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भारतीय रेल: क्या सर्ज प्राइसिंग निजीकरण की राह में बढ़ाया गया कदम है?

टॉम थॉमस | Updated on: 15 September 2016, 7:20 IST
QUICK PILL
  • भारतीय रेलवे ने हाल ही में एक नई शुरुआत की है- \'सर्ज प्राइसिंग\' की. किसी भी सेवा या वस्‍तु की मांग में बढ़ोतरी होने के साथ कम्पनी द्वारा उसकी वर्तमान कीमत में साथ ही साथ ही बढ़ोतरी करने को सर्ज प्राइसिंग कहते हैं.
  • रेलवे ने सर्ज प्राइसिंग के तहत तय किया है कि विशेष दर्जा हासिल ट्रेनों जैसे राजधानी, दुरंतो और शताब्दी में फर्स्ट क्लास और एग्जीक्यूटिव क्लास को छोड़कर सभी टिकटों सेकेंड क्लास, स्लीपर, सेकंड एसी और चेयर कार के किरायों पर यह लागू होगा. 

भारतीय रेलवे ने हाल ही में एक नई शुरुआत की है- 'सर्ज प्राइसिंग' की. आइए पहले तो यह जानते हैं कि आखिर सर्ज प्राइसिंग का अर्थ क्या है. सर्ज प्राइसिंग का मतलब है, एक ही सुविधा के लिए अलग-अलग दाम देना.

अर्थशास्त्र के अनुसार इसकी व्याख्या की जाए तो किसी भी सेवा या वस्‍तु की मांग में बढ़ोतरी होने के साथ कम्पनी द्वारा उसकी वर्तमान कीमत में साथ ही साथ ही बढ़ोतरी करने को सर्ज प्राइसिंग कहते हैं.

रेलवे ने सर्ज प्राइसिंग के तहत तय किया है कि विशेष दर्जा हासिल ट्रेनों जैसे राजधानी, दुरंतो और शताब्दी में फर्स्ट क्लास और एग्जीक्यूटिव क्लास को छोड़कर सभी टिकटों सेकेंड क्लास, स्लीपर, सेकंड एसी और चेयर कार के किरायों पर यह लागू होगा. रेलवे ने इसका कोई प्रत्यक्ष कारण तो नहीं बताया है.

कुछ कारण हो भी सकता है? इस पहेली को सुलझाने के लिए हमें सर्ज प्राइसिंग के साथ-साथ भाजपा सरकार द्वारा रेलवे के लिए बनाए गए अन्य मानकों की श्रृंखला का सिलसिलेवार अध्ययन करने की जरूरत होगी.

रेलवे ने पहला कदम डायनामिक प्राइसिंग का उठाया. इसे प्रीमियम तत्काल टिकट कहा गया. ये टिकट सामान्य तत्काल टिकटों से तीन से चार गुना ज्यादा कीमत में बिकते हैं.इस स्कीम के तहत चेन्नई और बेंगलुरू के बीच एसी-3 का जो किराया 800 रुपए के आसपास है, वह इसमें बढ़कर 5,000 रुपए तक का हो जाता है.

किराए में इतनी ज्यादा वृद्धि तो गला काट होड़ में लगी बस कम्पनियां भी पीक सीजन के दौरान नहीं करतीं. दूसरा कदम था, त्यौहार और छुट्टियों के दौरान यात्री भार कम करने के उद्देश्य से जो स्पेशल ट्रेने चलाई जाती थीं, सभी को बंद कर दिया गया.

इनके स्थान पर सुविधा ट्रेनें चलाई गईं. इन ट्रेनों में हर टिकट प्रीमियम तत्काल की दर पर बिकता है. सभी महाप्रबंधकों, डिवीजनल रेलवे प्रबंधकों को कोई भी स्पेशल ट्रेन,भयंकर आपदा मामलों या बचाव कार्य को छोड़कर, नहीं चलाए जाने के निर्देश दिए गए हैं.

तीसरा निर्णय था- पूरे साल के स्थान पर पीक सीजन में तयशुदा मार्गों पर सुविधा ट्रेन चलाने का. चौथा कदम सर्ज प्राइसिंग को लागू करने का है. ये ट्रेने पूरे साल चलती रहेंगी.

ये सभी कदम अलग से पेश किए जाने वाले सालाना रेलवे बजट से अलग हटकर उठाए गए और इसे केन्द्रीय बजट से अलग एक अन्य लाइन पर बनाया गया. इसी तरह से बजट से हटकर किराया भी बढ़ाया गया.

रेलवे ने सर्ज प्राइसिंग के फैसले को लेकर अभी तक कोई प्रत्यक्ष कारण नहीं बताया है.

आइए, देखते हैं कि सरकार ने अब तक क्या हासिल किया है. सरकार ने रेल यात्रियों पर डॉयनामिक प्राइसिंग और सर्ज प्राइसिंग का भार थोपा. कुछ ट्रेनों को स्पेशल ट्रेन का दर्जा दिया और कपटपूर्ण तरीके से किराया बढ़ा दिया. और अब जो ट्रेने बची थीं, उन्हें सर्ज प्राइसिंग के रूप में शामिल करते हुए स्पेशल ट्रेनों का दर्जा दे दिया.

कुछ विश्लेषकों का तर्क है कि यह कदम निजी एयरलाइनों की तर्ज पर उठाए गए हैं जहां मुख्य मार्गों पर एयरलाइन कम्पनियों के बीच किराए में कड़ी प्रतिस्पर्धा है. यह थोड़े समय के लिए सच भी हो सकता है. जब तक तेल की कीमतें कम बनी रहतीं हैं, वे कम किराए पर अपनी उड़ाने भरवा सकती हैं. बाद में यह किराया बढ़ भी सकता है.

भारत का रेलवे नेटवर्क विश्व में सबसे बड़ा नेटवर्क है. 1,15,000 किमी से ज्यादा लम्बा ट्रैक है, हर रोज दो करोड़ तीस लाख से ज्य़ादा यात्री सफर करते हैं, यानी साल में 8 अरब 40करोड़ से ज्यादा. यात्रियों की आवाजाही देश की आबादी से आठ गुना के बराबर है.

रेलवे का निजीकरण अभी तक जो रुका हुआ है, वह उसके विशाल नेटवर्क के कारण है. लगभग एक करोड़ बीस लाख से एक करोड़ तीस लाख के बीच यात्री, जो आम लोग हैं, वे एक रात की यात्रा नॉन एसी लेकिन सुविधाजनक स्लीपर बर्थ पर 400 रुपए से भी किराए पर कर लेते हैं.

आईआरसीटीसी के अनुसार रेलवे को सामान्य यात्री किराए से उसकी 57 फीसदी ही लागत निकलती है. इसी वजह से निजीकरण नहीं किया जा रहा है. वहन कर लिए जाने वाले किराए में रेलवे सामान्य लोगों को लम्बी दूरी की यात्रा तय कराता है. ऐसे में राष्ट्रीय एकता की दिशा में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है.

वास्तव में, रेलवे परिवहन का एकमात्र साधन है जहां कोई भी बिना टिकट यात्रा कर लेने का प्रबंध कर सकता है. इससे लाखों पीड़ित लोगों को मदद मिल जाती है जो देश के अन्य भागों के शहरों में काम के लिए जाना चाहते हैं.

भारत का रेलवे नेटवर्क विश्व में सबसे बड़ा नेटवर्क है. जिसके पास 1,15,000 किमी से ज्यादा लम्बा ट्रैक है.

पूर्व में भी, रेल सेवाओं के कई अनुभागों में मसलन, कैटरिंग, बेड रोल्स की आपूर्ति आदि का निजीकरण किया जा चुका है. अगला कदम ट्रेनों का हो सकता है क्योंकि घातक लाभ के लिए उसको सजाने-संवारने का काम शुरू किया जा चुका है. निजी मालिक के लिए रेलवे तैयार भी है और इंतजार में भी.

इन स्पेशल ट्रेनों की चाभी अभी निजी कम्पनियों को सौंपा जाना बाकी है. यह कुछ उस तरह से भिन्न नहीं है कि तेल का पता लगाने के लिए करदाताओं का पैसा खर्च होता है और तेल निकालने का काम निजी कम्पनियों को सौंप दिया जाता है.

यदि आपको भारतीय रेलवे के ट्रैफिक कन्ट्रोल सिस्टम के बारे में जानकारी है तो चलन यह है कि ज्यादा महत्वपूर्ण ट्रेनों को हमेशा ही अन्य ट्रेनों की तुलना में (सुपरफास्ट ट्रेन को एक्सप्रेस, एक्सप्रेस ट्रेनों को पैसेंडर रेलों) आगे निकाल दिया जाता है. ऐसे में उन दिनों की कल्पना आसानी से की जा सकती है जब निजी ट्रेनों की खातिर सभी ट्रेनों को रुकना पड़ेगा. हाईस्पीड ट्रेनों के लिए ये ट्रैक बनाए जाएंगे और रख-रखाव के लिए करदाताओं के धन का इस्तेमाल होगा.

(टॉम थॉमस कॉरपोरेट रिस्पॉन्सिबिलिटी वाच के संयोजक और प्रेक्सिस इंस्टीट्यूट ऑफ पार्टीसिपेटरी प्रैक्टिसेस के सीईओ हैं)

First published: 15 September 2016, 7:20 IST
 
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