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सनसनीपसंद टीवी चैनलों का अर्नबवादी उन्माद

शेवंती नेनन | Updated on: 18 February 2016, 8:51 IST

ये तय करना मुश्किल है कि मीडिया को किस बात से ज्यादा नुकसान पहुंच रहा है, उन लोगों से जिन्होंने पुलिस की मौजूदगी में पत्रकारों पर हमला किया या मीडिया के उन मीडियाकर्मियों से जिन्होंने इन घटनाओं का गैर-पेशेवर तरीके से अपने फायदे के लिए भुनाया है.

अर्नब गोस्वामी जेएनयू में हुए कथित भारत-विरोधी नारेबाजी पर जिस तरह आक्रोश की नौटंकी कर रहे हैं वो इस दूसरी श्रेणी में आता है. (हम जानते हैं उनका मुद्दा औऱ निशाने बदलते रहते हैं).

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राजधानी की एक अदालत में पुलिस की मौजूदगी में पत्रकारों और दूसरे नागरिकों के साथ जिस तरह मारपीट हुई उसने मौजूदा सरकार के कड़े रुख की निर्मम याद दिला दी.

अभी पिछले ही हफ्ते छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में स्वघोषित समाजरक्षकों ने पुलिस के संरक्षण में एक महिला पत्रकार के घर पर आधी रात को पथराव किया. उदारवादी विचारों पर ये एक ऐसा खतरा है जिसने राष्ट्रवाद का मुखौटा पहन रखा है.

दूसरा खतरा टाइम्स नाउ जैसे मीडिया संस्थाओं की तरफ से आता है जिसमें वो विवादों के अपने रोज के कोटे के सहारे लोगों को भड़काता है. ऊंची आवाज में चिल्लाने वाले इसके एंकर एक रेफरी की भूमिका में होते हैं. वो कितने जोर से चिल्लाएंगे ये उनकी मर्जी पर निर्भर करता है.

'जब अर्नब गोस्वामी बोलना शुरू करते हैं तो उन्हें तथ्यों की ज्यादा फिक्र नहीं रहती'

जब अर्नब बोलना शुरू करते हैं तो उन्हें तथ्यों की ज्यादा फिक्र नहीं रहती. अगर आपको हाई ब्लडप्रेशर न हो तो आप उनके शो को रंगमंच के किसी प्रदर्शन की तरह देखते रह सकते हैं. आपको इस बात की हैरानी हो सकती है कि वो कहना क्या चाहते हैं.

जेएनयू से जुड़े टाइम्स नाउ के एक न्यूजआवर वीडियो पर छह हजार से ज्यादा कमेंट हैं. ज्यादातर में सांप्रदायिक नफरत जाहिर की गई है. कमेंट की वहां पर बेरोक-टोक मौजूदगी बताती है कि टाइम्स ग्रुप को इन घृणा भरी टिप्पणियों से कोई दिक्कत नहीं है.

पिछले कुछ दिनों से वो हर रात छात्र विरोधी आग में बगैर रुके घी डाले जा रहे हैं. अगर टाइम्स नाउ न होता तो जेएनयू कैंपस के अंदर लगाए गए कुछ अजीब, गैरजरूरी भारत-विरोधी नारे ज्यादा दूर तक नहीं पहुंच पाते. 15 फरवरी के कार्यक्रम में अर्नब ने चिल्लाते हुए कहा, "कश्मीर को बंदूक की नोंक पर छीन लेने की बात कहना कब से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हो गई?"

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उसी रात सीएनएन-आईबीएन के ज़ाका जैक, जो कई बार अर्नब के क्लोन नजर आते हैं, कह रहे थे कि टीवी चैनलों को अपुष्ट भड़काऊ वीडियो नहीं चलाना चाहिए. लेकिन अर्नब लगातार ये वीडियो चलाते रहे. बीच बीच में उन्होंने डिसक्लेमर की पट्टी जरूर चलायी जिसपर लिखा था, 'दिल्ली पुलिस इस वीडियो और बयानों की जांच कर रही है.' उनके शो में आने वाले वक्ता इस बात को रख नहीं पाए, वो रखते तब न जब अर्नब उन्हें बोलने का मौका देते.

जब अर्नब अपने राष्ट्रवाद के खुमार में ऊंचा सुर लगाना शुरू करते हैं तो बहस का विषय चाहे जो हो वो कल्पना की ऊंची ऊंची उड़ान भरना नहीं भूलते. सियाचिन सीमा पर बर्फबारी में बुरी तरह घायल एक सैनिक दिल्ली के एक अस्पताल में जीवन और मौत से संघर्ष कर रहा था तो अर्नब को जेएनयू के कुछ कथित छात्रों के 'देश की बरबादी' के नारे के रूप में एक ऐसा दुश्मन मिल गया जिसपर वो चीख सकते थे.

अर्नब ने कहा, "लांसनायक हनुमंतथप्पा पर हमें गर्व है और आप (जेएनयू का एक छात्र) पर शर्म आती है."

अर्नब ने आगे कहा, "जब मैं लांसनायक हनुमंतथप्पा के बारे में बोल रहा हूं तो तुम कुछ नहीं बोलोगे. तुम जेएनयू कैंपस में बैठे रहते हो और कहते हो कि तुम भारत को बरबाद करने के लिए कड़ी मेहनत करोगे. जब मैं लांसनायक हनुमंतथप्पा के बारे में बोल रहा हूं तो तुम कुछ नहीं बोलोगे. ऐसे छात्रों को कैंपस के अंदर देश के अपमान की इजाजत नहीं दी जा सकती."

अर्नब गोस्वामी की स्टाइल बिकाऊ है इसलिए शायद ही वो इसे छोड़ें

अर्नब की स्टाइल बिकाऊ है. इसलिए शायद ही वो उसे छोड़ें. अंग्रेजी चैनलों को देखने वालों की संख्या इस देश में बहुत कम है लेकिन बड़ी दिक्कत ये है कि इंटरनेट पर उन्हें काफी देखा जा रहा है. अर्नब की पहुंच सीमित है. इसलिए बाकी कमी न्यूज एक्स के राहुल शिव शंकर और सीएनएन-आईबीएन के ज़ाका जैकब पूरी करते हैं. हिंदी के टीवी चैनलों में भी अर्नब की भौंडी नकल करने की होड़ है. सुधीर चौधरी, दीपक चौरसिया आदि एकसुर से राष्ट्रवाद की घुट्टी पिला रहे थे.

अर्नब हमेशा भ्रष्टाचार पर गुस्सा और राष्ट्रविरोधी विचारों पर क्रोधित रहते हैं. शायद यही वजह है कि उनके चैनल ने जब अपना 10 साल पूरा किया तो उसने दावा किया कि 'चैनल का देश की राजनीतिक प्रक्रिया पर असर साफ दिखता है.'

इस गर्वोक्ति को कोई किस तरह ले? टीवी पर खबरों की जगह सिकुड़ती जा रही है. अगर इसका नकारात्मक असर न होता तो इसे नजरअंदाज किया जा सकता था. लेकिन अनर्ब रोज रोज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ चीखते हैं और तथ्यों के संग छेड़छाड़ करते हैं. क्या कोई इसका विरोध कर सकता है?

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इंडियन एक्सप्रेस में छपे एक लेख पर टिप्पणी की गई. शायद प्रताप भानु मेहता के लेख पर, "सेमी-अकामिदक लोग अखबारों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अधपके लेख लिख रहे हैं."

चैनल पर जनता को बताया गया कि मेहता और दूसरे लोग यूपीए सरकार के दौर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर होने वाले हमलों पर चुप रहते थे. और जेएनयू में इस समय जो लोग आक्रोशित हैं वो तब एक शब्द नहीं बोले जब असीम त्रिवेदी पर एक कार्टून के लिए राजद्रोह का आरोप लगाया था और जब महाराष्ट्र में दो लड़कियों को उनके फेसबुक पोस्ट के लिए निशाना बनाया गया.

जाहिर है ये सारी बातें पूरी तरह बेबुनियाद और झूठी हैं लेकिन टीवी पर इन्हें उसी समय कौन चुनौती देगा? सनसनीपसंद टीवी चैनल और राष्ट्रवाद एक घातक गठजोड़ बन चुका है. बड़ा सवाल ये है कि इसका सामना कौन करेगा?

(ये लेखक के निजी विचार हैं. जरूरी नहीं है कि संस्थान इनसे सहमत हो)

First published: 18 February 2016, 8:51 IST
 
शेवंती नेनन @catchhindi

वरिष्ठ पत्रकार

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