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मां तुझे सलाम: 30 साल झाड़ू लगाकर बनाया कलेक्टर, अफसर बेटों ने दिया फेयरवेल

कैच ब्यूरो | Updated on: 4 November 2016, 17:11 IST
(एजेंसी)

झारखंड में एक मां ने 30 तक झाड़ू लगाकर अपने तीन बेटों को उस मुकाम पर पहुंचा दिया कि वह पूरे समाज के लिए प्रेरणास्रोत बना गई हैं.

प्रदेश के रामगढ़ जिले के रजरप्पा टाउनशिप में पिछले 30 साल से झाड़ू लगाने वाली सुमित्रा देवी जब सेवानिवृत्त हुईं, तो उनके तीनों बेटे फेयरवेल प्रोग्राम में पहुंचे.

सुमित्रा के एक बेटे बिहार के सिवान जिले के कलेक्टर महेन्द्र कुमार हैं, दूसरे रेलवे में चीफ इंजीनियर हैं वीरेन्द्र कुमार और तीसरे बेटे धीरेन्द्र कुमार मेडिकल अफसर हैं.

सेवानिवृत्ति कार्यक्रम में उनका एक बेटा नीली बत्ती लगी गाड़ी में पहुंचा, तो दो अफसर बेटे अलग-अलग गाड़ियों में पहुंचे.

सुमित्रा के कलेक्टर-इंजीनियर और डॉक्टर बेटे

सुमित्रा देवी ने बड़े ही परिश्रम और लगन से न केवल पाला बल्कि उन्हें पढ़ा-लिखाकर बड़ा अधिकारी भी बनाया. जब तीनों बेटे वहां पहुंचे तो सुमित्रा देवी की आंखें भर आईं.

उन्होंने अपने तीनों बेटों का वहां मौजूद अपने अधिकारियों से परिचय कराया तो सभी लोग सकते में आ गए. उस समय सुमित्रा देवी के दूसरे सहयोगी सफाईकर्मियों को उन पर बहुत गर्व महसूस हो रहा था.

बेटों को अपने आला अफसरों से मिलवाते हुए सुमित्रा देवी बोलीं, "साहब, मैं तो पूरी जिंदगी झाड़ू लगाती रही मगर मैंने अपने तीनों बेटों को साहब बना दिया. यह मिलिए मेरे छोटे बेटे महेंद्र से जो सिवान का कलेक्टर है और यह मेरा बेटा वीरेंद्र इंजीनियर है तो धीरेंद्र डॉक्टर."

कलेक्टर, डॉक्टर और इंजीनियर बेटों ने भी विदाई समारोह में अपनी सफाईकर्मी मां सुमित्रा देवी की मेहनत और संघर्ष की कहानी सभी को बताई.

उन्होंने कहा कि मां ने झाड़ू लगाकर भी उन्हें अच्छी शिक्षा दिलाई. जिसकी वजह से आज वे अधिकारी बनकर जिंदगी में सफल रहे. उन्हें बहुत खुशी है कि जिस नौकरी के दम पर उनकी मां ने उन्हें पढ़ाया-लिखाया, आज सब अपनी मां की विदाई समारोह में साथ-साथ हैं.

'विपरीत हालात से हार न मानें'

सीवान के कलक्टर महेन्द्र कुमार ने बड़े ही भावुक अंदाज में कहा, "कभी भी विपरीत हालात से हार नहीं मानना चाहिए. सोचिए मेरी मां ने झाड़ू लगा-लगाकर हम तीनों भाइयों को पढ़ाकर आज इस मुकाम तक पहुंचा दिया. हम आर्थिक तौर पर बड़े कमजोर थे, लेकिन मेरी मां का साहस और उनका निष्ठा ने हमें आज इस मुकाम पर पहुंचा दिया. हमारी प्रेरणा हमारी मां हैं."

सुमित्रा देवी भी तीस साल की नौकरी को याद करते हुए भावुक हो गईं. उन्होंने कहा कि झाड़ू लगाने का पेशा होने के बाद भी उन्होंने अपने बेटों को साहब बनाने का सपना आंखों में संजोया था.

सुमित्रा ने कहा, "आखिरकार भगवान की कृपा और बेटों की मेहनत से वह सपना सच हो गया. भले ही बेटे अधिकारी हो गए मगर उन्होंने अपनी झाड़ू लगाने की नौकरी इसलिए नहीं छोड़ी कि इसी छोटी नौकरी की कमाई से उनके बेटे पढ़-लिखकर आगे बढ़ सके. आज उनके बेटे उन्हें गर्व का अहसास करा रहे हैं."

First published: 4 November 2016, 17:11 IST
 
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