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जब हम अंबेडकर को याद करते हैं

आनंद तेलतुंबड़े | Updated on: 14 April 2016, 9:34 IST
QUICK PILL
यह साल डॉ. बीआर अंबेडकर का 125वीं वर्षगांठ का है, जिसमें भारत में लगभग \r\nसभी किस्म के राजनीतिक विचारों वाली पार्टियां अंबेडकर को अपने अपने तरीके \r\nसे परिभाषित कर रही हैं और उन्हें अपना बताने की कोशिश कर रही हैं. \r\nसत्ताधारी भाजपा और आरएसएस इस दिशा में सबसे ज्यादा सक्रियता जाहिर कर रही \r\nहैं तो दूसरी तरफ कांग्रेस भी कोशिश कर रही है कि वो इसमें पीछे न रह जाए. \r\nइस होड़ में इसकी तरफ बहुत कम गौर किया जा रहा है कि इस समाज के लिए \r\nअंबेडकर का विजन और रणनीतियां क्या थी. आनंद तेलतुंबड़े बीआर अंबेडकर को \r\nजाति विरोधी संघर्षों की ऐतिहासिक प्रक्रिया के तहत देखते हुए उनकी दृष्टि \r\nऔर विचारों के मूल तत्वों की पहचान करने पर जोर देने का आग्रह कर रहे हैं \r\nक्योंकि सिर्फ ऐसा करते हुए ही जातिवादी ताकतों और निहित स्वार्थों द्वारा \r\nअंबेडकर के दुरुपयोग को असंभव बनाया जा सकता है:
बाबासाहब अंबेडकर ने जाति की राजनीति किसी जाति विशेष की बेहतरी के लिए नहीं की. अपने पहले संगठन बहिष्कृत हितकारिणी सभा के उद्भव के समय से ही उन्होंने दूसरी जातियों और समुदायों के तरक्कीपसंद लोगों को इस तरह से इसमें जोड़ा था कि यह सभा पूरी तरह उच्च जातियों/तबकों के लोगों की हो गई थी जिसकी सिर्फ प्रबंधन समितियों में ही दलित थे. अंबेडकर इसके अध्यक्ष थे, एसएन शिवतारकर सचिव थे और एनटी जाधव इसके कोषाध्यक्ष थे. अस्पृश्यों के मुद्दे को उठाते हुए वे हमेशा उन्हें ‘‘वंचित वर्ग’’ कहा करते थे.

जाहिर तौर पर वर्ग की उनकी अवधारणा मार्क्स के बजाय वेबर के ज्यादा करीब ठहरती थी. यह उनके ऊपर फेबियन राजनीति के प्रभाव का असर था चूंकि वे कोलंबिया विश्वविद्यालय और बाद में लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़े थे, जिसकी संस्थापना फेबियनों ने की थी. वर्ण व्यवस्था की चौहद्दी से बाहर खड़ी सारी जातियों का समूह जो कि अस्पृश्य कहलाता था, अपने आप में जाति नहीं था बल्कि सामाजिक रूप से अलग कर दिए गए लोगों का एक वर्ग था जो सामाजिक और उत्पादन संबंधों में एक विशिष्ट स्पेस में स्थित थे.

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अंबेडकर के अनुयायी, जो जाहिर तौर पर उनकी ही जाति से आते थे, उनके विचारों की बारीकियों को नहीं पकड़ सके और उन्हें अपना ‘‘मसीहा’’ मान बैठे. इस तरह उन्होंने अंबेडकर को अपनी जाति के एक प्रतीक के रूप में सीमित कर दिया. वैसे भी, इसे पहचान सकना इतना आसान नहीं था क्योंकि अंबेडकर के शुरुआती कदमों को अस्पृश्यों के आरंभिक आंदोलनों से अलगा पाना संभव नहीं था जो बुनियादी तौर पर अपनी-अपनी जातियों के उत्थान की ओर लक्षित थे.

चाहे यह अंबेडकर का महारों द्वारा की गई भारी प्रगति की याद दिलाना और उनके पतन पर दुख जताना हो या फिर दलित महिलाओं के प्रति उनकी सीख कि वे खुद को एक निश्चित तरीके से प्रस्तुत करें, या फिर 1818 में कोरेगांव के युद्ध में महार सैनिकों के बलिदान और साहस की सराहना, यह वालंकर, काम्बले और बांसोड़े के आरंभिक कामों से अलग नहीं था. चूंकि उनके अनुयायी अधिकतर उन्हीं की जाति से आते थे, तो उनका कहा एक जातिगौरव के साथ लिया जाता था. वास्तव में, जातिग्रस्त माहौल में जाति के मुहावरे के पार जाना बहुत पहले भी मुश्किल था और अब भी है.

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आरंभ में बाबासाहब अंबेडकर के पास जाति उन्मूलन की दृष्टि नहीं थी. कोलंबिया विश्वविद्यालय के नृविज्ञान संबंधी सेमिनार में प्रस्तुत अपने पहले निबंध कास्ट्स इन इंडियाः देयर मेकैनिज्म, जेनेसिस एंड डेवलपमेंट में, जो कि बौद्धिक दायरे में जाति की समझदारी की दिशा में एक लंबी छलांग था, वे जातियों को घेरे में बंद वर्गों के रूप में परिभाषित करते हैं: वर्ग के इस घेरे को पैदा करने वाली व्यवस्था गोत्र (एन्डोगेमी और एग्जोगेमी) की है. उन्होंने समस्या का कोई समाधान तो नहीं दिया, लेकिन इससे तर्क यह निकलता था कि यदि इस घेरे को तोड़ना है तो गोत्र (एन्डोगेमी और एग्जोगेमी) को खत्म करना होगा.

इसी समझ ने उनके भीतर यह सुधारवादी आशा जगाई कि यदि हिंदुओं को जाति प्रथा के भीतर की गड़बड़ियों के प्रति संवेदनशील बनाया जाता है तो वे शायद ऐसे सुधार करें जिनसे गोत्र से बना वर्गीय घेरा टूट सके. इस रणनीति में अस्पृश्यों समेत हिंदुओं को भी जाति की बुराइयों के खिलाफ जागरूक करना शामिल था. इसमें अस्पृश्यों के सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन को भी संबोधित किया जाना शामिल था.

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मूकनायक (उनका पहला परचा जो 1920 में आया) जहां जागरूकता के इन्हीं पहलुओं को समर्पित था, वहीं बहिष्कृत हितकारिणी सभा के लक्ष्य और उद्देश्य शिक्षा दिलाने, संस्कृति का प्रसार करने, आर्थिक हालात में सुधार लाने तथा ‘‘वंचित वर्गों’’ की शिकायतों को प्रतिनिधित्व देने से जुड़े थे. यह विशुद्ध सुधारवादी एजेंडा था और इसमें टकराव का कोई तत्व मौजूद नहीं था, जाति उन्मूलन के किसी क्रांतिकारी पहलू पर बात तो दूर रही. यह तो महाड़ में हुआ कि वे हिंदुओं से सीधे टकराव में आए. महाड़ के अपने कड़वे अनुभवों और व्यापक हिंदू समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले गांधी के साथ अपने तजुर्बों ने उन्हें जाति का उन्मूलन लिखने को बाध्य किया जिसमें वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जातियों का सुधार संभव नहीं है और इसे जड़ से ही उखाड़ना होगा.

यह निष्कर्ष इस समझ पर आधारित था कि जातियां हिंदू धर्म का अभिन्न अंग हैं जिन्हें इसके धर्मशास्त्रों से मान्यता मिली हुई है. कार्यक्रम के संदर्भ में इसका अर्थ यह हुआ कि जाति उन्मूलन के लिए हिंदू धर्म की नींव को ही खोदना पड़ेगा, उन हिंदू धर्मशास्त्रों को नष्ट करना पड़ेगा जो जाति की विचारधारा को अभिपुष्ट करते हैं. चूंकि उन्होंने देखा कि यह कार्य असंभव है, इसलिए इस कार्यक्रम की परिणति घट कर हिंदू धर्म का निषेध हो गई, जैसा कि उन्होंने खुद अपने लिए चुना.

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इसका मतलब यह कहने जैसा था कि सामान्यतः जातियों का उन्मूलन संभव नहीं है क्योंकि जिन सवर्ण हिंदुओं के जातियों में निहित स्वार्थ हैं और वे कभी भी अपने धर्मशास्त्रों को नष्ट करने को तैयार नहीं होंगे. इसलिए जाति के शिकार लोगों के लिए इकलौता विकल्प यही है कि वे हिंदू धर्म को छोड़ कर उससे बाहर निकल आएं.

इसका निहितार्थ यह बनता था कि चूंकि जाति उन्मूलन का लक्ष्य व्यावहारिक नहीं दिखता है, इसलिए जाति व्यवस्था के शिकार लोग हिंदू धर्म को हिंदुओं के लिए ही छोड़ कर इस शोषणकारी ढांचे से बाहर आ जाएं. लेकिन सवाल उठता है कि क्या हिंदू धर्म का बहिष्कार कर के वे जाति शोषण से मुक्त हो सकेंगे. इस सवाल का सामान्य जवाब नहीं में है.

यदि सारे पीड़ितों ने हिंदू धर्म को छोड़ दिया, तो हिंदू समाज का ढांचा ही ढह जाएगा और जाति व्यवस्था अपने आप ही खतरे में पड़ जाएगी. लेकिन इसका अर्थ यह होगा कि शारीरिक रूप से उत्पीड़न के लिए हिंदू उपलब्ध नहीं होंगे, और ऐसा सिर्फ हिंदू धर्म छोड़ने से नहीं होगा. हो सकता है कि इसका अर्थ मानसिक गुलामी से बाहर निकल आना हो, लेकिन गुजर बसर के लिए पुराने कार्यस्थलों पर शारीरिक रूप से अब भी उनके उत्पीड़न की गुंजाइश बनी रहेगी.

सारे पीड़ितों ने हिंदू धर्म को छोड़ दिया, तो हिंदू समाज का ढांचा ही ढह जाएगा


इस बाद की स्थिति के लिए कोई अनुमान लगाने की आवश्यकता नहीं है. यदि हम इतिहास में देखें, तो हिंदू धर्म से निचली जातियों को बाहर निकालने के वर्णन मौजूद हैं (उपमहाद्वीप में गैर-हिंदुओं की आबादी इसका साफ सबूत है) लेकिन वे अपनी नियति से बाहर नहीं निकल सके. जातियां सिर्फ बची ही नहीं रह गईं, बल्कि उसने अपने ज़हर से इन नए धार्मिक समुदायों को भी ज़हरीला बना डाला.

सुदूर जगहों पर दलितों के पलायन ने भी उन्हें जाति के कलंक से मुक्त नहीं किया है, जैसा हिंदू आबादी के बीच रहने वाले कि यूरोप और अमेरिका के प्रवासी दलित इसकी गवाही दे सकते हैं. शायद सवर्ण हिंदू जातियां ‘‘दलितों’’ के बगैर जी ही नहीं सकती हैं. अफ्रीका जैसे देशों में जहां दलित उपलब्ध नहीं थे, उन्होंने स्थानीय अश्वेत आबादी को ‘दलित’ बनाकर अपना काम चला लिया.

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इसका मतलब सिर्फ यही हो सकता है कि जाति को गोत्रों की परंपरा के संदर्भ में या किसी धार्मिक मान्यता के संदर्भ में नहीं समझा जा सकता है. इन सबको अपने में समोते हुए जातियों ने जीने के एक खास तरीके में पैठ बना ली है. यह लोगों के जीवन-जगत का हिस्सा है जिन्हें अलग से नहीं पहचाना या सीमित नहीं किया सकता. यही वजह है कि अमीर दलित भी खुद को जाति के कलंक से मुक्त नहीं कर सके हैं (आंबेडकरी आंदोलन से काफी पहले भी देश में अमीर दलितों के उदाहरण मौजूद रहे हैं).

जो तर्क दिया जाता है कि आर्थिक समृद्धि का जाति से कोई लेना-देना नहीं है, यह बहुत अटपटा है. ऐसा है भी और नहीं भी हैः किसी और अन्य कारक से कहीं ज्यादा आर्थिक समृद्धि का जाति से संबंध है, लेकिन यह बात पूरी तरह सही नहीं है. जहां कहीं भी हिंदुओं से निर्भरता के संबंध में दलित बंधे हुए नहीं हैं, वहां जाहिर तौर पर वे जाति उत्पीड़न के प्रति उतने अरक्षित नहीं है जितना उन जगहों पर जहां दोनों के बीच निर्भरता का रिश्ता है.

इसके अलावा, इस जीवन-जगत में जो भी बदलाव हुए हैं, उनकी जड़ें इतिहास के राजनीतिक आर्थिकी से जुड़े कारकों में खोजी जा सकती हैं. इसलिए यह बात कहना ठीक होगा कि भौतिक (पढ़ें आर्थिक) कारक जाति के मसलों में किसी अन्य कारक से ज्यादा प्रभावकारी हैं, लेकिन यही सब कुछ नहीं है, जैसा कि भोंडे भौतिकवादियों का दावा रहता है.

बाबासाहब अंबेडकर कार्यक्रम के स्तर पर यह नहीं बता सके कि जाति का उन्मूलन कैसे होगा

इसे इस तरह कह सकते हैं कि यदि आप भौतिक कारकों की उपेक्षा करते हुए गैर-भौतिक कारकों पर काम करते हैं तो आपकी नाकामी तय है, लेकिन यदि आप सिर्फ भौतिक कारकों पर काम करते हैं और गैर-भौतिक कारकों को छोड़ देते हैं, तो हो सकता है कि आप कामयाब न हो पाएं.

बाबासाहब अंबेडकर कार्यक्रम के स्तर पर यह नहीं बता सके कि जाति का उन्मूलन कैसे होगा. यह कहना कि उन्होंने जाति के उन्मूलन के लिए नहीं कहा, प्रच्छन्न हितों का चारा बन जाने जैसा होगा. उनकी बातों की गहराई का मोल कार्यक्रम या रणनीति के स्तर पर उतना नहीं है जितना उनकी दृष्टि में है. कार्यक्रम के स्तर पर वे हिंदू धर्मशास्त्रों में जाति को अवस्थित करके और जाति के उन्मूलन की असंभाव्यता को मानने की वजह से दिग्भ्रमित रहे, लेकिन यह कहना मूर्खतापूर्ण होगा कि उन्होंने जाति के उन्मूलन की बात नहीं की.

कई साल बाद जब भारत का संविधान लिखते वक्त उनके पास एक आंशिक मौका आया, तब भी वे अपनी इच्छा को लागू नहीं कर पाए. उनका तीखा विरोध तो हो ही रहा था, इसके अलावा उनके भीतर एक द्वंद्व भी था, कि जातियों को नकार कर अस्पृश्यों के लिए विशेष सुरक्षा का एक आधार तैयार किया जाए या नहीं. वास्तव में ये सुरक्षा कवच औपनिवेशिक समय से ही चला आ रहा था और इसके लाभार्थी पहले से ही जड़ हो चुके थे.

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प्रशासनिक कोटि में से जातियों को बाहर रखते हुए उन्हें अब भी कानूनी तौर पर खत्म किया जा सकता है. लेकिन ऐसा नहीं होगा बल्कि सत्ताधारी तबकों के लिए एक मुहावरेबाजी के चलते उन्हें बचाए रखा जाएगा ताकि यह बहाना दिया जा सके कि वे अन्य पिछड़ी जातियों के साथ सामाजिक न्याय के हामी हैं और इन जातियों की पहचान जब और तब उनकी मर्जी पर ही होगी. भारत के राजनीतिक षड्यंत्रों के इतिहास में यह सत्त्ताधारी तबकों की सबसे बड़ी चाल साबित हुआ है और जहां तक दलितों का सवाल है, यह एक ऐसा चाबुक है जिसकी मार पर न तो दलित बुद्धिजीवियों का ध्यान गया है और न ही उनके नेताओं का.

अस्पृश्यता को गैर-कानूनी करार दिए जाने के बाद काफी तरक्की हुई है. खासकर लखनऊ पैक्ट के बाद नामी-गिरामी सवर्ण हिंदुओं की ओर से अस्पृश्यों के बीच जागरूकता पर यही प्रतिक्रिया आई थी. यह दरअसल भौतिक रूप से कुछ भी छेड़े बगैर अस्पृश्यों की भावनाओं को तुष्ट करने की एक साजिश थी. चूंकि अस्पृश्यता का स्रोत जातियां हैं, इसलिए जाति को खत्म किए बगैर अस्पृश्यता उन्मूलन का कोई मतलब नहीं रह जाता.

कांग्रेस की पूरी कोशिश रही कि अन्य अस्पृश्य जातियों को अंबेडकर से दूर रखा जाए


वास्तव में यही हुआ है. आज अस्पृश्यता उन्मूलन के करीब 70 साल बाद भी हाल के सर्वेक्षणों में पता लगा है कि 60-70 फीसद से ज्यादा गांवों में अलग-अलग स्तरों पर अस्पृश्यता को बरता जाता है. अस्पृश्यता का संवैधानिक उन्मूलन बेकार साबित हुआ है.

ऐतिहासिक रूप से भेदभाव का शिकार रही जातियों का संघर्ष मान्यता के संघर्ष में बदल जाता है और फिर अनिवार्य रूप से यह पहचान की राजनीति में तब्दील हो जाता है. मुख्यधारा हमेशा पहचान की राजनीति को हवा देती है क्योंकि यह शोषण के असल ढांचों को चुनौती नहीं देती है. इतना ही नहीं, यह उदारवाद के विषाणु को बचाकर रखती है ताकि जनता से इन्कलाबी विचारों को दूर रखा जा सके. पहचानों के संग्रहालय भारत में आज यही प्रवृत्ति राज कर रही है. न तो फुले और न ही अंबेडकर ने जातिगत पहचान की बात की थी, लेकिन वर्गीय अंतर्विरोध की अवधारणा निर्मिति की प्रक्रिया में वे लोगों की जातिगत पहचान से नहीं बच सके.

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फुले का आशय परजीवी वर्गों के खिलाफ कामगार तबकों के संघर्ष से था लेकिन वे जाति के वर्चस्वशाली मुहावरे (शूद्र-अतिशूद्र) से बच नहीं सके हालांकि शेतिज और भाटिज नाम के शत्रुद्वय के लिए उनकी अभिव्यक्ति ज्यादा वर्गीय स्वरूप की ही थी. यही बात अंबेडकर के लिए भी कही जा सकती है. उन्होंने शत्रु को व्यक्तियों नहीं बल्कि विचार के तौर पर यानी पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद के रूप में गढ़ते हुए फुले के विचार को समृद्ध किया लेकिन ऐसा करते वक्त वे भी अस्पृश्य जैसी जातिगत पहचान से बच नहीं पाए, हालांकि उन्होंने यथासंभव वंचित वर्ग के वैकल्पिक पद का इस्तेमाल किया जो वर्ग की ओर इशारा करता था.

इन्होंने जो सूक्ष्म भेद बताया उसे इनकी व्याख्या करने वालों ने भुला दिया. वंचित वर्ग का व्यापक मतलब अस्पृश्य समझ लिया गया और सबसे बुरा तब हुआ जब अस्पृश्यों ने इसे अपनी जाति समझ लिया. इसी तरह ब्राह्मणवाद का मतलब ब्राह्मणों से लगा लिया गया बावजूद इसके कि अंबेडकर ने साफ तौर पर जोर दिया था कि ब्राह्मणवाद की प्रवृत्ति दलितों में भी हो सकती है.

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मुहावरेबाजी की इस मजबूरी से इतर अंबेडकर-फुले के चलाए मुक्ति के संघर्ष को अनिवार्य रूप से, गलत रूप से पहचानी गई अस्मिताओं को स्वीकार्यता दिलाने के संघर्ष से गुजरना पड़ा, जिसे उनकी जाति ही होना था. मसलन, गोलमेज सम्मेलन में अस्पृश्यों के लिए अलग निर्वाचन मंडल के लिए संघर्ष और इनके आरक्षण के लिए उनके प्रयास दरअसल इनकी मुक्ति के व्यापक संघर्ष का अपरिहार्य और अनिवार्य हिस्सा थे.

जाति के मुहावरों के सहज प्रयोग ने काफी नुकसान किया है. फुले की मौत के तुरंत बाद शूद्रों ने अतिशूद्र से खुद को अलग कर लिया (कहते हैं कि पुणे में जहां फुले की शोकसभा चल रही थी उसमें अस्पृश्यों को प्रवेश नहीं करने दिया गया था), वहीं अंबेडकर की अपनी जाति को छोड़कर अन्य अस्पृश्य जातियां उनसे दूर ही रहीं (अंबेडकर के ज्यादातर अनुयायी उनकी महार जाति और अन्य क्षेत्रों में महार जैसी जातियों से ही रहे).

चुनावी प्रक्रिया में इस स्वाभाविक पहचान के ध्रुवीकरण का इस्तेमाल सत्ताधारी वर्गों ने किया. अंबेडकर ने 1937 के चुनाव के पहले ही समझ लिया था कि उन्हें अपनी राजनीति को वर्ग आधारित बनाते हुए व्यापक रूप देने की जरूरत है और उन्होंने इंगलैंड का आइएलपी मॉडल अपनाया, जबकि कांग्रेस की पूरी कोशिश रही कि अन्य अस्पृश्य जातियों को अंबेडकर से दूर रखा जाए.

यह इतिहास का प्रतीकात्मक सबक कहा जा सकता है कि वर्ग आधारित राजनीति कर रहे अंबेडकर को ज्यादा सीटें मिलीं (बॉम्बे प्रेसिडेंसी के 1937 में हुए चुनाव में कुल 17 में से 14 सीटें अंबेडकर को मिलीं जिनमें 31 में से 11 आरक्षित थीं और 4 सामान्य में से 3 थीं) जबकि जाति की राजनीति कर रहे अंबेडकर को बार-बार हारना पड़ा (1952 और 1954 में बिना किसी राजनीतिक हैसियत वाले प्रतिद्वंद्वियों से अंबेडकर को हारना पड़ा).

क्रिप्स मिशन की रिपोर्ट की राजनीतिक अपरिहार्यताओं के चलते उन्हें आइएलपी को भंग करना पड़ा और उन्होंने एक सांप्रदाय पर आधारित दिखने वाली पार्टी शिड्यूल कास्ट फेडरेशन (एससीएफ) गठित की. इसके साथ ही उन्हें वाइसरॉय के कार्यपरिषद में लेबर मेम्बर के रूप में लिया और उन्होंने श्रमिकों के लिए बहुत योगदान दिया.

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भले एससीएफ का गठन अनुसूचित जातियों को लाभ पहुंचाने के लिए किया गया था, इसने अपने पूर्ववर्ती वर्गीय झुकाव के कारण ऐसा नहीं किया. इसने जो सबसे यादगार दस्तावेज तैयार किया वह था स्टेट्स एंड माइनॉरिटीज़, जिसे अंबेडकर ने लिखा. यह संविधान सभा के लिए एक मेमोरेंडम जैसा था जिसमें भारत के संविधान द्वारा राजकीय समाजवाद अपनाने की बात कही गई थी. इसके बाद से अंबेडकर को स्टेट्समैन की भूमिका में देखा जाने लगा जिनके कंधों पर संविधान तैयार करने की महती जिम्मेदारी थी और जिन्होंने कानून मंत्री रहते हुए हिंदू कोड बिल में महिलाओं के अधिकारों के पक्ष में कड़ा रुख लिया.

बाद में उन्होंने एक नैतिक संहिता के तौर पर बौद्ध धर्म को अपना लिया जो ‘‘मुक्ति, समता और बंधुत्व’’ का संदेश देता था और ब्राह्मणवाद की एक सशक्त काट है. उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) के गठन की कल्पना की, जिसके तहत सारे गैर-कांग्रेसी और गैर-वामपंथी तत्वों को एक छत के नीचे लाकर इसे संसदीय लोकतंत्र में प्रमुख विपक्षी पार्टी बनाना था. उनकी समूची जिंदगी में हमें जाति के प्रति नफरत और मनुष्य की मुक्ति की विचारधारा की तलाश दिखती है. एक कट्टर उदारपंथी होने के नाते उन्हें मार्क्सवाद के क्रांति के कार्यक्रम पर आपत्तियां थीं हालांकि उसमें निहित मानवता की मुक्ति के लक्ष्य को उन्होंने स्वीकार किया था.

(आधार प्रकाशन द्वारा प्रकाशित जनवादी समाज और जाति का उन्मूलन पुस्तक से साभार. लेखक: आनंद तेलतुंबड़े, संपादक: रुबीना सैफी)
First published: 14 April 2016, 9:34 IST
 
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