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सुब्रमण्यम स्वामी का जो स्वभाव है उसके मद्देनजर अगला निशाना मोदी भी हो सकते है

कैच ब्यूरो | Updated on: 28 June 2016, 14:44 IST
(पीटीआई)

"जेटलीजी क्‍या बोले, क्‍या नहीं बोले इससे मुझे क्‍या लेना-देना. जब मुझे जरूरत होती है तब मैं प्रधानमंत्री और पार्टी अध्‍यक्ष (अमित शाह) से बात करता हूं..." ये लाइन दो दिनों पहले बीजेपी नेता और राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने कही थी.

भारतीय राजनीति की अबूझ पहेली कहे जाने वाले स्वामी के दोस्त और दुश्मन सभी पार्टियों में हैं. उनके शिकार हुए लोग भी लगभग हर जगह मौजूद हैं. शुरू से विद्रोही स्वभाव के रहे स्वामी का टकराव राजनीति में स्थापित लोगों के साथ हमेशा रहा है. वित्त मंत्री अरुण जेटली से पहले स्वामी सोनिया गांधी, राहुल गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम, तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े से सीधा टकराव कर चुके हैं. अक्सर उनके हाथ सफलता भी लगी है.

पिछले कुछ दिनों से स्वामी वित्त मंत्री, आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन, मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम और आर्थिक मामलों के सचिव शशिकांत दास पर निशाना साध रहे थे. विपक्ष यह आरोप लगा रहा था कि पीएम के इशारे पर ही स्वामी नौकरशाहों और नेताओं पर निशाना साध रहे हैं. इस बात को इससे भी बल मिल रहा था कि जब जब स्वामी हमले करते बचाव में सिर्फ जेटली ही सामने आते, बाकी पार्टी और सरकार ने चुप्पी साध रखी थी.

अगर कोई खुद को सिस्टम से ऊपर मानता है तो ये गलत है

कई मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार दरअसल स्वामी अप्रत्यक्ष रुप से जेटली से अपनी पुरानी खुन्नस निकाल रहे है. पिछले सप्ताह पहली बार स्वामी के बयानों से भारतीय जनता पार्टी ने किनारा कर लिया. वहीं अरुण जेटली ने अपने अधिकारियों का बचाव करते हुए कहा था कि राजनीतिज्ञों को सोच-समझकर बयान देना चाहिए.

अब सोमवार को पीएम मोदी ने पहली बार राजन-जेटली-स्वामी विवाद पर चुप्पी तोड़ते हुए स्वामी का नाम लिए बिना उन्हें नसीहत दी और रघुराम राजन का खुलकर बचाव किया. पीएम मोदी ने कहा, “आज जो लोग रघुराम राजन को लेकर विवाद कर रहे हैं, वे उनके साथ अन्याय कर रहे हैं. राजन की देशभक्ति किसी से कम नहीं है. मैं राजन को जितना जानता हूं उसके अनुसार वे किसी भी पद पर रहें, देश से प्यार करेंगे. मेरा अनुभव उनके साथ अच्छा रहा है. उन्होंने जो काम किया है, मैं उसकी सराहना करता हूं.”

राजन ग्रीन कार्ड होल्डर (अमेरिकी नागरिकता) हैं और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में काम कर चुके हैं. राजन को 'मानसिक तौर पर भारतीय' न होने की बात कहकर स्वामी अपने निशाने पर ले चुके हैं. अब पीएम मोदी ने साफ कह दिया कि राजन किसी से कम देशभक्त नहीं है. ये स्वामी के लिए बड़ा झटका है.

बीजेपी सूत्रों के अनुसार अरुण जेटली भी इस समय स्वामी से बेहद नाराज हैं और जल्द ही उनकी शिकायत पीएम मोदी से मिलकर करने वाले हैं. बताया जा रहा है कि स्वामी के बयानों से सरकार और पार्टी दोनों असहज है. इसीलिए स्थिति को संभालने के लिए खुद पीएम मोदी को सामने आना पड़ा.

टाइम्स नाउ चैनल पर दिए गए एक इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया कि आपके राज्यसभा सांसद ने रघुराम राजन के खिलाफ जो टिप्पणियां की हैं क्या वे उचित हैं? पीएम मोदी ने कहा, ''चाहे ये मेरी पार्टी में हो या नहीं, मेरा मानना है कि ये चीजें अनुचित हैं. प्रचार पाने की इस लालसा से कभी भी देश का भला नहीं होगा. लोगों को बहुत जिम्मेदारी के साथ व्यवहार करना चाहिए. अगर कोई खुद को सिस्टम से ऊपर मानता है तो ये गलत है.''

अरुण जेटली की नसीहत पर तो स्वामी ने कुछ घंटे में ट्वीट करके साफ कर दिया था कि वे चुप नहीं रहने वाले है और लगभग धमकाने वाले अंदाज में कहा, "मुझे अनुशासन में रहने की सलाह देने वालों को यह अंदाजा नहीं है कि अगर मैंने अनुशासन तोड़ा तो खून-खराबा हो जाएगा."

बीजेपी सूत्रों के अनुसार अरुण जेटली भी इस समय स्वामी से बेहद नाराज हैं

लेकिन पीएम मोदी की कड़ी सलाह पर वे अब तक चुप हैं. हालांकि, मंगलवार को स्वामी ने श्रीमदभगवद्गीता की राह पकड़ ली. उन्होंने ट्वीट किया,  "यह दुनिया एक संतुलम में बंधी हुई है. इसके घटकों में होने वाले छोटे-मोटे बदलाव भी इसके तुच्छ  जीवों पर बड़ा असर डालते हैं. इसलिए श्रीकृष्ण का उपदेश है सुख दुखे..."

स्वामी का जो स्वभाव रहा है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि अब यह मामला स्वामी बनाम जेटली से स्वामी बनाम मोदी का बन चुका है. जब स्वामी को राज्यसभा में भेजा गया तब कई लोगों का मानना था कि सरकार में जेटली पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से स्वामी को उच्च सदन भेजा गया है. हालांकि, पीएम मोदी के बयानों से साफ हो गया कि सरकार में जेटली की कितनी अहमियत है.

इसी बीच आपातकाल लगाए जाने के 41 साल पूरा होने को लेकर स्वामी का मुंबई में प्रस्तावित कार्यक्रम सोमवार को रद्द कर दिया गया. इस कार्यक्रम में महाराष्ट्र बीजेपी प्रमुख रावसाहेब दानवे और मुंबई के पार्टी प्रमुख आशीष शेलार भी आने वाले थे. जब आशीष शेलार से स्वामी के नहीं आने का कारण पूछा गया तो उन्होंने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया.

स्वामी को संघ परिवार और बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी का करीबी माना जाता है, लेकिन बीजेपी के अन्य नेताओं से उनकी नहीं बनती है. बताया जाता है कि 2005 में पार्टी की एक बैठक में आडवाणी ने जब स्वामी को पार्टी में लाने का विचार रखा था तो प्रमोद महाजन ने कहा था, "आडवाणी जी, पहले से क्या कम सुब्रमण्यम स्वामी पार्टी में हैं जो आप असली स्वामी को भी लाना चाहते हैं?”

स्वामी चुप रहने वाले व्यक्तियों में कभी नहीं रहे हैं. उनकी हर मुद्दे पर अपनी राय होती है. उनकी लोकप्रियता दक्षिणपंथी समूहों में गांधी परिवार के विरोध के चलते हमेशा बनी रहती है. राज्यसभा सांसद बनते ही संसद में गांधी परिवार पर हमला कर उन्होंने बीजेपी अपनी उपयोगिता भी सिद्ध की. लेकिन उसके बाद स्वामी पार्टी और सरकार को ही घेरने में लग गए. अब देखने वाली बात होगी कि पीएम मोदी के टिप्पणी के बाद स्वामी चुप रहते हैं या उनके खिलाफ भी मोर्चा खोल देंगे?

First published: 28 June 2016, 14:44 IST
 
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