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जन्मदिवस विशेष: धर्म संसद में नहीं दिया जा रहा था बोलने का मौका, जब वे बोले तो दुनिया सुनती रह गई

आदित्य साहू | Updated on: 12 January 2018, 10:02 IST

आज से लगभग 126 साल पहले अमेरिका के शहर शिकागो में एक ऐसी घटना घटी थी जिसने भारत की साख को कई गुना बढ़ा दिया था. एक सन्यासी ने तब अमेरिका के शिकागो में आयोजित 'विश्व धर्म महासभा' में ऐसा भाषण दिया था जिसने भारत के साथ-साथ अमेरिका को भी अपना दीवाना बना लिया था.

'मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों' के साथ जब उस शख्स ने अपने भाषण की शुरुआत की थी तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा था. साहित्य, दर्शन और इतिहास के प्रकांड विद्वान उस शख्स का नाम स्वामी विवेकानंद था. आज उनका जन्मदिन है. उनके जन्मदिवस के उपलक्ष्य में भारत में हर साल आज के दिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता ह़ै.

स्‍वामी विवेकानंद का जन्‍म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में हुआ था. उनके बचपन का नाम नरेंद्रनाथ दत्त था. उनके पिता विश्‍वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के वकील थे, जबकि मां भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों वाली महिला थीं. उनके दादाजी दुर्गाचरण दत्त संस्‍कृत और फारसी के विद्वान थे.

सिर्फ 25 बरस की उम्र में नरेंद्र घर-बार छोड़कर साधु बन गए थे. साल 1884 में पिता की मौत के बाद परिवार के भरण-पोषण का भार उन्‍हीं के कंधों पर आ गया था. कहा जाता है कि वह खुद भूखे रहकर अतिथियों को खाना खिलाते थे और बाहर ठंड में सो जाते थे. नरेन्द्र बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे. कम उम्र में ही उन्‍होंने वेद और दर्शन शास्‍त्र का ज्ञान हासिल कर लिया था.

नरेंद्र 1871 में आठ साल की उम्र में स्कूल गए. 1879 में उन्‍होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज की प्रवेश परीक्षा में पहला स्‍थान हासिल किया. उन्‍होंने जनरल असेंबली इंस्‍टीट्यूशन (अब स्कॉटिश चर्च कॉलेज) से पश्चिमी तर्क, पश्चिमी दर्शन और यूरोपीय इतिहास का अध्ययन किया.

महासभा के प्रिंसिपल विलियम हेस्टी ने उनके बारे में लिखा था, 'नरेंद्र वास्तव में एक जीनियस है. मैंने काफी बड़े इलाकों में यात्रा की है लेकिन उनकी जैसी प्रतिभा वाला एक भी बालक कहीं नहीं देखा. यहां तक कि जर्मन विश्वविद्यालयों के दार्शनिक छात्रों में भी नहीं.'

अपने कॉलेज के प्रिंसिपल विलियम हेस्‍टी से रामकृष्ण परमहंस के बारे में सुनकर नवंबर 1881 में वो उनसे मिलने दक्षिणेश्वर के काली मंदिर पहुंचे थे. रामकृष्‍ण परमहंस ही वो शख्‍स थे जिन्‍होंने किसी जौहरी की तरह नरेंद्रनाथ रूपी अनमोल हीरे की पहचान की थी.

रामकृष्ण परमहंस से भी नरेंद्र नाथ ने वही सवाल किया जो वो औरों से कर चुके थे, 'क्या आपने भगवान को देखा है?' रामकृष्ण परमहंस ने जवाब दिया- 'हां मैंने देखा है, मैं भगवान को उतना ही साफ देख रहा हूं जितना कि तुम्हें देख सकता हूं. फर्क सिर्फ इतना है कि मैं उन्हें तुमसे ज्यादा गहराई से महसूस कर सकता हूं.'

रामकृष्ण परमहंस के जवाब से नरेंद्रनाथ प्रभावित तो हुए लेकिन सहमत नहीं थे. तर्क-वितर्क में वो रामकृष्ण परहमंस का विरोध करते थे, तब उन्हें यही जवाब मिलता था कि सत्य को सभी कोण से देखने की कोशिश करो. रामकृष्‍ण ने पहले उन्हें विश्वास दिलाया कि ईश्वर वास्तव में है और मनुष्य ईश्वर को पा सकता है. परमहंस ने उन्हें शिक्षा दी कि सेवा कभी दान नहीं, बल्कि सारी मानवता में निहित ईश्वर की सचेतन आराधना होनी चाहिए. यह उपदेश विवेकानंद के जीवन का प्रमुख दर्शन बन गया. उन्हें गुरु ने आत्मदर्शन करा दिया था.

25 बरस की उम्र में नरेन्द्र दत्त ने गेरुए वस्‍त्र पहन लिए. अपने गुरु से प्रेरित होकर उन्‍होंने सांसारिक मोह-माया त्‍याग दी और संन्‍यासी बन गए. 16 अगस्त 1886 को रामकृष्ण परमहंस के निधन के दो साल बाद नरेंद्र पैदल ही भारत भ्रमण के लिए निकल पड़े. इस दौरान वो देश में फैली गरीबी, पिछड़ेपन को देखकर विचलित हो उठे.

छह साल तक नरेंद्र भारत की समस्या और आध्यात्म के गूढ़ सवालों पर विचार करते रहे. कहा जाता है कि इसी यात्रा के अंत में कन्याकुमारी में नरेंद्र को ये ज्ञान मिला कि नए भारत के निर्माण से ही देश की समस्या दूर की जा सकती है. भारत के पुनर्निर्माण का लगाव ही उन्हें शिकागो की धर्मसंसद तक ले गया.

नहीं दिया जा रहा था धर्म संसद में बोलने का मौका

नरेंद्र ने बहुत मुश्किलों का सामना करते हुए जापान, चीन और कनाडा की यात्रा कर अमेरिका पहुंचे थे. उनको तो धर्म संसद में बोलने का मौका भी नहीं दिया जा रहा था लेकिन जब उन्होंने 'अमेरिका के भाइयों और बहनों' के संबोधन से भाषण शुरू किया तो पूरे दो मिनट तक आर्ट इंस्टीट्यूट ऑफ शिकागो में तालियां बजती रहीं. इसके बाद धर्म संसद सम्मोहित होकर तीस बरस के स्वामी जी को सुनती रही. 11 सितंबर 1893 का वो दिन हमेशा-हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो गया. अमेरिका पर स्वामी विवेकानंद ने जो असर छोड़ा वो आज भी कायम है.

'साइक्लोनिक हिन्दू' के नाम से अमेरिका में जाने जाते थे स्वामी विवेकानंद

शिकागो में हुए सम्मेलन के बाद स्वामी विवेकानंद ने पांच साल से भी ज्‍यादा वक्‍त तक अमेरिका के अलग-अलग शहरों और लंदन, पेरिस, जर्मनी और रूस में वेदांत के संदेश का प्रचार किया. 1897 में जब विवेकानंद भारत लौटे तो उनका जोरदार स्‍वागत हुआ. उन्‍होंने घोषणा की कि वेदांत धर्म को व्‍यावहारिक बनाया जाना जरूरी है.

उनका कहना था कि सिर्फ अद्वैत वेदांत के आधार पर ही विज्ञान और धर्म साथ-साथ चल सकते हैं. रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था, 'यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढ़िए. उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पाएंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं.'

स्‍वामी विवेकानंद ने 1 मई 1897 में कलकत्ता में रामकृष्ण मिशन और 9 दिसंबर 1898 को गंगा नदी के किनारे बेलूर में रामकृष्ण मठ की स्थापना की. उन्‍होंने 'योग', 'राजयोग' और 'ज्ञानयोग' जैसे ग्रंथों की रचना भी की. नोबेल पुरस्‍कार से सम्‍मानित फ्रांसीसी लेखक और नाटककार रोमां रोलां ने स्‍वामी विवेकानंद के बारे में कहा था, 'उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है, वे जहां भी गए, सर्वप्रथम ही रहे'.

हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था. वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी. हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख ठिठक कर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा-'शिव!' यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो.'

स्‍वामी विवेकानंद को दमा और शुगर की बीमारी थी. उन्‍होंने कहा भी था, 'ये बीमारियां मुझे 40 साल भी पार नहीं करने देंगी.' अपनी मृत्‍यु के बारे में उनकी भविष्यवाणी सच साबित हुई और उन्‍होंने 39 बरस की बेहद कम उम्र में 4 जुलाई 1902 को बेलूर स्थित रामकृष्‍ण मठ में ध्‍यानमग्‍न अवस्‍था में महासमाधि धारण कर प्राण त्‍याग दिए.

स्‍वामी विवेकानंद के जन्‍म दिन यानी कि 12 जनवरी के भारत में हर साल राष्‍ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है. इसकी शुरुआत 1985 से हुई थी. दरअसल, भारत सरकार का मानना था कि भारतीय युवकों के लिए स्वामी विवेकानन्द से बढ़कर दूसरा कोई नेता नहीं हो सकता.

First published: 12 January 2018, 10:02 IST
 
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