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नए सरोगेसी बिल से सुषमा स्वराज ने देह की गुलामी के खिलाफ जगाई उम्मीद

श्रिया मोहन | Updated on: 27 August 2016, 7:46 IST

जब सुषमा स्वराज ने मंत्रिमंडल को सरोगेसी बिल-2016 के बारे में बताया कि 'यह बिल केवल जरूरतमंदों को सरोगेसी की अनुमति देता है, न कि लक्जरी और फैशन के लिए, जैसा कि हम बराबर देख रहे हैं, तो मैंने राहत की सांस ली.

संक्षेप में, नया बिल सभी तरह की व्यावसायिक सरोगेसी पर प्रतिबंध लगाता है.

यह केवल उस सरोगेसी की अनुमति देता है, जो परिवार के हित में उनके नजदीकी संबंधियों द्वारा की गई हो. वो भी केवल शादीशुदा भारतीय दंपती को. कोई विदेशी नहीं, कोई समलैंगिक नहीं और कोई सिंगल पैरेंट्स नहीं. एक औरत परमार्थ के लिए सरोगेट मदर जीवन में केवल एक बार ही बन सकती है, इससे अधिक नहीं.

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सरोगेसी के क्षेत्र में विश्वभर में अग्रणी भारत में इस बिल को लेकर प्रसन्नता, अविश्वास और नाराजगी भरी प्रतिक्रियाएं एक साथ देखने को मिली हैं.

भारत में 3000 क्लिनिक सरोगेट मदर को आइवीएफ तकनीक उपलब्ध करवाते हैं. एक बार जब औरत सरोगेट मदर बनने को तैयार हो जाती है, अंडाणु को आइवीएफ तकनीक से निषेचित किया जाता है और सरोगेट मदर की कोख में रखा जाता है. 

इसे जेस्टेशनल सरोगेसी कहते हैं और यह सरोगेसी का सबसे आम तरीका है. इसमें कृत्रिम प्रजनन तकनीक (आर्टिफीशियल रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी-एआरटी) इस्तेमाल की जाती है.

एआरटी के प्रमुख क्लिनिकों में प्रतिवर्ष 100 से 300 बच्चे जन्म लेते हैं. आइवीएफ तकनीक की 2001 में अनुमानित संख्या 7, 000 थी, जो 2011 में बढ़कर 85,000 हो गई.

पैसे की चाह में

कुछ समय पहले मैं दक्षिणी दिल्ली के एक प्रसिद्ध एआरटी क्लिनिक गई थी, केवल भारत की 400 मिलियन डॉलर फायदे वाली इंडस्ट्री देखने. वहां मुझे लॉबी में इंतजार करने के लिए कहा गया, जहां नवजात शिशुओं को बांहों में लिए खुशी से चमकते माता-पिता के ढेर सारे चित्र लगे हुए थे.

सोफों में निराश दंपत्ति बैठे हुए थे. वे ईर्ष्या से प्रेग्नेंट महिलाओं की ओर देख रहे थे. कुछ लोग बुरी दशा में अपने लिए बाहर अलग से बने वार्ड से गुप-चुप आ-जा रहे थे. उनके चेहरे पर तनाव और शर्मिंदगी के भाव से लेकर व्यावहारिकता तक थी.

'मैं परेशान नहीं होती. कोख, खून और इंसान के बालों की तरह अपने आप नया जन्म देती है. बालक के होने से वह नष्ट नहीं होती. यदि आप किसी के लिए खून दान में दे सकते हैं, तो एक स्वस्थ बालक को क्यों नहीं जन्म दे सकते हैं और क्यों नहीं एक जैविक माता-पिता को खुशी दे सकते हैं?' क्लिनिक की डॉक्टर और संस्थापक ने मुझसे कहा.

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कुछ पल के लिए तो मुझे यह बात बहुत सहज लगी. पर क्या होगा यदि माता-पिता बच्चे को बीच में छोड़ दें? या असामान्य बच्चे का जन्म हो? या उनके मन मुताबिक बच्चा पैदा न हो?

बेशक पैसा अच्छा मिल रहा है, पर हम यह फिर नहीं करेंगे. यह कर्ज चुकाने के लिए था, और अब हमने चुका दिया है

'अरे! एक बार तो हमारे यहां एक ऐसे बच्चे ने जन्म लिया, जिसके बायां कान नहीं था. हमने तुरंत एक कान फिक्स कर दिया और माता-पिता को सौंप दिया', वे खुशी से चहकीं और फिर यथार्थबयानी के साथ आगे बोलीं, 'बेशक जब चीजें ज्यादा जटिल हो जाती हैं, तो हम बच्चे गोद दे देते हैं.'

क्लिनिक के बाहर दो बच्चों के साथ एक गरीब दंपत्ति झगड़ रहे थे. औरत ने सप्ताहभर पहले अपने पहले सेरोगेट बच्चे को जन्म दिया था. वह क्लिनिक से अपना बकाया पैसा लेने आई थी. पति, एक ऑटो वाला, उससे कह रहा था कि वह जाकर पूरे भुगतान के लिए कहे. उसे केवल 70,000 मिले थे. 

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डिलीवरी के बाद उसे 30,000 और मिलने थे. क्लिनिक भुगतान में देरी कर रहा था. मां अशक्त लग रही थी. डिलीवरी आराम से नहीं हुई थी. अस्पताल ने हॉरलिक्स, फल, पोषक सप्लिमेंट्स, कुछ भी नहीं दिया था, जैसा कि डॉक्टर ने देने का आश्वासन दिया था. और फिर बच्चे को जन्म देने के बाद वह उसे एक नजर देख भी नहीं सकी थी, इससे मां में एक अजीब-सी रिक्तता थी.

पति ने मुझसे दृढ़ता से कहा, 'बेशक पैसा अच्छा मिल रहा है, पर हम यह फिर से नहीं करेंगे. यह कर्ज चुकाने के लिए था. और अब हमने चुका दिया है.'

स्वीकृति की कीमत

जो सरोगेसी के पक्ष में तर्क देते हैं, वे दो आधार पर तर्क देते हैं-पहला स्वीकृति और दूसरा 'अपना खुद का जैविक बालक होने की बेजोड़ खुशी.

स्वीकृति के संदर्भ में एक प्रश्न विचारणीय है: हम किनकी स्वीकृति ले रहे हैं? और मजबूरी और गरीबी की निराशाजनक परिस्थितियों में फंसे लोगों की स्वीकृति. क्या इस तरह की स्वीकृति जायज भी है?

एक बिल्कुल गरीब परिवार अपने परिजन की किडनी बेचने की स्वीकृति दे सकता है, दवाओं के परीक्षण के लिए इनजेक्ट करवाने के लिए सहमत हो सकता है या अपनी लड़की को वेश्यावृत्ति के लिए भेज सकता है, या गुलामी के लिए अपने बच्चे को बेच सकता है. यह सब अच्छा पैसा पाने के लिए.

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उनके शरीर के शोषण की स्वीकृति की मात्रा इस पर निर्भर करती है कि उन्हें अपनी स्थिति से कितनी निराशा है. हम अपनी सुविधा के लिए गरीब की स्वीकृति के बहाने का इस्तेमाल करना कब बंद करेंगे? हम हजारों की आड़ में सरोगेसी इंडस्ट्री का पक्ष लेना कब बंद करेंगे, जिन्हें 'आजीविका' से वंचित किया जाएगा?

यह केवल नैतिकता का नजरिया नहीं है. सरोगेट मदर को कई शारीरिक जोखिमों से रूबरू होना पड़ता है, जिनमें से किसी का भी सामना करने के लिए उसकी तैयारी नहीं होती है.

चिकित्सकीय शब्दावली में इसे भ्रूण की कटौती कहते हैं, जबकि एक औरत अपने गर्भाशय में दो भ्रूण रख सकती है

सरोगेट बच्चे को कई बार त्याग दिए जाने का मामला भी सामने आया है. ऐसे बच्चों के माता-पिता या तो अलग हो गए होते हैं या उनमें तलाक हो गया होता है, या वह बच्चा उस लिंग का नहीं होता, जिसे वे पाना चाह रहे थे. 

जैसे बेबी मनजी का केस था. 2008 में एक जापानी दंपती ने अपने बच्चे को जन्म देने के लिए भारतीय सेरोगेट की व्यवस्था की थी, पर उस समय तलाक ले लिया जब बच्चा कोख में ही था.

हालांकि पिता बच्ची को लेना चाहता था, पर भारतीय कानून सिंगल पुरुष को बच्चा लेने की अनुमति नहीं देता, इसलिए बेबी मनजी दो साल तक जयपुर हॉस्पिटल में रही, जब तक कि संरक्षण की समस्या सुलझ नहीं गई. इसी तरह 2010 में एक फ्रांसिसी समलैंगिक पुरुष, जिनके पास भारतीय सरोगेट से जुड़वां बच्चे थे, को वापस फ्रांस जाने की अनुमति नहीं दी गई, जहां सरोगेसी गैरकानूनी है.

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पिछले अक्टूबर एक ऑस्ट्रेलियाई दंपती ने दिल्ली में सरोगेट से जन्मे अपने जुड़वां बच्चों में से एक को छोड़ दिया क्योंकि उस सेक्स का बच्चा उनके पास पहले से था. चिकित्सकीय शब्दावली में इसे भ्रूण की कटौती कहते हैं, जबकि एक औरत अपने गर्भाशय में दो भ्रूण रख सकती है. 

एआरटी क्लिनिकों में तो तीन भ्रूण इंजेक्ट करने की गैरकानूनी प्रैक्टिस भी आम है, और बाद में जिस जेंडर को माता-पिता नहीं चाहते हैं, उसे सरोगेट मदर की सेहत को भारी जोखिम में डालते हुए एडवांस स्टेज में हटा दिया जाता है. इन सब की स्वीकृति देना बहुत जटिल और जोखिम भरा है.

मानव शरीर के बाहर कृत्रिम कोख में भ्रूण विकसित करना और यह तकनीक जल्द ही वास्तविकता बन जाएगी

जहां तक अपने खुद के जैविक बच्चे होने की बेजोड़ खुशी के दूसरे तर्क का सवाल है, इसके लिए केवल एक विकल्प है, और वह है एक्टोजेनिसिस (बहिर्विकास) तकनीक, अर्थात मानव शरीर के बाहर कृत्रिम कोख में भ्रूण विकसित करना और यह तकनीक जल्द ही वास्तविकता बन जाएगी.

कइयों को कमर्शियल सरोगेसी पर प्रतिबंध लागू करने में दोष नजर आ रहे हैं. विशेषज्ञों का तर्क है कि पैसे के लालच में अब सरोगेसी को चोर दरवाजे से इस्तेमाल किया जाएगा. यह अपने आप में नियमों की लड़ाई होगी. ये सभी समाधान त्रुटिपूर्ण हो सकते हैं, पर हम अब भी प्रगति के सामूहिक पथ पर हैं. केवल इस आधार पर कि इसका एक बाजार उपलब्ध है हम मजबूरी में फंसे लोगों के अधिकारों का दुरुपयोग नहीं कर सकते.

First published: 27 August 2016, 7:46 IST
 
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