1960 के दशक में एक अमेरिकी विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र भी पढ़ाया है

स्वामी हर एक को साजिशकर्ता साबित करना चाहते हैं. विदेशों से लौटे अर्थशास्त्री से लेकर राजनेता और अन्य क्षेत्रों के विशेषज्ञों पर स्वामी का जुबानी हमला ऐसा माहौल बना रहा है कि जो लोग विदेशों में रहे हैं या वहां से काम करके लौटे हैं, उन पर यह भरोसा नहीं किया जा सकता कि वे भारत के विकास के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह सही तरीके से कर सकेंगे.

सबसे पहले स्वामी ने कांग्रेस अध्यक्ष सानिया गांधी को इटलीवासी बता कर इसकी शुरुआत की थी. उसके बाद उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता और भारत रत्न अमर्त्य सेन पर निशाना साधा. 

सेन, जिनके पास भारतीय पासपोर्ट है, के लिए स्वामी ने कहा, वे ‘सही मायनों में भारतीय नहीं हैं, क्योंकि उन्होंने विदेशी यूनिवर्सिटी में पढ़ाया है. मजेदार बात यह है कि स्वामी ने खुद हार्वर्ड से पीएचडी की है और 1960 के दशक में एक नामी अमेरिकी विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र भी पढ़ाया है.

स्वामी की स्वदेशी सोच

अगर स्वामी की स्वदेशी की यह नई अवधारणा जनमानस में घर कर जाती है तो कोई भी व्यक्ति जो किसी भी तरह के अनुसंधान या अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष व विश्व बैंक जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम करके आए हों, वह कभी लौट कर भारत के नीति निर्धारण क्षेत्र में काम नहीं कर सकते.

जरा याद कीजिए दुनिया के किसी भी देश में पहुंचने पर अप्रवासी भारतीयों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का किस प्रकार जबर्दस्त स्वागत किया है. स्वामी के अनुसार ये अप्रवासी भारतीय मात्र चीयर लीडर्स हो सकते हैं लेकिन स्वदेश लौट कर कभी देश सेवा नहीं कर सकते. 

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शायद यह स्वदेशी की स्वामी की नई अवधारणा है. एक ओर भारत अर्थव्यवस्था में विदेशी निवेश के लिए दरवाजे खोल रहा है तो क्या वह उन भारतीयों का बहिष्कार करे जो विश्व अर्थव्यवस्था के बारे में जानने समझने के लिए विदेश जाते हैं.

वित्त मंत्रालय के लिए कोशिश

स्वामी की आवाज पिछले दो माह की बजाय अधिक मुखर हो गई है. वे अब भाजपा द्वारा राज्यसभा के मनोनीत सदस्य है और जब भी संसद में या उसके बाहर बोलेंगे तो दुनिया भर के लोग उन्हें देखेंगे सुनेंगे. सूत्रों के अनुसार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने स्वामी को यह जिम्मेदारी दी है कि वे एनडीए के मंत्रियों के पर कतरें.

कुछ लोगों का कहना है कि वे यह सब करके बदले में सरकार से कोई सौदेबाजी करना चाहते हैं. आखिरकार सब जानते हैं, जब से एनडीए सत्ता में आई है, स्वामी की निगाह वित्त मंत्रालय की कुर्सी पर है. 

ध्यान दीजिए मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों पर लगाए जाने वाले स्वामी के गंभीर आरोप इस दिशा में उनके इरादों को स्पष्ट करते हैं. परन्तु सवाल उठता है कि क्या स्वामी की आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए प्रधानमंत्री जेटली की बलि दे देंगे.

कौन बनना चाहता है मोहिनी?

पिछले कई महीनों से भाजपा मंत्रिमंडल में बदलाव को टाल रही है? क्योंकि वह यह सुनिश्चित करना चाहती है कि उसके इस कदम से मंत्रियों का मनोबल न गिरे. परन्तु मंत्री अपने मुख्य अधिकारियों के साथ रणनीति बनाते हैं और अब यह अधिकारी वर्ग ही असुरक्षा का शिकार हो रहा है.

आरएसएस के लिए यह अच्छी खबर हो सकती है, जो भाजपा सरकार की नीतियों पर अपनी पकड़ मजबूत बना कर रखना चाहता है. परन्तु जो सरकार पिछले दो साल में अर्थव्यवस्था संबंधी गतिविधियां दुरूस्त नहीं कर पाई और इसके मुख्य रणनीतिकार खुद के विदेेशी पहचान और पिछली सरकार से संबंधों के कारण असुरक्षित महसूस कर रहे हों तो यह अच्छा संकेत नहीं है. 

एक सवाल यह उठता है कि अगर स्वामी भाजपा के भस्मासुर हैं तो मोहिनी कौन बनेगा, जो इन अधिकारियों को बचा सके?

First published: 27 June 2016, 7:32 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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