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ज़िंदगीनामा: कामयाबी, शोहरत और दौलत से आगे की दुनिया

लमट र हसन | Updated on: 14 November 2016, 3:44 IST

ज़िंदगी बेहतर ढंग से जीने के क्या पैमाने हैं: दौलत, शोहरत, सत्ता या कद! इस दुनिया में रहते हुए इनमें से हमारे मन में क्या चीज हावी रहती है? साफ़तौर पर कोई नहीं. हमें सबसे अधिक पछतावा इस बात का रहता है कि अपने परिवार की खातिर मैं इतनी मेहनत क्यों करता हूं? अपनी सेहत की चिंता क्यों नहीं करता? मुझे अपनी जिंदगी अपने ढंग से जीने का साहस क्यों नहीं है? यह नामुमकिन है कि हम में से कोई मौत की दहलीज़ पर पहुंचने के बाद इस बात का अफसोस करेगा कि उसने ऑफिस में अधिक समय नहीं बिताया या और अधिक धन नहीं कमाया.

 वह क्या चीज़ है जिसे हम जिंदगी से चाहते हैं?

सोनिया गोलानी: इस शाश्वत पहेली को समझाने के लिए भारत की अमीरी और शोहरत की आम समझ पर चोट करते हुए सोनिया कहती हैं कि हैं कि ज़िंदगी का मकसद और मतलब क्या है? इसका जवाब उनकी चौथी किताब, 'व्हाट ऑफ्टर मनी एंड फेम' ( पेंगुइन ) में मिलता है. 

अजय पिरामल

अरबपति अजय पिरामल इस बारे में परिस्थितियों और जिंदगी के प्रति नजरिये पर ध्यान केन्द्रित करते हुए कहते हैं कि यह सब अस्थाई है. आज आप सफल हो सकते हैं और प्रसिद्ध भी लेकिन कल आपने गलती कर दी या अन्य किसी कारण से आपका व्यवसाय नहीं चला तो सब बर्बाद हो गया. कोई भी व्यक्ति सफलता के प्रति आश्वस्त नहीं हो सकता जबकि प्रसिद्धि दोधारी तलवार की तरह है. एक स्थिर चित्तवृत्ति वाला बनना होगा.

तो कितना धन पर्याप्त है?

'गरीब और अमीर की परिभाषा यह है कि कोई क्या चाहता है या किसी के पास कितना कम है? अगर आपकी जरूरतें बहुत ज्यादा हैं और आपके पास साधन नहीं हैं तो आप गरीब हैं. और अगर आपके पास बहुत कुछ है लेकिन आपकी जरूरतें इससे कम हैं तो आप अमीर हैं. उन्होंने कहा कि कोई धन को उसके न्यासी के रूप में देखता है और उसका इस्तेमाल सभी सहभागियों के हित में करता है. व्यवसाय का उद्देश्य पैसा कमाना और इसका इस्तेमाल अच्छे कामों में करना है. आप धन के बिना परोपकार नहीं कर सकते. वे बिल और मिलेंडा गेटस से प्रेरित हैं. पिरामल का कहना है कि दोनों ने बेहतर उदाहरण पेश करते हुए महान कार्य किया है.                                                     

अमित चन्द्रा

चन्द्रा विश्व की सबसे पुरानी और अग्रणी निजी परिसंपत्ति फर्म 'बेन कैपिटल' संभालते हैं. वे अपनी कुल आय का करीब 90 फीसदी हिस्सा सामाजिक कार्यों के लिए दान कर देते हैं. 48 वर्षीय अमित पत्नी अर्चना के साथ एक दशक से इस कठिन राह के गामी हैं. उनके लिए इस बड़े काम में पैसा, इज्जत और प्रसिद्धि सब कुछ है.

बावजूद इसके उन्हें लगता है कि वे अपनी जिंदगी में बहुत कुछ गंवा रहे हैं और यही भावना समय के साथ उन्हें और मजबूत बनाती है. इतने बड़े व्यवसाय, पद, महंगी कार, आलीशान घर और बैंक में खूब सारा पैसा होने के बावजूद जीवन उन्हें असहज लगता है. उनकी आत्म विश्लेषण यात्रा 2007 में शुरू हुई थी लेकिन अब भी उनके मन में यह सवाल कौंधता है कि 'वास्तव में कितना काफी है?'

कुछ साल बाद अपनी जरूरतों को समेटते हुए यह दंपत्ति एक वकील के पास गया और अपनी सारी संपत्ति दो हिस्सों में बांट दी. एक तो वह जो आमद बंद होने के बाद उन्हें संभालने के काम आएगी और भावी आय समेत शेष रकम दान कर देंगे. यह फैसला और इस पर अमल करना उनके लिए बड़ा उदारवादी अनुभव रहा. चंद्रा का मानना है कि अगर आप अपनी जरूरतें तय नहीं कर सकते तो सब कुछ कम ही लगेगा. एक बार उदार होकर देखो, इतना लचीलापन और खुलापन महसूस होगा जिसकी कभी कल्पना नहीं की होगी.

अनु आगा

अनु आगा की कहानी खास है. अन्य बातों के अलावा यह अरबपति सेंट्रो कार में चलती हैं. उसका कहना है कि  कार बड़ी हो या छोटी एक जगह से दूसरी जगह पर आने-जाने के काम ही आती है. पिछले 5-6 साल से मैं सैंट्रो कार चला रही हूं. वह अपना घर कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए खोल देना चाहती हैं और देश में असमानता कम करने की इच्छुक है.

एक महीने के अंतराल से पति और बेटे की मौत के बाद अनु ने ऐसा विश्वसनीय एनजीओ देखना शुरू किया जिसे वह अपना धन दान कर सकें. 25 साल की मामूली उम्र में मौत की नींद सो गया उसका बेटा कुरुष अपने आस-पास गरीबी देखकर बहुत संवेदनशील रहता था. वह अपनी 70 से 90 फीसदी तक आमदनी कल्याण कार्यों में दे देंगी.

हमारे लोगों के साथ कितना गलत हो रहा है और हम क्यों जोड़ते रहते हैं?

उन्होंने कहा कि आजादी के तुरंत बाद आदर्शवाद खत्म हो गया और 'इसमें मेरा क्या फायदा है' यह देखा जाने लगा. उनका मानना है कि लघुता और उपभोक्तावाद की भावना बढ़ी है. दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आपके पास पहले से भी ज्यादा होगा मगर कुछ देने लायक बनो.

अजीम प्रेमजी अनू के आदर्श हैं. उन्होंने कहा, 'वह अकेले ऐसे भारतीय हैं जिन्होंने ताउम्र अपने अधिकांश शेयर कल्याण कार्य में दे दिए. क्योंकि वे अन्य लोगों की तरह ढिंढोरा नहीं पीटते हैं इसलिए उनके योगदान को कमतर नहीं आंकना चाहिए. कितना पर्याप्त है? इसके जवाब में अनू का कहना है, यह महसूस किया जा सकता है कि भौतिक तौर पर पर्याप्त का मतलब बहुत कुछ नहीं है. 

जब तक आप अपनी जरूरतों को तय नहीं करेंगे तो आपकी अभिलाषाएं भी बढ़ती जाएंगी. लोगों के साथ सदभावनापूर्ण संबंध मायने रखते हैं और यही उसकी सफलता है'.

जावेद अख़्तर

जावेद अख़्तर लेखक और गीतकार के रूप में एक कामयाब इन्सान हैं. ऐसा इन्सान जो दशकों तक सफलता की सीढ़ियां चढ़ता गया और अब भी कामयाबी की ओर निरंतर अग्रसर है. उनके लिए दो तरह के लोग सफल होते हैं. एक तो वे जो सोचते हैं कि वे सफल हैं और दूसरे वे जिन्हें लोग सफल मानते हैं लेकिन यह मृग मरीचिका है. इसके साथ कदमताल करना कठिन है.

वो कहते हैं, 'मैं समझता हूं कि उपलब्धि से ज्यादा महत्वपूर्ण कोशिश है. अगर आपने लक्ष्य हासिल कर लिया तो समझो मेहनत पूरी हो गई. उनका यह भी यकीन है कि सफल इन्सान अपेक्षाकृत शांत नहीं रहते. यदि उनके अंत:करण में झांक कर देखें तो आप उन्हें पागल समझेंगे क्योंकि उनकी महत्वाकांक्षा कभी खत्म नहीं होती. उनकी सफलता की कहानी खुद अविश्वास को झुठलाती है'.

वे कहते हैं, 'कभी सोचता हूं कि मैं उस हॉल में बैठा हूं और स्टाफ के लोग मेरे लिए नाश्ता ला रहे हैं लेकिन मैं समुद्र की ओर देखते हुए यह महसूस करता हूं कि ये किसी और आदमी के साथ तो नहीं हो रहा'. और जब वे किसी पांच सितारा होटल में आराम कर रहे होते हैं तो सोचते हैं, 'तुम इतने बड़े बिस्तर पर अकेले लेटे हो, तुम्हें याद है वो...तीसरे दर्जे का डिब्बा, जब तुम भोपाल से आए थे और तुम्हारे पास बैठने व टांगें पसारने के लिए तक जगह नहीं थी. 

जावेद के लिए धन और कामयाबी दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं लेकिन वास्तव में कितना काफी है यह पूछने पर वे कहते हैं कि अधिकांश लोगों के लिए धन एक सह उत्पाद है. पैसे के लिए वे सब कुछ करते हैं लेकिन दूसरे पैसा कमाने का स्रोत बनते हैं. 

लोगों का पुराना स्वरूप समय के साथ छोटा होता जा रहा है. लेकिन वे अस्तित्व में बने हुए हैं. वे उन्हीं लोगों में से हैं जिनका मानव समाज को कुछ देने में यकीन है.

आदि गोदरेज

सौ साल से अधिक पुराने गोदरेज समूह के अध्यक्ष आदि गोदरेज कहते हैं कि उनकी संचालन शक्ति कभी धन कमाने की नहीं रही. मैंने अपना व्यवसाय आगे बढ़ाया जितना मैं आज भी कर सकता हूं. मेरे मन में विचार आता है कि हम कैसे आगे बढ़ते हैं? 

हमें इसके लिए क्या रणनीति अपनानी पड़ती है, आदि-आदि. व्यक्तिगत कोष या वित्त के लिए व्यवसाय एक अच्छा स्रोत नहीं है लेकिन व्यवसाय के लिए यह श्रेष्ठ साधन है. गोदरेज समूह परोपकार और निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व की पहल में अग्रणी है. उसे पता है कि आगे बढ़ने के लिए समूह को और सामाजिक सरोकार अपनाने होंगे. लोक कल्याण की दिशा में परोपकार पर उसका पूरा भरोसा है.

उनके लिए सफलता के क्या मायने हैं? पूछने पर आदि गोदरेज बोले, 'सफलता के लिए पहले तुम्हें अपनी जिंदगी में खुश रहना चाहिए. सप्ताहांत की बजाय सोमवार की सुबह का इंतजार होना चाहिए'.

First published: 14 November 2016, 3:44 IST
 
लमट र हसन @LamatAyub

Bats for the four-legged, can't stand most on two. Forced to venture into the world of homo sapiens to manage uninterrupted companionship of 16 cats, 2 dogs and counting... Can read books and paint pots and pay bills by being journalist.

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