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पंचायत चुनाव पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला असंवैधानिक: येचुरी

पाणिनि आनंद | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST
QUICK PILL
  • सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार के उस फैसले को वाजिब ठहराया है जिसमें केवल शिक्षितों को ही पंचायत चुनावों में हिस्सा लेने का अधिकार दिया गया है.
  • मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव और राज्यसभा सांसद सीताराम येचुरी का कहना है कि सरकार की विफलता का दंड जनता को नहीं दिया जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में हरियाणा सरकार द्वारा पारित किए गए उस प्रस्ताव को बरकरार रखा है जिसमें केवल शिक्षितों को ही पंचायत चुनाव लड़ने का अधिकार दिया गया है. 10 दिसंबर को अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'केवल शिक्षा के माध्यम से ही कोई इंसान अच्छे और बुरे का फर्क कर सकता है.' अगर किसी के घर में टॉयलेट नहीं है तो यह पूरी तरह से उचित है कि उस उम्मीदवार की योग्यता खारिज कर दी जाए जिसे 'साफ-सफाई का बुनियादी ज्ञान' नहीं है.

हरियाणा सरकार का फैसला उस वक्त में आया है जब पहले ही राजस्थान सरकार पंचायती चुनाव के लिए शैक्षणिक योग्यता को अनिवार्य किए जाने का फैसला कर चुकी है. कई लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की आलोचना की है और कहा कि यह नागरिकों के बुनियादी अधिकारों के खिलाफ जाता है.

राज्यसभा सांसद और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी ने कैच संवाददाता पाणिनी आनंद को बताया कि ऐसे फैसले संविधान की मूल भावना के खिलाफ जाते हैं. उन्होंने कहा कि यह देश का दुर्भाग्य है कि जब हम बीआर आंबेडकर की 125वीं जन्मशती मना रहे हैं तब इस तरह का फैसला सामने आया है. येचुरी ने कहा यह महज संयोग नहीं है कि यह सब कुछ बीजेपी शासित राज्यों में हो रहा है.

बातचीत के अंश:

सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसले को आप किस तरह से देखते हैं जिसमें उसने हरियाणा सरकार के फैसले को जायज ठहराया है?

हमें गंभीर आपत्ति है. हमें लगता है कि इस फैसले से सुप्रीम कोर्ट ने हमारे संविधान के बुनियादी अधिकारों को बुरी तरह से कमजोर कर दिया है. हमारे संविधान की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह देश के सभी लोगों को जाति, धर्म और उनके लिंग का भेदभाव किए बगैर वोट देने और चुनाव लड़ने का अधिकार देता है. इस पर प्रतिबंध लगाकर आप व्यस्क मताधिकार पर प्रतिबंध लगा रहे हैं और मेरी नजर में यह संविधान की मूल भावना का उल्लंघन है.

क्या यह संविधान का उल्लंघन करता है?

हां. यह फैसला संविधान के खिलाफ है. इसलिए इसे संविधान पीठ को भेजा जाना चाहिए. इसके साथ ही संसद को भी इस बुनियादी अधिकार का बचाव करने के लिए कानूनी कदम उठाने चाहिए. ऐसे फैसले प्रतिगामी हैं और इससे संविधान की बुनियाद कमजोर होती है.

शीतकालीन सत्र में संविधान पर बहस के लिए दो दिनों के विशेष सत्र का आयोजन किया गया. इस दौरान आपने कहा कि सरकार इन फैसलों की मदद से आंबेडकर के खिलाफ काम कर रही है...

यह विडंबना और विरोधाभास की स्थिति है. संसद संविधान को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जता चुकी है. बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था कि हमारे संविधान का मूल सिद्धांत एक आदमी एक वोट और एक वोट-एक मूल्य रहा है. अब इस सिद्धांत को नजरअंदाज किया जा रहा है.

आपको ऐसा क्यों लगता है कि सरकार आंबेडकर के विजन के खिलाफ जाकर काम कर रही है?

यह ऐसा सवाल है जो मैं भी पूछना चाहता हूं. सरकार को इसका जवाब देना चाहिए. न केवल हरियाणा बल्कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात की सभी सरकारों को इसका जवाब देना चाहिए. यह महज संयोग नहीं है कि सभी राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं.

बीजेपी जातिगत समानता में यकीं नहीं करती जैसा कि धर्म को लेकर भी है. यह हिंदू राष्ट्र को बनाने की मानसिकता है?

हमारी समझ यह है कि बीजेपी समानता की भावना में विश्वास नहीं करती है. वह केवल आरएसएस के एजेंडे को लागू करने और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को फासीवादी हिंदू राष्ट्र बनाने में यकीं करती है. इस प्रक्रिया में वह हिंदू समाज में वर्ण व्यवस्था की खुलेआम वकालत कर चुकी है.

हाल के वर्षों में गरीबों, अशिक्षितों, मजदूरों और अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व में गिरावट आई है. चाहे वह राजनीतिक दलों का मामला हो या फिर संसदीय भागीदारी का. ऐसा क्यों हो रहा है?

सरकार ने संवैधानिक अधिकारों को लागू करने के लिए पर्याप्त कोशिश नहीं की. राजनीति के सांप्रदायिकीकरण से धार्मिक तौर पर अल्पसंख्यक समुदाय के प्रतिनिधित्व में गिरावट आई है. सच्चर कमेटी की रिपोर्ट और उसकी सिफारिशें वास्तव में इसकी गवाही है. हम दरअसल रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशों को लागू किए जाने की मांग कर रहे हैं. इस आयोग का गठन सच्चर समिति की सिफारिशों के आधार पर किया गया था ताकि अल्पसंख्यकों की स्थिति में सुधार किया जा सके.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ यह तर्क दिया जा रहा है कि इससे प्रतिनिधित्व प्रणाली को लेकर एक मानक बनेगा. तो क्या यहां पर बुनियादी शिक्षा जैसा तर्क महत्वपूर्ण नहीं है?

इन तर्कों में सच्चाई हो सकती है लेकिन शिक्षा और साफ-सफाई तक पहुंच नहीं होने के पीछे नागरिकों की जिम्मेदारी नहीं है. इसके लिए सरकारें जिम्मेदार रही हैं. लोग अपनी मर्जी से अशिक्षित नहीं है. संविधान निर्माताओं ने इस बात पर बहस की थी और फिर उन्होंने शिक्षा, संपत्ति के अधिकार को वोट देने के अधिकार से अलग कर दिया.

नीति निर्देशक तत्व में यह साफ कहा गया था कि सरकार 6 से 14 साल की उम्र के बच्चों को मुफ्त शिक्षा मुहैया कराए.

लोग अपनी मर्जी से अशिक्षित नहीं है. इस विफलता के लिए सरकारें जिम्मेदार रही हैं.

तो यह सरकार की जवाबदेही थी जिसे पूरा नहीं किया जा सका. सरकार की विफलता के लिए आप लोगों को सजा नहीं दे सकते. गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान की सरकार ने सैनिटेशन के लिए जो तरीका निर्धारित किया है वह सरकारों की विफलता है और इसके लिए आप लोगों को सजा दे रहे हैं. आप उन लोगों को संवैधानिक अधिकारों से वंचित कर रहे हैं जिसकी गारंटी संविधान देता है. यह पूरी तरह से गलत है.

क्या आप इस बात को लेकर चिंतित है कि राज्य और जुडीशियरी इस मसले पर एक ही भाषा बोल रही है?

यह चिंता की बात है. इसलिए हम चाहते हैं कि सरकार कानूनी उपाय पर विचार करे ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि लोगों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जाए.

चूंकि यह फैसले बीजेपी शासित राज्यों से आ रहे हैं तो क्या आपको लगता है कि एनडीए सरकार आपकी सलाह पर अमल करेगी?

वह ऐसा नहीं करेंगे. इसे केवल लोगों के दबाव से ही मनवाया जा सकता है. संसद के बाहर लोगों का आंदोलन और संसद के भीतर दबाव बनाने की रणनीति पर हमारी पार्टी काम कर रही है.

जब नेशनल हेरल्ड का मामला संसद में चर्चा का विषय बना हुआ है तो आपको लगता है कि इस मुद्दे पर पार्टिंयां एक साथ आएंगी?

अगर राजनीति दल संविधान दिवस पर जताई गई अपनी प्रतिबद्धता को लेकर गंभीर हैं तो उन्हें इसका समर्थन करना चाहिए. भारतीय संविधान का सम्मान करते हैं तो प्रत्येक पार्टी को इसका समर्थन करना चाहिए.

First published: 14 December 2015, 8:10 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बीबीसी हिन्दी, आउटलुक, राज्य सभा टीवी, सहारा समय इत्यादि संस्थानों में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके हैं.

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