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सुकमा हमला: डीआरजी की भूमिका जांच के दायरे में

राजकुमार सोनी | Updated on: 26 April 2017, 9:43 IST

बस्तर के सुकमा जिले में सीआरपीएफ जवानों पर दर्दनाक हमले के बाद केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि किसी भी सूरत में जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाने दिया जाएगा. उन्होंने कहा कि वामपंथी उग्रवादी देश के सबसे बड़े दुश्मन हैं, लेकिन पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका है इसलिए अब उनका अंत निकट है.


गृहमंत्री ने कहा कि वामपंथी उग्रवादियों के खिलाफ जो कार्रवाई चल रही है, समय-समय पर उसकी समीक्षा की जाती है लेकिन अब जरूरत इस बात की है कि रणनीति में थोड़ा बदलाव किया जाए. गृहमंत्री ने बताया कि माओवाद प्रभावित राज्यों की एक ज़रूरी बैठक अगले महीने 8 मई को दिल्ली में होगी जिसमें तय होगा कि वामपंथी उग्रवादियों के उन्मूलन के लिए कौन-सी योजना कारगर होगी.

सिंह ने रायपुर के माना स्थित चौथी बटालियन में शहीद जवानों को श्रद्धाजंलि अर्पित करने के बाद मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक की. गृहमंत्री ने दो टूक कहा कि वे हर हाल में जवानों का मनोबल ऊंचा देखना चाहते हैं, लेकिन यह कहने से काम नहीं चलेगा कि माओवादियों ने कायराना हरकत की है और चूक हो गई है. गृहमंत्री ने साफ कहा कि विकास के विरोधियों के साथ नरमी से पेश आना सबसे बड़ी भूल है, इसलिए सुकमा में सड़क भी बनाइए और वामपंथी उग्रवादियों से निपटने के लिए अभियान भी चलाते रहिए.

 

चाहिए ठोस रिपोर्ट

 

वैसे तो हर बड़ी माओवादी घटना के बाद सरकार कभी ज्वाइंट ऑपरेशन चलाने का दावा करती रही है तो कभी खुफिया तंत्र को मजबूत करके माओवादियों के उन्मूलन की बात कहती रही है. अधिकारियों ने बैठक में गृहमंत्री को बताया कि चिंतागुफा थाना क्षेत्र में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की 74वीं बटालियन की दो कपनियां बुरकापाल और चिंतागुफा के बीच बन रही सड़क की सुरक्षा के लिए रवाना की गई थी.


बुरकापाल गांव से लगभग डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर माओवादियों ने गोलीबारी शुरू कर दी तो सुरक्षाबलों ने भी जवाबी कार्रवाई की. गृहमंत्री ने कहा कि यह सब वे जानते हैं. अधिकारियों को चाहिए वे घटना स्थल का मुआयना करके ठोस रिपोर्ट दें. यह तो पता होना ही चाहिए कि बार-बार ऐसी घटनाएं क्यों होती है और इनसे कैसे निपटा जा सकता है? गृहमंत्री की सख्त हिदायत के बाद पुलिस के आला अफसर सुकमा रवाना हुए.

 

रणनीति

माओवादियों के खिलाफ आगे की रणनीति को लेकर पूछे गए सवाल पर गृहमंत्री ने कहा कि अगर रणनीति ही बता दी गई तो फिर वह रणनीति कैसी? लेकिन यह साफ है कि सुकमा से मिली रिपोर्ट और अन्य घटनाओं को आधार मानकर ही रणनीति तय होगी. उन्होंने कहा कि घटना सूचना तंत्र की विफलता का परिणाम है या कुछ और फिलहाल संकट की इस घड़ी में किसी पर दोषारोपण करना ठीक नहीं है. सीआरपीएफ में महानिदेशक की नियुक्ति नहीं होने के सवाल पर गृहमंत्री ने कहा कि लीडरशिप की कोई कमी नहीं हैं लेकिन यहां भी सीनियर अफसर की पोस्टिंग करनी होगी.

 

बैठक के बाद मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा कि कल तक दोरनापाल, चिंतागुफा और जगरगुंडा का इलाका माओवादियों के लिए सबसे सुरक्षित माना जाता था, लेकिन जब से वहां विकास ने दस्तक दी है तो माओवादियों को लग रहा है कि उनका किला ध्वस्त हो रहा है. मुख्यमंत्री ने कहा कि माओवादी चाहे जो कर लें उनके मसूंबे कभी कामयाब नहीं होंगे. आने वाले दिनों में वहां माओवादियों के उन्मूलन के लिए अभियान चलता ही रहेगा.

 

पूर्व आईजी ने बनाई दूरी


प्रदेश के सरगुजा इलाके से माओवादियों का खात्मा करने का श्रेय लेने वाले एक आईजी कुछ समय तक बस्तर में भी पदस्थ थे, लेकिन गृहमंत्री द्वारा ली गई बैठक में उन्हें आमंत्रित ही नहीं किया गया. आम तौर पर बस्तर की हर छोटी-बड़ी घटना पर बयान देने वाले पूर्व आईजी इस घटना के बाद से खामोश ही है. बस्तर में माओवादियों की तरफ से समय-असमय मोर्चा खोलने वाले संगठन ने भी माओवादियों की इस कायराना हरकत पर फिलहाल किसी तरह की कोई टिप्पणी नहीं की है. गृहमंत्री की बैठक में बस्तर में तैनात डीआरजी (माओवादियों से पुलिस) बने लोगों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठे.

बस्तर में पदस्थ रहे एक पूर्व वरिष्ठ अफसर ने ताबड़तोड़ तरीके से माओवादियों को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर किया था. बाद में समर्पित माओवादी पुलिस बनकर अत्याचार की गाथा लिखने में व्यस्त हो गए. बस्तर के गोमपाड़ इलाके में जब मड़कम हिडमे नाम की युवती की दुष्कर्म के बाद हत्या हुई तो उसके परिजनों ने चीख-चीखकर यह बताया कि सुरक्षाबलों के साथ माओवादी गतिविधियों में संलिप्त रहे लोग युवती की पहचान के लिए गांव तक आए थे. बस्तर में डीआजी की भूमिका लेकर सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता भी सवाल उठाते रहे हैं.

 

 

डीआरजी की भूमिका

आम तौर पर जब भी सीआरपीएफ की टुकड़ी गश्ती के लिए निकलती है तो उन्हें मार्ग दिखाने के लिए डीआरजी के सदस्य साथ रहते हैं, लेकिन सोमवार 24 अप्रैल को जब सीआरपीएफ की टुकड़ी सड़कों की सुरक्षा के लिए निकली तब उनके साथ जिला पुलिस बल का एक कर्मी ही मौजूद था. सूत्रों का कहना है कि दिन में सड़कों की सुरक्षा सीआरपीएफ के जवान कर रहे थे और रात में सड़क बनाने के लिए लगाई गई मशीनों की देखरेख माओवादी से पुलिस बनी डीआरजी कर रही थीं.


सीआरपीएफ के जवान लगातार गत कई दिनों से बुरकापाल के पास ही गश्ती के बाद आराम करते थे. नक्सल ऑपरेशन के विशेष डीजी डीएम अवस्थी का कहना है कि अभी यह कहना मुश्किल है कि घटना के पीछे का असली मास्टर माइंड कौन है, लेकिन यह भी साफ है कि जांच में डीआरजी की भूमिका को लेकर भी पड़ताल की जाएगी.

 

First published: 26 April 2017, 9:43 IST
 
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